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महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार की बुधवार को एक विमान हादसे में मौत हो गई.
66 साल के अजित पवार का विमान महाराष्ट्र के बारामती में लैंड करने की कोशिश कर रहा था, तभी यह हादसा हुआ. विमान में सवार सभी पांच लोगों की मौत हो गई है.
अजित पवार ने जुलाई 2023 में अपने चाचा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में बग़ावत कर दी थी.
2023 में दो जुलाई को वो अपनी पार्टी के आठ अन्य सदस्यों के साथ महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गए थे. अजित पवार को तब एकनाथ शिंदे की सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाया गया था.
एक जुलाई तक वह महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे. पवार आख़िरकार बीजेपी खेमे में पहुंच गए थे. कहा जाता है कि अजित पवार इसकी कोशिश 2019 से ही कर रहे थे.
शरद पवार से बग़ावत कर एकनाथ शिंदे सरकार में शामिल होने के अपने फ़ैसले पर अजित पवार ने कहा था, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत प्रगति कर रहा है. इसलिए बीजेपी के साथ कुछ मतभेद होने के बावजूद एनसीपी ने महाराष्ट्र की प्रगति के लिए सरकार के साथ हाथ मिलाने का फ़ैसला किया है.”
अजित पवार का यह रुख़ शरद पवार के लिए न केवल राजनीतिक झटका था बल्कि भावनात्मक रूप से भी दुख पहुँचाने वाला था.
तब शरद पवार ने इस दल-बदल के लिए प्रधानमंत्री मोदी को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि वह इसके मुख्य सूत्रधार हैं.
उन्होंने कहा था, “मैं राज्य के लोगों के पास जाऊंगा और उन्हें बताऊंगा कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी शक्ति का उपयोग कर यह सब कर रहे हैं.”
2023 में तीन जुलाई से शरद ने महाराष्ट्र का दौरा शुरू कर दिया था. तीन जुलाई को शरद पवार सतारा ज़िले के शहर कराड पहुंचे थे, जो उनके मार्गदर्शक यशवंतराव चव्हाण का गृहनगर है.
उन्होंने चव्हाण की समाधि पर दर्शन करने के बाद कहा था कि वह पार्टी को फिर से खड़ा करेंगे.
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2024 के चुनाव में चाचा पर भारी पड़े
यह पूछे जाने पर कि क्या पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न अजित पवार गुट को मिल जाएगा? इस पर शरद पवार ने कहा था, “मैं कई चुनाव अलग-अलग चिह्नों पर और चार अलग अलग पार्टियों के नाम से लड़ चुका हूँ. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मैं अदालत नहीं जाऊंगा. मैं लोगों के पास जाऊंगा. मुझे महाराष्ट्र के लोगों पर, ख़ासकर युवाओं पर पूरा भरोसा है.”
नवंबर 2024 में महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए और अजित पवार अपने चाचा पर भारी पड़े. हालांकि छह महीने पहले ही लोकसभा चुनाव में अजित पावर की एनसीपी को केवल एक सीट पर जीत मिली थी.
तब अजित पवार को महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन की सबसे कमज़ोर कड़ी कहा जा रहा था.
लेकिन विधानसभा चुनाव में अजित पवार सबसे मज़बूत खिलाड़ी के रूप में उभरे. इन्होंने 41 विधानसभा सीटें हासिल कीं और लगभग अपने चाचा के विद्रोही गुट एनसीपी (एसपी) को ख़त्म कर दिया है, जो केवल 10 सीटें जीत सका.
अजित पवार ने पाँच दिसंबर 2024 को रिकॉर्ड छठी बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी.
इसके बावजूद अजित पवार लंबे समय से ख़ुद को हाशिये पर महसूस करते रहे थे. खासकर मुख्यमंत्री बनने की अपनी आकांक्षा को लेकर.
कहा जाता है कि 2004 से अजित पवार का मानना था कि उनके चाचा ने उन्हें इस पद के लिए अनुचित रूप से नज़रअंदाज किया.
बार-बार दरकिनार किए जाने की उनकी निराशा अंततः विद्रोह में बदली, जब उन्होंने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और पिछले साल एक बार फिर उप मुख्यमंत्री का पद हासिल किया.
महाराष्ट्र के औरंगाबाद में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर रहे जयदीप डोले कहते हैं कि अजित पवार के मन में एक कसक हमेशा से रही थी कि वह मुख्यमंत्री नहीं बने.
जयदीप डोले कहते हैं, ”2004 में वह मौक़ा आया था, जब अजित पवार मुख्यमंत्री बन सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मुझे लगता है कि अजित पवार और शरद पवार में बुनियादी अंतर यह था कि शरद पवार बहुत पढ़े-लिखे नेता थे लेकिन अजित पवार एक मैनेजर के तौर पर अच्छे थे.”
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अजित पवार की एक कसक
अजित और उनके साथ शामिल हुए एनसीपी के तीन अन्य नेता प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल और हसन मुशरीफ़ ईडी की जांच के दायरे में थे, तब बीजेपी खेमे में आए थे.
जयदीप डोले कहते हैं कि शरद पवार की छाया में 20 से अधिक साल बिताने के बाद उन्हें लगा कि चाचा उनके रास्ते में बाधा बन रहे हैं.
एनसीपी का गठन 1999 में हुआ था. अपनी स्थापना के 25 वर्षों में एनसीपी ने विधानसभा चुनावों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2004 में किया था. तब उसने 71 सीटें जीतीं थीं जबकि कांग्रेस 69 सीटों पर सिमट गई थी.
अजित पवार के लिए मुख्यमंत्री बनने का यह अच्छा मौक़ा था. लेकिन एक सप्ताह की गठबंधन वार्ताओं के बाद कांग्रेस के विलासराव देशमुख को शीर्ष पद मिला और एनसीपी के आर आर पाटिल ने उप मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी.
जयदीप डोले कहते हैं, ”तब भी अजित को एनसीपी के ज़्यादातर विधायकों का समर्थन हासिल था. उनका मानना था कि उस समय यूपीए सरकार में केंद्रीय कृषि मंत्री रहे पवार ने उनसे मुख्यमंत्री पद छीन लिया. संभवतः पवार राज्य की राजनीति में अपने नियंत्रण को छोड़ना नहीं चाहते थे.”
”पारिवारिक समीकरणों ने भी पवार और अजित के रिश्ते को और तनावपूर्ण बना दिया. अपने भतीजे को राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने के बाद शरद पवार ने 2005 में अपनी बेटी को राजनीति में उतारा. राज्यसभा सदस्य के रूप में सुप्रिया सुले ने शुरू में राज्य की राजनीति से दूरी बनाए रखी लेकिन बाद में अजित के लिए एनसीपी के महाराष्ट्र मामलों में उनके हस्तक्षेप की अनदेखी करना मुश्किल हो गया.”
डोले कहते हैं, ”2009 में जब विधानसभा चुनाव के बाद एनसीपी दूसरे स्थान पर खिसक गई तो अजित ने उप मुख्यमंत्री बनने की भरपूर कोशिश की, लेकिन पवार और प्रफुल्ल पटेल ने छगन भुजबल को आगे बढ़ाया. ग़ुस्से में अजित सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए और बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि इसी दौरान बीजेपी ने पहली बार उनसे संपर्क किया और अपने तत्कालीन सहयोगी शिव सेना के साथ मिलकर पवार से अलग होने को कहा.”
2010 में जब कांग्रेस ने आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले में नाम आने के बाद अशोक चव्हाण को हटाकर पृथ्वीराज चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाया, तब अजित उनके उप मुख्यमंत्री बने.
इसके बावजूद अजित असहज रहे. 2012 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया, जब बीजेपी ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल (1999 से 2009) के दौरान उन्होंने वित्तीय लाभ के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया.
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अजित पवार के निधन का असर
पाँच फ़रवरी से महाराष्ट्र ज़िला परिषद पंचायत समिति के चुनाव होने जा रहे हैं. इसी के प्रचार के लिए अजित पवार बारामती जा रहे थे.
यहाँ वह जनसभा भी करने वाले थे. एनसीपी का पूरा दायित्व अजित पवार के ऊपर ही था. अजित पवार का निधन तब हुआ है, जब शरद पवार राजनीतिक रूप से बहुत कमज़ोर हो गए हैं.
जयदीप डोले कहते हैं, ”ज़िला परिषद के चुनाव में अजित पवार अपने चाचा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले थे. अब मुझे लग रहा है कि पूरी सहानुभूति शरद पवार के साथ जाएगी. बीजेपी के उभार के बाद से महाराष्ट्र में मराठा नेताओं की हैसियत कमज़ोर हुई है और इसका अहसास प्रदेश में सबको है.”
”मराठा जाति का वर्चस्व खेती, शिक्षा और बैंकिंग पर ख़त्म हो चुका है. शरद पवार के साथ अब मराठा जाति की सहानुभूति आएगी. ग्रामीण महाराष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था पर अब भी मराठा जाति की पकड़ है और इन्हें अब लग रहा है कि बीजेपी के आने से उनकी पकड़ कमज़ोर पड़ रही है.”
देवेंद्र फडणवीस की सरकार में एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिव सेना और अजित पवार की अगुआई वाली एनसीपी है. 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी ने 2024 के विधानसभा चुनाव में 132 सीटें जीती थीं.
यानी साधारण बहुमत से 12 सीटें कम हैं. इस सरकार के साथ शिव सेना के 57 विधायाक हैं और 41 विधायक एनसीपी के. अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी अगर इस सरकार से हट जाती है, तब भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.
लेकिन जयदीप डोले कहते हैं कि भले सरकार सत्ता में बनी रहेगी लेकिन फ़र्क़ दूसरी तरह से पड़ेगा. वह कहते हैं, ”मराठा जाति अजित पवार के निधन के बाद सोचेगी कि अब उनके पास कौन है? शरद पवार ख़ुद ही जीवन के सांध्य काल में हैं. पूरा मराठा तबका अब सोचेगा कि उन्हें किस तरफ़ रुख़ करना है.”
महाराष्ट्र में द हिन्दू की ब्यूरो चीफ़ विनया देशपांडे कहती हैं कि अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में हिन्दुत्व के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी ताक़त बनाए हुए थे और यह बड़ी बात थी.
विनया देशपांडे कहती हैं, ”बीजेपी और शिव सेना दोनों हिन्दुत्व की राजनीति करती है. शिवसेना क्षेत्रीय पार्टी होकर भी वैचारिक रूप से राष्ट्रीय है. ऐसे में अजित पवार महाराष्ट्र की क्षेत्रीय राजनीति के बड़े नेता थे. उन्होंने पिछले चुनाव में यह भी साबित कर दिया था कि एनसीपी पर पकड़ उन्हीं की है न कि शरद पवार की.”
विनया देशपांडे कहती हैं, ”बीजेपी की अगुआई वाली सरकार स्थिर रहेगी लेकिन मराठा राजनीति का उभार हो सकता है. एनसीपी फिर से शरद पवार के नेतृत्व में एकजुट हो सकती है और यह बीजेपी की मज़बूती के हक़ में नहीं होगी.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.