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दुनिया में रिन्यूएबल इलेक्ट्रिसिटी यानी नवीकरणीय बिजली का इस्तेमाल बढ़ रहा है. इस तरह की बिजली जीवाश्म ईंधन की बजाए सूरज और हवा जैसे ऊर्जा के स्रोत से तैयार की जाती है.
ऐसे में जब सूरज की रोशनी न हो और हवा न चले, तो उस ऊर्जा को स्टोर करने की ज़रूरत भी बढ़ रही है.
जहां कुछ लोग लिथियम बैटरियों की ओर रुख़ कर रहे हैं और कुछ पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज की ओर, वहीं एक छोटा लेकिन बढ़ता हुआ उद्योग इस बात पर आश्वस्त है कि इसका एक बेहतर समाधान भी है: बैटरियां जो हवा पर निर्भर करती हैं.
उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड के कैरिंगटन गांव के पास, दुनिया के पहले कमर्शियल लेवल के लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज फ़ैसिलिटी की नींव रखी जा रही है. यहां स्टोर की गई एनर्जी ज़रूरत पड़ने पर यानी जब मांग सप्लाई से अधिक होगी, तब इस्तेमाल की जा सकेगी.
अगर यह प्रोजेक्ट सफल रहा, तो ऐसे और भी प्रोजेक्ट शुरू होंगे.
फ़िलहाल यह तकनीक महंगी है. लेकिन जैसे-जैसे स्वच्छ ऊर्जा के भंडारण यानी स्टोरेज की ज़रूरत बढ़ेगी, हाईव्यू पावर कंपनी के डेवलपर्स का मानना है कि चीज़ें लिक्विड एयर के पक्ष में होंगी.
रिन्यूएबल एनर्जी की ज़रूरत, लेकिन इसकी चुनौती क्या है?
अगर दुनिया को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करनी है और जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचना है, तो नवीकरणीय ऊर्जा या रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल ज़रूरी है. लेकिन ऐसा करने से इलेक्ट्रिसिटी ग्रिडों के लिए मुश्किलें खड़ी होती हैं.
इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड आपस में जुड़ा हुआ नेटवर्क होता है, जो पावर प्लांट, ट्रांसमिशन लाइन, सबस्टेशन और डिस्ट्रीब्यूशन लाइन के ज़रिए पावर बनाने वाले सोर्स से कंज़्यूमर तक बिजली पहुंचाता है.
कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाने वाले पावर प्लांट ज़्यादातर अपनी मर्ज़ी से चालू और बंद किए जा सकते हैं, जिससे बिजली की एक निश्चित आपूर्ति मिलती है और इसे मांग के मुताबिक़ पूरा भी किया जा सकता है.
वहीं नवीकरणीय ऊर्जा रुक-रुक कर मिलती है. इसका मतलब है कि कभी-कभी पर्याप्त बिजली नहीं बन पाती, जिससे बिजली कटौती का ख़तरा रहता है, और कभी-कभी बहुत ज़्यादा बिजली पैदा हो जाती है- जैसे बहुत तेज़ हवा वाले दिनों में, जिससे ग्रिड को नुक़सान पहुंच सकता है.
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इसका एक समाधान ये है कि अतिरिक्त ऊर्जा को स्टोर किया जाए ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके. इससे पर्याप्त रूप से सप्लाई में मदद मिलती है और ग्रिड को नुक़सान का ख़तरा कम होता है.
हाल ही में, जैसे-जैसे ऊर्जा भंडारण की मांग बढ़ी है, बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज सिस्टम बनाए गए हैं.
लिक्विड एयर से क्या हासिल होगा?
यह प्रक्रिया तीन चरणों में काम करती है. सबसे पहले, आसपास से हवा ली जाती है और उसे साफ़ किया जाता है. दूसरे चरण में, हवा को बार-बार तब तक कम्प्रेस यानी दबाया जाता है, जब तक कि उसका दबाव बहुत ज़्यादा न हो जाए. तीसरे चरण में, हवा को तब तक ठंडा किया जाता है जब तक कि वह लिक्विड में न बदल जाए.
इसमें एक मल्टी-स्ट्रीम हीट एक्सचेंजर का इस्तेमाल किया जाता है. ये एक ऐसी डिवाइस है, जिसमें पदार्थों को अलग-अलग तापमान पर ले जाने के लिए कई चैनल और ट्यूब होते हैं, जिससे उनके बीच नियंत्रित तरीके़ से ऊष्मा ट्रांसफ़र होती है.
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मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में एनर्जी स्टोरेज सिस्टम पर काम करने वाली केमिकल इंजीनियर शायलिन सेटेगेन कहती हैं, “हम ग्रिड से जो ऊर्जा खींच रहे हैं, वह इस चार्जिंग प्रक्रिया को मज़बूती दे रही है.”
जब ग्रिड को अतिरिक्त ऊर्जा की ज़रूरत होती है, तो लिक्विड एयर का इस्तेमाल किया जाता है. इसे स्टोरेज से बाहर पंप करके भाप में बदला जाता है और इस तरह ये फिर से गैस में बदल जाती है. फिर इसका इस्तेमाल टर्बाइन चलाने में किया जाता है, जिससे ग्रिड के लिए बिजली पैदा होती है.
इसके बाद, हवा को वापस वायुमंडल में छोड़ दिया जाता है.
लिक्विड एयर एनर्जी स्टोर करने का भविष्य
हाईव्यू पावर के मुताबिक़, ये फ़ैसिलिटी 300 मेगावाट-घंटे का स्टोरेज और छह घंटे के लिए 50 मेगावाट का आउटपुट देगी, जिससे “480,000 घरों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साफ़ और रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज हो सकेगी.”
मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिचर्ड बटलैंड ने कहा कि यह दो चरणों में होगा.
अगस्त 2026 में, टर्बाइन का काम शुरू हो जाएगा. इससे बिजली तो नहीं बनेगी, लेकिन इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड को स्टेबल करने में मदद मिलेगी.
बटलैंड कहते हैं कि अभी, ग्रिड ऑपरेटर कभी-कभी ग्रिड को स्टेबल करने के लिए गैस से चलने वाले पावर प्लांट चालू कर रहे हैं. वो कहते हैं, “यह सिस्टम के लिए बहुत बड़ी लागत है.”
ग्रिड को स्टेबल करने का दूसरा तरीक़ा देकर, “हम उन्हें ऐसा करने से रोक सकते हैं.”
फिर 2027 में लिक्विड एयर स्टोरेज का काम शुरू होने की उम्मीद है. हाईव्यू का इरादा ग्रिड को बिजली बेचकर पैसे कमाने का है, तब जब इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो.
सेटेगेन कहती हैं कि ऊर्जा भंडारण एक ज़रूरी तकनीक तो है, लेकिन इसकी आर्थिक स्थिति चुनौती वाली है. मार्च में आई एक स्टडी में उन्होंने और उनके सहयोगियों ने इस बात का आकलन किया कि अमेरिका के 18 क्षेत्रों में लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज को लेकर क्या संभावना बनती है.
उन्होंने आठ अलग-अलग डीकार्बनाइज़ेशन स्थितियों की तुलना की, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल अलग-अलग था. सभी मामलों में, उन्होंने अनुमान लगाया कि एक प्रोजेक्ट 40 साल में बिजली ख़रीद कर और बेचकर कितना पैसा कमा सकता है.
सबसे ज़्यादा आक्रामक डीकार्बनाइज़ेशन सिनेरियो में, लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज फ्लोरिडा और टेक्सस में बेहतर तरीके़ से संभव था, लेकिन और कहीं नहीं.
सेटेगेन कहती हैं, “हमें दूसरे डीकार्बनाइज़ेशन स्थितियों में कोई भी ऐसा सिस्टम नहीं दिखा, जो लंबे समय तक चल सके और जिसमें फ़ायदा लागत से ज़्यादा हो.”
हालांकि, सेटेगेन ये भी कहती हैं कि इसका मतलब ये नहीं है कि लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज एक बुरा विचार है.
उनकी स्टडी में पाया गया कि पंप्ड हाइड्रो और बैटरी जैसे एनर्जी स्टोरेज के दूसरे तरीके़ आर्थिक रूप से और भी कम फ़ायदेमंद थे.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सबसे बड़ी समस्या यह थी कि स्टोरेज फ़ैसिलिटीज़ शुरुआत में ज़्यादा कमाई नहीं कर सकीं, क्योंकि अमेरिकी ग्रिड में कीमतों में बदलाव के लिए पर्याप्त नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत नहीं थे.
वह कहती हैं, “(प्रोजेक्ट के) शुरुआती वर्षों में इस सिस्टम का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं हो रहा था.”
सेटेगेन का कहना है कि लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज की सुविधा देने वाले लोग कुछ साल इंतज़ार कर सकते हैं, जब तक कि नवीकरणीय ऊर्जा के कारण क़ीमतों में बदलाव न आ जाए, लेकिन ऐसा करने से एनर्जी ट्रांज़िशन में रुकावट आएगी.
इसके बजाय, वह कहती हैं कि सरकारें इस तकनीक का समर्थन कर सकती हैं. अपनी स्टडी में, उन्होंने कहा कि इन फैसिलिटीज़ को स्थापित करने की शुरुआती लागत में सब्सिडी देना एक तरीक़ा हो सकता है.
इसके अलावा, नवीकरणीय ऊर्जा को तेज़ी से अपनाने के कारण ऊर्जा की क़ीमतों में बदलाव होगा, जिससे ऊर्जा भंडारण आर्थिक रूप से ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा.
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सेटेगेन लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज के पक्ष में एक अंतिम बात रखती हैं: यह सस्ता है. एनर्जी स्टोरेज टेक्नोलॉजी को अक्सर ‘लेवलाइज़्ड कॉस्ट ऑफ़ स्टोरेज’ नाम के एक मीट्रिक के इस्तेमाल से आंका जाता है. इससे ये अनुमान लगाया जाता है कि प्रोजेक्ट के दौरान स्टोर की गई एनर्जी की हर यूनिट की लागत कितनी होगी.
लिक्विड एयर के लिए, यह प्रति मेगावाट-घंटा 45 डॉलर (लगभग चार हज़ार रुपये) तक हो सकती है- जबकि पंप किए गए हाइड्रो के लिए यह 120 डॉलर (लगभग 10 हज़ार 705 रुपये) और लिथियम-आयन बैटरियों के लिए 175 डॉलर (लगभग 15 हज़ार 612 रुपये) होती है.
सेटेगेन कहती हैं, “हालांकि नीतिगत समर्थन के बिना इनमें से कोई भी स्टोरेज मेथड आर्थिक रूप से बेहतर नहीं है, लेकिन बड़े पैमाने पर भंडारण के लिए लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज विशेष रूप से लागत प्रभावी विकल्प है.”
बटलैंड उम्मीद करते हैं कि इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड तरह-तरह की भंडारण तकनीकों पर निर्भर होंगी. पंप्ड हाइड्रो बेहद प्रभावी है और दशकों तक काम करता है, लेकिन यह स्थान पर निर्भर करता है क्योंकि इसे पानी की ज़रूरत होती है.
वहीं, बैटरियां काफ़ी बेहतर होती हैं और इन्हें कहीं भी रखा जा सकता है, लेकिन लगभग 10 साल बाद इन्हें बदलना पड़ता है. लिक्विड एयर का फ़ायदा यह है कि यह बैटरियों की तुलना में कम से कम नुक़सान के साथ अधिक समय तक एनर्जी स्टोर कर सकता है.
जब कोई देश ग्रीन ट्रांज़िशन की ओर बढ़ता है, उसके बिजली ग्रिड को नए सिरे से तैयार करने की ज़रूरत होती है.
बटलैंड कहते हैं, “हम नई पीढ़ी के आधार पर दुनिया भर में सभी ग्रिडों को फिर से बना रहे हैं.” और इसका मतलब बहुत से लिक्विड एयर एनर्जी स्टोरेज हो सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.