उत्तर प्रदेश: पहले सेल्फ़ी फिर पढ़ाई, नहीं माने तो गई कमाई


उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले में प्राइमरी स्कूल के अध्यापकों की हाज़िरी का एक नया तरीक़ा तलाशा गया है. अध्यापकों से कहा गया है कि वो ठीक आठ बजे स्कूल पहुंचकर स्टाफ़ और बच्चों के साथ सेल्फ़ी खींचे, उसे विभाग के वॉट्सऐप ग्रुप पर भेजें, उसके बाद पढ़ाई और दूसरे काम शुरू करें.

इस व्यवस्था का पालन न करने वाले और अनुपस्थित रहने वाले अध्यापकों का एक दिन का वेतन दंडस्वरूप काट लिया जाएगा. ज़िले के बेसिक शिक्षा अधिकारी के मुताबिक, ये क़दम इसलिए उठाया गया है क्योंकि बहुत से अध्यापकों को लेकर ऐसी शिकायतें आती थीं कि वे समय पर स्कूल नहीं पहुंचते हैं या फिर अक़्सर छुट्टी पर ही रहते हैं.

बाराबंकी के ज़िला बेसिक शिक्षा अधिकारी वीपी सिंह ने बीबीसी को बताया कि इस नियम की शुरुआत तभी कर दी गई थी जब अप्रैल में नया सत्र शुरू हुआ था, “अप्रैल महीने में कुछ दिन स्कूल खुलने के बाद गर्मी की छुट्टियां हो गई थीं. एक जुलाई से स्कूल दोबारा खुले हैं और शिक्षकों से इस नियम का कड़ाई से पालन करने को कहा गया है. अनुपस्थित रहने वाले या फिर सेल्फ़ी न डालने वाले क़रीब सात सौ शिक्षकों का एक दिन का वेतन अब तक काटा गया है.”

बाराबंकी में सरकारी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में क़रीब साढ़े सात हज़ार अध्यापक हैं जिन पर यह व्यवस्था लागू की गई है. इनसे कहा गया है कि सुबह आठ बजे स्कूल पहुंचने के तुरंत बाद सभी अध्यापक छात्रों के साथ एक सेल्फ़ी खींचे और फिर उसे बेसिक शिक्षा विभाग के वेब पेज पर पोस्ट कर दें. इस नई व्यवस्था को ‘सेल्फी अटेंडेंस मीटर’ नाम दिया गया है.

यूं तो ज़्यादातर अध्यापक इसे सही मान रहे हैं लेकिन कुछ को इस पर कई वजह से आपत्ति है.

बंकी ब्लॉक के कन्या जूनियर हाई स्कूल की एक टीचर पारुल शुक्ला कहती हैं, “ये शिक्षकों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है. हाजिरी की व्यवस्था पहले से ही है फिर भी आप हमें सेल्फ़ी के लिए बाध्य करके क्या बताना चाहते हैं? यही न कि टीचर सबसे ज़्यादा नकारे और निकम्मे हैं. वो अनुशासनहीन हैं और इसीलिए इन्हें इतने तरह के परीक्षणों से परखा जा रहा है. आख़िर ये सारे प्रयोग अन्य विभागों में क्यों नहीं होते, सिर्फ़ शिक्षकों पर ही क्यों होते हैं?”

पारुल शुक्ला का कहना है कि वो ख़ुद हमेशा समय से आती हैं और जब से नियम लागू हुआ है, सेल्फ़ी भी पोस्ट कर रही हैं लेकिन यह व्यवस्था उन्हें ऐसी लगती है जैसे कि उन्हें हमेशा और हर कोई संदेह की निगाह से देख रहा है. पारुल शुक्ला की एक अन्य सहयोगी सविता यादव को सेल्फ़ी भेजने में कोई आपत्ति नहीं है लेकिन पारुल की बातों से वो भी सहमत हैं.

कितना प्रभावी नियम?

बंकी के ही कन्या जूनियर हाई स्कूल की प्रधानाचार्य सुशीला शर्मा इस नियम का समर्थन करती हैं लेकिन एक सवाल उनका भी है कि समय पर स्कूल न आने वाले बहुत कम लोग ही हैं और जो नहीं आते हैं, वो इस ‘सेल्फ़ी अटेंडेंस’ की भी शायद ही परवाह करें.

लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारी कहते हैं कि सेल्फ़ी की अच्छी तरह से मॉनीटरिंग हो रही है और जो भी शिक्षक इसके माध्यम से अनुपस्थित पाया गया उसे अपनी एक दिन की तनख़्वाह से हाथ धोना पड़ेगा. बीएसए वीपी सिंह कहते हैं, “जिन्हें वेतन की फ़िक्र नहीं होगी वही इसका उल्लंघन करेंगे. अभी इसे देख रहे हैं, आगे इस पर भी कुछ नियम बनाएंगे कि अक़्सर जिनका वेतन कट रहा है, उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की जाए.”

दरअसल, बाराबंकी में इस व्यवस्था को लागू करने का विचार बाराबंकी की मुख्य विकास अधिकारी मेधा रूपम का था. बीबीसी से बातचीत में मेधा रूपम बताती हैं कि उन्नाव में तैनाती के दौरान उन्होंने इस व्यवस्था को प्रायोगिक तौर पर शुरू किया था लेकिन उनके आने के बाद वहां यह व्यवस्था आगे नहीं चल पाई. इसके अलावा, बुलंदशहर जैसे कुछ अन्य ज़िलों में भी इसे लागू करने की कोशिश की गई लेकिन ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकी.

नए सिस्टम से लाभ?

सीडीओ मेधा रूपम कहती हैं, “सेल्फ़ी अटेंडेंस की निगरानी के लिए हमने एक अलग सेल बनाया हुआ है, जहां पहले स्कूल के हेड मास्टर, फिर सहायक बीएसए और फिर बीएसए के पास रिपोर्ट आती है. मैं ख़ुद भी इसकी मॉनीटरिंग करती हूं और मेरे विभाग से भी कुछ लोग इस सेल से जुड़े हैं. किसी को कोई समस्या होती है, वो भी इस ग्रुप में पोस्ट की जाती है. इसमें मेरा सीयूजी नंबर भी है.”

बीएसए वीपी सिंह दावा करते हैं कि 16 मई से लागू इस व्यवस्था के बाद न सिर्फ़ अध्यापकों की उपस्थिति में बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है बल्कि एक जुलाई से स्कूल खुलने के बाद स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति भी बढ़ी है.

हालांकि, बाराबंकी के ही एक प्राइमरी स्कूल के टीचर नाम न छापने की शर्त पर चुटकी लेते हैं, “सेल्फ़ी भेजने के चक्कर में स्कूलों में हो सकता है कि अक़्सर समय से न आने वाले टीचर वक़्त के पाबंद हो जाएं लेकिन कहीं ऐसा न हो कि बच्चे ही स्कूल आना बंद कर दें. ऊपर के अधिकारी नहीं जानते कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को बुलाने और फिर उन्हें स्कूल में ही रोके रहने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है.”

विरोध में शिक्षक

जिन शिक्षकों का सेल्फ़ी न भेज पाने के चलते वेतन कट चुका है, ऐसे कुछ लोगों से भी हमने बात करने की कोशिश की. सुशील पांडेय बाराबंकी के ही एक स्कूल में अध्यापक हैं और प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं.

सुशील पांडेय का भी वेतन इस मामले में कट चुका है. वो कहते हैं, “इसमें कई व्यावहारिक दिक़्क़तें हैं. बहुत से अध्यापकों के पास, ख़ासकर जो पुराने हैं, एंड्रॉएड फ़ोन नहीं है. उन्हें सेल्फ़ी लेना नहीं आता और फिर अक़्सर गांवों में नेटवर्क नहीं रहता. यदि नेटवर्क नहीं है तो ठीक आठ बजे हम कैसे भेज देंगे सेल्फ़ी?”

बीएसए के इस फ़ैसले के विरोध में कुछ शिक्षकों ने प्रदर्शन किया था. सुशील पांडेय कहते हैं कि विरोध की वजह सिर्फ़ ये है कि इसे सभी ज़िलों में लागू किया जाए, सिर्फ़ बाराबंकी में ही क्यों? उनके मुताबिक, जब तक यह व्यवस्था सभी जगह लागू नहीं होती तब तक शिक्षक इसका विरोध करेंगे.

दिक्कतें और भी हैं…

यहां दिलचस्प बात ये भी है कि पिछले दिनों राज्य की बेसिक शिक्षा मंत्री अनुपमा जायसवाल ने शिक्षकों को स्कूल में एंड्रॉएड फ़ोन और ख़ासकर सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर सख़्ती से रोक लगाने को कहा था. बीएसए वीपी सिंह कहते हैं, “सेल्फ़ी डालने के बाद शिक्षकों से कहा गया है कि वो अपने फ़ोन या तो बंद कर दें या फिर साइलेंट करके उसका डेटा बंद कर दें ताकि सोशल मीडिया में न व्यस्त रहें और बच्चों को पढ़ाने पर ध्यान दें.”

शिक्षा विभाग के कुछ बड़े अधिकारियों के मुताबिक, प्राइमरी स्कूलों में अध्यापकों के ग़ैर हाज़िर रहने या फिर देर से आने की आए दिन शिकायतें मिलती रहती हैं.

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “दूर-दराज से आने वाले शिक्षकों में लेटलतीफ़ी तो बहुत सामान्य बात है, कई शिक्षक तो कक्षा से गायब रहते हैं और वेतन कटने से बचने के लिए अपनी जगह किसी अन्य व्यक्ति को छात्रों को पढ़ाने के लिए भेज देते हैं. ऐसी शिकायतें लगभग हर ज़िले से आती हैं. ऐसे में यदि सेल्फ़ी के ज़रिए हाज़िरी की व्यवस्था सफल रहती है तो हो सकता है कि अन्य ज़िलों में भी इसे लागू कर दिया जाए.”

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