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प्रदूषण में रहना जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार

Byadmin

May 13, 2024


पीटीआई, नई दिल्ली। दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रतिदिन 3,800 टन कचरे के अशोधित (अनट्रीटेड) रह जाने को सुप्रीम कोर्ट ने भयानक स्थिति करार दिया है। कोर्ट ने सोमवार को कहा कि यह प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने के नागरिकों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। पीठ ने कहा, “हम इसके बारे में चिंतित हैं। पूरी दुनिया क्या कहेगी। 2024 में भारत की राजधानी में प्रतिदिन 3,800 टन ठोस कचरा अशोधित रह जा रहा है। 2025 में क्या होगा? 2026 में क्या होगा? हर जगह स्थिति भयानक है।”

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गुरुग्राम, फरीदाबाद और ग्रेटर नोएडा जैसे क्षेत्रों में प्रतिदिन ठोस कचरा निकलने और उसे शोधित करने की क्षमता पर आंकड़ों का जिक्र करते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में हो रहे विकास कार्यों पर विचार करें तो यह स्वाभाविक है कि इसमें वृद्धि ही होगी।

जस्टिस एएस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के तत्काल उपाय किए जाने चाहिए कि अशोधित ठोस कचरे की मात्रा में तब तक बढ़ोतरी न हो जब तक उसे शोधित करने की समुचित व्यवस्था नहीं हो जाती। इसके लिए अधिकारियों को विभिन्न तरीकों पर विचार करना होगा जिसमें इन इलाकों में निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण शामिल है।

पीठ ने आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के सचिव को समाधान तलाशने के लिए सभी संबंधित अधिकारियों की बैठक बुलाने एवं फिर उसे अदालत में रखने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, “अगर अधिकारी कोई ठोस प्रस्ताव देने में असमर्थ रहे तो हमें दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरण की देखभाल के मद्देनजर कठोर आदेश जारी करने पर विचार करना होगा। हमें उम्मीद व विश्वास है कि सभी अधिकारी इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से लेंगे क्योंकि पहली नजर में हमारी धारणा है कि किसी भी अधिकारी ने प्रतिदिन पैदा हो रहे ठोस कचरे से निपटने की पर्याप्त क्षमता नहीं होने के खतरनाक परिणामों पर विचार करने की परवाह नहीं की।”

पीठ ने कहा कि आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के सचिव रिपोर्ट तैयार करेंगे और 19 जुलाई तक अदालत के समक्ष रखेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी संबंधित पक्षों ने स्वीकार किया है कि दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के दायरे में प्रतिदिन 3,800 टन कचरा पैदा होता है और क्षमता नहीं होने की वजह से उसको शोधित नहीं किया जा सकता। दिल्ली के लिए यह खेद का विषय है।

अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। साथ ही कहा कि एमसीडी के वकील ने अदालत को बताया है कि इतनी अधिक मात्रा में कचरे को शोधित करना जून, 2027 तक ही संभव हो पाएगा। इसका मतलब है कि अब से तीन से अधिक वर्षों तक दिल्ली में प्रतिदिन 3,800 टन ठोस कचरा कहीं न कहीं एकत्रित हो रहा होगा।

केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय की ओर से दाखिल हलफनामे का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि गुरुग्राम में प्रतिदिन 1,200 टन ठोस कचरा पैदा होता है और इसे शोधित करने की क्षमता सिर्फ 150 टन प्रतिदिन है। फरीदाबाद में प्रतिदिन 1,000 टन ठोस कचरा पैदा होता है, जबकि वहां शोधित करने की क्षमता सिर्फ 240 टन प्रतिदिन है।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों को स्थायी समाधान निकालना होगा अन्यथा हमें बताएं कि दिल्ली में किस श्रेणी के निर्माण पर हम रोक लगा दें। हम कठोर आदेश जारी करेंगे। पीठ ने सवाल किया कि क्या किसी अधिकारी ने इस बात का अनुमान लगाने की कोशिश की है कि आगामी वर्षों में दिल्ली में अशोधित ठोस कचरे की मात्रा में कितनी वृद्धि होगी। इस पर एमसीडी के वकील ने दिल्ली के 2041 के ड्राफ्ट मास्टर प्लान के हवाले से बताया कि इसमें तीन प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि होगी। मामले की अगली सुनवाई 26 जुलाई को होगी।

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