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भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने शनिवार को युवा दिवस पर दिए भाषण में भारत के युवाओं से इतिहास का प्रतिशोध लेने का आह्वान किया.
अपने इस भाषण में अजित डोभाल ने कहा था, “इतिहास हमें एक चुनौती देता है. हर युवक के अंदर वो आग होनी चाहिए. प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है लेकिन प्रतिशोध भी अपने आप में भारी शक्ति है. हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है.”
अजित डोभाल के इस बयान को लेकर जहाँ बहस छिड़ गई है, वहीं ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि डोभाल भारत के किस इतिहास की बात कर रहे हैं और वो किससे प्रतिशोध लेने का आह्वान कर रहे हैं.
वहीं कुछ विश्लेषकों का यह तर्क भी है कि अजित डोभाल के शब्दों को जिस अर्थ में लिया जा रहा है, उनका मतलब वह नहीं था बल्कि यह कहना चाह रहे थे कि भारत ने इतिहास में जो ग़लतियां की हैं, वे आगे नहीं होनी चाहिए.
इस भाषण पर बहस के बीच अजित डोभाल या सरकार की तरफ़ से कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं आया है.
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अजित डोभाल ने अपने भाषण में क्या कहा?
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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने युवा दिवस के मौक़े पर ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग- 2026′ में 34 मिनट लंबा भाषण दिया.
अपने इस भाषण में उन्होंने सपनों की बात की, निर्णय लेने की क्षमता पर ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि एक दिन भारत विकसित होगा ही, सवाल ये है कि इस विकसित भारत का नेतृत्व कौन करेगा.
उन्होंने प्रेरणा और अनुशासन की बात की. डोभाल ने कहा कि प्रेरणा अस्थायी होती है जबकि अनुशासन सहनशीलता है. उन्होंने कहा, “काम को टालिए मत, टालने की आदत जीवन की सबसे ख़तरनाक आदत बन जाती है.”
उन्होंने कहा, “इच्छाशक्ति जब लोगों में होती है, वही आगे चलकर राष्ट्र की शक्ति बनती है.”
युद्धों का हवाला देते हुए अजित डोभाल ने कहा, “युद्ध लाशें देखने के लिए नहीं लड़े जाते, युद्ध किसी देश के मनोबल को तोड़ने के लिए लड़े जाते हैं. अगर आपके पास सब कुछ है लेकिन मनोबल नहीं है, तो आपके अस्त्र-शस्त्र भी व्यर्थ हो जाते हैं.”
इसी भाषण के एक हिस्से में उन्होंने युवाओं से इतिहास का प्रतिशोध लेने का आह्वान किया. हालांकि, डोभाल ने ‘प्रतिशोध’ शब्द का इस्तेमाल अपने भाषण के एक सीमित हिस्से में किया जबकि उनके भाषण का अधिकांश भाग नेतृत्व, अनुशासन और राष्ट्रनिर्माण पर केंद्रित था.
अजित डोभाल ने ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग- 2026’ में मौजूद युवा दर्शकों को संबोधित करते हुए मंच से कहा, “आप बहुत भाग्यवान हैं कि आप उस भारत में पैदा हुए, जो स्वतंत्र है. भारत हमेशा ऐसा नहीं था, जितना स्वतंत्र आपको दिखाई देता है. हमारे पूर्वजों ने इसके लिए बहुत क़ुर्बानियाँ सहन की हैं, बहुत अपमान सहन किए हैं, असहायता के दौर से गुज़रे हैं. कई लोगों को फांसी हुई है. भगत सिंह को फांसी के फंदे को स्वीकार करना पड़ा. सुभाष चंद्र बोस को जीवनभर संघर्ष करना पड़ा, महात्मा गांधी को सत्याग्रह करना पड़ा और अनगिनत लोगों को जान देनी पड़ी.”
उन्होंने कहा, “हमारे गांव जले, हमारी सभ्यता को समाप्त किया गया, हमारे मंदिरों को लूटा गया. हम मूकदर्शक की तरह असहाय होकर देखते रहे. ये इतिहास हमें चुनौती देता है. प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है, लेकिन प्रतिशोध भी अपने आप में बड़ी भारी शक्ति है.”
उन्होंने कहा, “हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है. हमें इस देश को फिर वहां पहुंचाना है, जहाँ पर हम अपने हक़, अपने विचार और अपनी आस्थाओं के आधार पर एक महान भारत का निर्माण कर सकें.”
डोभाल ने कहा, “हमारी एक बड़ी विकसित सभ्यता थी. हमने किसी के मंदिर नहीं तोड़े, हमने कहीं जाकर लूटा नहीं, हमने बाहर के लोगों पर आक्रमण नहीं किया. सारी दुनिया बहुत पिछड़ी हुई थी. परंतु हम अपनी सुरक्षा और हम अपने आप को समझ नहीं पाए कि क्या ख़तरे हैं, हम उनके प्रति उदासीन रहे. इतिहास ने हमें एक सबक़ सिखाया. क्या हमने वह सबक़ सीखा, क्या हम उस सबक़ को याद रखेंगे? अगर आने वाली पीढ़ियाँ उस सबक़ को भूल जाएंगी, तो इस देश की सबसे बड़ी ट्रेजडी होगी.”
अजित डोभाल ने अपने भाषण में यहूदियों का हवाला देते हुए उनके संघर्ष का ज़िक्र किया और इसे एक उदाहरण की तरह पेश करते हुए कहा, “सेंट पीटर्सबर्ग में एक बहुत बूढ़ा रब्बी रहता था. वहां के बिशप से उसकी अच्छी दोस्ती थी. एक दिन बिशप रब्बी के घर आया. रब्बी की उम्र 80-85 साल थी, उसकी आँखों में आँसू थे, वह कुछ सोच रहा था. बिशप ने पूछा- क्या सोच रहे थे? रब्बी ने कहा- मैं यह सोच रहा था कि यहूदियों का क्या होगा?”
“बिशप ने फिर पूछा कि तुम पिछले 2000 सालों से संघर्ष कर रहे हो, यातनाएं सह रहे हो, क्या तुम्हें इस बात का रोना आ रहा है. रब्बी ने जवाब दिया-मेरे विचार में ये ख़्याल आया कि इन हज़ारों सालों तक संघर्ष की जिस परंपरा से इस आग को जिंदा रखा है, कहीं आने वाली पीढ़ियाँ इसको भूल तो नहीं जाएंगी कि हमें ख़ुद को फिर से शक्तिशाली बनाना है, अपनी रक्षा करनी है.”
ये उदाहरण देने के बाद डोभाल ने कहा, “ये भाव था, ये बड़ा पावरफुल सेंटीमेंट है. हमें उस सेंटीमेंट से ही प्रेरित होना चाहिए. कई सारी ऐसी बातें होती हैं, हमारे ऊपर कई तरह के आघात होते हैं, जिससे हमें लगता है कि अगर हमारे साथ अन्याय या दुर्व्यवहार हुआ है. हमारे गांव जलाए गए. हमारी मातृशक्ति को अपमानित किया. तो हम भी अपने आप को इतना मज़बूत करेंगे. आर्थिक, रक्षा और तकनीक समेत हर क्षेत्र में आगे बढ़ना है.”
डोभाल ने वर्तमान सरकार को लेकर कहा, “मनोबल बनाए रखने के लिए लीडरशिप ज़रूरी होती है. आज हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमारे देश में ऐसा नेतृत्व है. एक ऐसा लीडर है, जिसने 10 वर्षों में देश को कहां से कहां पहुंचा दिया.”
अजित डोभाल अपने इस तर्क में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हवाला दे रहे थे जो साल 2014 के बाद से लगातार भारत के प्रधानमंत्री हैं.
बयान पर राजनीतिक बहस
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अजित डोभाल के इस बयान के बाद विपक्ष के कई नेताओं इस पर निशाना साधा है, वहीं कई विश्लेषक यह सवाल पूछ रहे हैं कि आख़िर डोभाल बदला किससे लेना चाहते हैं.
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा , “यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि डोभाल जैसे उच्च पदस्थ अधिकारी, जिनका कर्तव्य देश को आंतरिक और बाहरी नापाक मंसूबों से बचाना है, उन्होंने घृणा की सांप्रदायिक विचारधारा में शामिल होकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा को सामान्य बना दिया है.”
वहीं कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ शमा मोहम्मद ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, “अजित डोभाल को सबसे पहले देश को जवाब देना होगा कि पुलवामा और पहलगाम हमलों के पीछे के आतंकवादी कहां हैं? दिल्ली में हुए विस्फोट को किसने अंजाम दिया?”
बीजेपी ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. निखिल आनंद ने कहा, “कृपया हैरान न हों. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने जो कुछ भी कहा है, वह उचित है. देश और उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में है. वे उन लोगों के ख़िलाफ़ संदेश जारी कर रहे हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरे और भारत की एकता और अखंडता के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं. इतिहास का फ़ैसला उचित और सत्यनिष्ठा से होना चाहिए. लोगों को भयभीत नहीं होना चाहिए बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों को सुनने का धैर्य रखना चाहिए.”
निशाना किस पर?
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भारत के इतिहास में एक लंबा दौर ऐसा रहा है, जब बड़े भू-भाग पर बाहर से आए लोगों ने शासन किया. इनमें तुर्क, अफ़ग़ान, ब्रितानी, डच और पुर्तगालियों समेत कई राष्ट्रीयताओं और नस्लों के लोग शामिल हैं.
स्वतंत्र राष्ट्र बनने से पहले अंग्रेज़ों ने 200 सालों तक भारत के अधिकतर भूभाग पर शासन किया.
इतिहासकार यह भी मानते हैं कि भारत का इतिहास आक्रमण, समावेशन और सह-अस्तित्व, इन तीनों का ही मिश्रण रहा है.
ऐसे में, अजित डोभाल के इस बयान के बाद ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि वो किससे प्रतिशोध लेने की बात कर रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषक अदिति फडनीस कहती हैं, “डोभाल प्रतिशोध की बात कर रहे हैं. आज भारत को ये प्रतिशोध किससे लेना है- ब्रिटेन से, अफ़ग़ानिस्तान से, उज़्बेकिस्तान से, तुर्की से या हर उस देश से जहाँ से इतिहास के किसी दौर में भारत पर आक्रमण हुआ.”
ऐसा ही तर्क देते हुए प्रोफ़ेसर आदित्य मुखर्जी कहते हैं, “क्या भारत आज ब्रिटेन से प्रतिशोध लेने का सोच सकता है?”
अदिति फडनीस यह भी कहती हैं कि अजित डोभाल के इस बयान को बहुत अधिक तवज्जो नहीं देनी चाहिए क्योंकि भारत की जनता ने उन्हें नहीं चुना हैं, वह सिर्फ़ केंद्र सरकार की एक नौकरी में हैं.
वहीं ऑब्ज़रवर रिसर्च फ़ाउंडेशन के सीनियर फेलो और विश्लेषक सुशांत सरीन का मानना है कि अजित डोभाल ने प्रतिशोध शब्द का इस्तेमाल ज़रूर किया है लेकिन उनका मतलब किसी को किसी से प्रतिशोध लेने के लिए उकसाना नहीं था बल्कि वो यह कहना चाह रहे थे कि भारत के इतिहास में जो हुआ है, वह भविष्य में नहीं होना चाहिए.
सुशांत सरीन कहते हैं, “वो इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि इतिहास में भारत के साथ जो हुआ, जिस तरह से भारत कमज़ोर पड़ा, भारत ने ख़ुद को हमलों के लिए खुला छोड़ दिया, उस इतिहास से सीखने की ज़रूरत है. डोभाल ने उसे इतिहास से प्रतिशोध बोल दिया और इसे दूसरे अर्थों में लिया जा रह है. वह इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि भारत को अपने इतिहास से सबक लेने की ज़रूरत है ताकि भविष्य में कभी ऐसा ना हो सके और भारत दोबारा अपने उस दौर में लौट सके जब उसकी जीडीपी दुनिया की एक चौथाई थी.”
प्रतिशोध को लेकर सवाल
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अदिति फडनीस कहती हैं, “जब इस तरह के अहम पद पर बैठा आदमी कहता है कि प्रतिशोध लेना चाहिए तो सवाल उठता है कि ये प्रतिशोध किसके ख़िलाफ़ लेना चाहिए? ”
प्रोफ़ेसर आदित्य मुखर्जी कहते हैं कि मौजूदा दौर में इतिहास को चुनिंदा तरीक़े से इस्तेमाल किया जा रहा है. जहाँ एक घटना को बड़ा बनाकर पेश किया जाता है लेकिन बाक़ी सब अनदेखा कर दिया जाता है.
प्रोफ़ेसर आदित्य मुखर्जी कहते हैं, “आप ज़ोर देकर कहते हैं कि मुग़लों ने या मुसलमान शासकों ने मंदिरों पर हमला किया लेकिन आप ये ज़िक्र नहीं करते कि भारत में कितने बौद्ध मंदिर तोड़े गए तो ये अपने राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए इतिहास का अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करने जैसा है. अगर इतिहास के नाम पर हर समूह एक-दूसरे से बदला लेने लगे तो दुनिया में कोई भी सुरक्षित नहीं बचेगा.”
प्रोफ़ेसर आदित्य मुखर्जी कहते हैं, “आज दो बीमारियाँ फैली हुई हैं. एक, जिनका इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है, वही इतिहास बदलने में लगे हैं; और दूसरी, इतिहास को इस तरह पेश किया जा रहा है कि लोगों के भीतर आपस में लड़ाई पैदा हो.”
वहीं इतिहासकार और राज्यसभा सांसद प्रोफ़ेसर मीनाक्षी जैन का तर्क है कि भारत के इतिहास को एक लंबे समय तक छुपाया गया और अब यह इतिहास से निकलकर वर्तमान में आ गया है.
प्रोफ़ेसर मीनाक्षी जैन कहती हैं, “भारत की सभ्यता और संस्कृति पर जो आक्रमण हुए हैं, आज़ादी के कुछ साल बाद जो इतिहास लिखा गया उसमें इस अतीत के इतिहास को भुलाने की जान बूझकर कोशिश की गई. इतिहास के सिलेबस में ये विषय ही नहीं है. भारत की सभ्यता और संस्कृति ने सदियों तक अपने जिस इतिहास को याद रखा उसे आज़ादी के बाद भुलाने का प्रयास किया गया. लेकिन अब इतिहास निकलकर ख़ुद ही सामने आ रहा है.”
मीनाक्षी जैन कहती हैं, “आज भारत के युवक ख़ुद ही इस इतिहास से प्रभावित हो रहा है, इसे खोज रहा है. युवाओं में इस समर्थन और उत्साह को देखते हुए ही इस पर चर्चा हो रही है. इतिहास अब इतिहास से निकलकर वर्तमान में आ रहा है, वर्तमान को प्रभावित भी कर रहा है.”
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