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बढ़ती उम्र के साथ डिमेंशिया का ख़तरा बढ़ता जा रहा है जो बुढ़ापे में दिमाग को तेज़ बनाए रखने की ज़रूरत को बताता है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि विकसित होती तकनीक ने हमारे कामों को आसान बनाकर हमारी याद्दाश्त पर भी असर डाला है क्योंकि अब हर चीज़ याद रखने की ज़रूरत नहीं रह गई है.
वे कहती हैं, “हम किसी भी उम्र में रोज़मर्रा की जिंदगी में छोटे-छोटे बदलाव से भी दिमाग की सेहत सुधार सकते हैं.”
वैज्ञानिक शोधों से पता लगा है कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए हमें खुद को कुछ चुनौतीपूर्ण कामों में लगाना चाहिए.
ऐसा करने के तीन सरल तरीके बताए गए हैं-
1- रास्तों को पहचानना दिमाग तेज़ करेगा
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यह हिस्सा ही नेविगेशन व रास्तों की पहचान के लिए के लिए अहम है.
यूके के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के न्यूरोलॉजिस्ट डेनिस चान को अल्ज़ाइमर के शुरूआती लक्षणों की पहचान करने में विशेषज्ञता हासिल है.
वे कहते हैं, “कई साल से हम देख रहे हैं कि रास्ता भटक जाना अल्ज़ाइमर के पीड़ितों का एक शुरुआती लक्षण है. ऐसे में ज़रूरी है कि जितनी जल्दी संज्ञानात्मक बीमारों की पहचान हो, उतनी जल्दी अल्ज़ाइमर का इलाज किया जा सकता है.”
अब लोग रास्तों का पता लगाने के लिए तकनीक पर ज़्यादा निर्भर हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों का सुझाव है कि अगर लोग मोबाइल जीपीएस के बिना रास्ता ढूंढने की कोशिश करें, नई जगहों पर घूमें व दिशाओं का ध्यान रखें तो यह मददगार हो सकता है.
2- सामाजिक रूप से सक्रिय रखें
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दोस्तों और परिवार से जुड़े रहना दिमाग के लिए बहुत फ़ायदेमंद माना गया है. शोध में पाया गया है कि यह हमें कॉग्नेटिव डिक्लाइन यानी संज्ञानात्मक गिरावट से बचाता है.
एक बड़ी ऑब्जर्वेशनल स्टडी में देखा गया कि जो लोग अधेड़ उम्र में और उसके बाद भी सामाजिक रूप से सक्रिय रहते हैं, उनमें स्मृति लोप या डिमेंशिया का खतरा 30-50% तक कम होता है.
दरअसल सामाजिक संपर्क तनाव कम करते हुए दिमाग को कई तरह से सक्रिय रखता है. यह भी पाया गया है कि सौ साल से अधिक जीने वाले ऐसे लोग दिमाग के स्तर पर स्वस्थ होते हैं जो ज्यादा सामाजिक मेलजोल रखते हैं.
एक शोध में यह भी पाया कि सामाजिक रूप से सक्रिय रहना डिमेंशिया के लक्षणों को टाल भी सकता है.
1,923 बुजुर्ग लोगों पर एक स्टडी की गई थी. इन सभी को आगे चलकर डिमेंशिया हुआ.
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किंग्स कॉलेज लंदन की महामारी विज्ञानी पामेला अल्मेडा-मेज़ा कहती हैं, “लोगों से चर्चा करने, बहस करने और विचारों को साझा जैसे काम हमारे दिमाग के लिए एक सुरक्षात्मक कारक हो सकते हैं.”
वो कहती हैं, “जब हम दूसरों के साथ बातचीत करते हैं, तो हम भाषा से लेकर याददाश्त और भविष्य की योजना बनाने तक में दिमाग के कई हिस्सों का इस्तेमाल कर रहे होते हैं.”
वहीं, मनोवैज्ञानिक एलन गो का कहना है, “अच्छे सामाजिक संबंध शारीरिक तनाव पैदा करने वाले कारकों की चेन को कम करते हैं.”
3. जीवन भर सीखते रहना दिमाग तेज़ करेगा

नई चीजें सीखना दिमाग को स्वस्थ रखने का बेहतरीन तरीका है, जैसे – नई किताब पढ़ना, बागवानी करना या कोई नई स्किल सीखना.
दरअसल हमारा मस्तिष्क चुनौतियों और रोज़ नए कामों पर फलता-फूलता है क्योंकि ऐसा करने से मस्तिष्क के वे क्षेत्र मजबूत होते हैं जिन पर उम्र बढ़ने का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है.
न्यूरोलॉजिस्ट डेनिस चान कहते हैं, “सीखने की प्रक्रिया नई मस्तिष्क कोशिकाएं बनाती है और साथ ही मौजूदा कोशिकाओं को मजबूत करती है. जो उम्र बढ़ने और कोशिकाओं के खत्म होने के खिलाफ एक ढाल के रूप में काम करती है. इससे लोगों को अल्ज़ाइमर के खिलाफ ताक़त मिलती है.”
अल्मेडा-मेज़ा और उनके सहयोगियों ने छोटी उम्र के बच्चों से लेकर 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों के ऊपर एक लंबा अध्ययन किया.
जिन लोगों ने इसे विकसित किया, उनमें याददाश्त की गिरावट कम देखी गई. यहां तक की उनमें भी लाभ देगा गया जिनका बचपन में हुआ कॉग्नेटिव टेस्ट स्कोर कम था.
(मेलिसा बीबीसी में वरिष्ठ स्वास्थ्य संवाददाता हैं. उन्होंने दो किताबें लिखी हैं ब्रेडविनर्स (2025) और द मदरहुड कॉम्प्लेक्स)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.