डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी आपराधिक मामले में पहली बार किसी आरोपित को दोषी ठहराने वाली अपीलीय अदालत को सजा के मामले पर आरोपित की बात सुननी ही होगी। अपीलीय अदालत को आरोपित को दोषी पाए जाने के बाद सिर्फ सजा सुनाने के लिए मामले को ट्रायल कोर्ट को नहीं भेजना चाहिए।
सजा के मामले पर सुनवाई करना और उचित सजा सुनाना अपीलीय अदालत का अनिवार्य कर्तव्य है।जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दुष्कर्म के केस में दोषसिद्धि से जुड़े मामले को नए सिरे से विचार के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट को वापस भेजते हुए यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा, “जिस अदालत ने पहली बार आरोपित को दोषी ठहराया है, तो उसे सजा के मामले पर उसकी बात सुननी होगी। अगर यह ट्रायल कोर्ट है, तो सीआरपीसी की धारा 235(2) लागू होगी। अगर यह अपीलीय अदालत है, जो बरी किए जाने के फैसले को पलटते हुए पहली बार आरोपित को दोषी ठहरा रही है, तो उसे सजा के मामले पर दोषी की बात सुननी होगी।
अपीलीय अदालत, आरोपित को दोषी ठहराने का फैसला सुनाने के बाद सिर्फ सजा सुनाने के मकसद से मामले को निचली अदालत को नहीं सौंप सकती। ऐसा करना सीआरपीसी की धारा 386(ए) और इस अदालत के फैसलों के विपरीत होगा।”
इस मामले में हाई कोर्ट ने आरोपित को दोषी ठहराने के बाद सजा के मामले पर आरोपित की बात सुनने के लिए कोई तिथि तय करने के बजाय, उसे ट्रायल जज के सामने समर्पण करने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि आरोपित के समर्पण करने पर ट्रायल जज उसे हिरासत में लेंगे और कानून के मुताबिक सजा के बिंदु पर सुनवाई करने के बाद आइपीसी धाराओं के तहत उचित सजा सुनाएंगे और लागू करेंगे।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)