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अमेरिका और ईरान ने शुक्रवार को ओमान में परमाणु वार्ता करने पर सहमति जताई है.
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को कड़ी चेतावनी दी थी.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया कि यह बैठक मस्कट में शुक्रवार सुबह 10 बजे शुरू होगी. अमेरिकी अधिकारियों ने भी पुष्टि की है कि बातचीत वहीं होगी.
इससे पहले ऐसा लग रहा था कि बातचीत ख़तरे में पड़ गई है, क्योंकि दोनों देशों के बीच स्थान और बातचीत की शर्तों को लेकर मतभेद थे.
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ट्रंप ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य बल बढ़ा दिए हैं और चेतावनी दी है कि अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं करता और प्रदर्शनकारियों की हत्या नहीं रोकता, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है.
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ख़ामेनेई को चिंता करनी चाहिए, तो उन्होंने बुधवार को एनबीसी न्यूज़ से कहा, “मैं कहूंगा कि उन्हें बहुत ज़्यादा चिंतित होना चाहिए.”
उन्होंने आगे कहा,”जैसा कि आप जानते हैं, वे हमसे बातचीत कर रहे हैं.”
वहीं, ख़ामेनेई ने रविवार को चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया, तो इससे पूरे क्षेत्र में युद्ध भड़क सकता है.
बीबीसी के अमेरिकी साझेदार सीबीएस न्यूज़ से बात करते हुए एक अरब राजनयिक ने बताया कि ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत कभी औपचारिक रूप से रद्द नहीं हुई थी, लेकिन बुधवार सुबह तक स्थिति अनिश्चित बनी हुई थी.
तीन अमेरिकी अधिकारियों ने एक्सियोस की एक रिपोर्ट की भी पुष्टि की, जिसमें कहा गया कि कई अरब और मुस्लिम नेताओं के अनुरोध के बाद दोपहर में बातचीत फिर से पटरी पर आई.
इन नेताओं ने ट्रंप प्रशासन से अपील की थी कि वह बातचीत छोड़ने की धमकी पर अमल न करे.
एक्सियोस के मुताबिक़, अमेरिकी प्रशासन ने अपने सहयोगियों का सम्मान करते हुए इस अनुरोध को माना लेकिन वह बातचीत की सफलता को लेकर “काफी संदेह में” है.
इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि विशेष दूत स्टीव विटकॉफ तुर्की में ईरानी अधिकारियों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के प्रतिनिधियों से मिलने की तैयारी कर रहे थे लेकिन तभी ईरान की भागीदारी को लेकर “विरोधाभासी सूचनाएं” मिलीं.
रूबियो ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि अगर बातचीत को “किसी ठोस नतीजे तक पहुंचना है” तो उसे केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जा सकता, जैसा कि ईरान चाहता है.
उन्होंने कहा, “इन बातचीत में कई मुद्दे शामिल होने चाहिए. इनमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज, पूरे क्षेत्र में चरमपंथी संगठनों को समर्थन, उसका परमाणु कार्यक्रम और अपने ही लोगों के साथ किया जा रहा व्यवहार शामिल है.”
ईरान के विदेश मंत्री ने क्या कहा
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रविवार को सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में अराघची से पूछा गया कि क्या ईरान अमेरिकी मांगों पर चर्चा के लिए तैयार है.
इन मांगों में बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक, ईरान समर्थित मिलिशिया को समर्थन बंद करना और संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन खत्म करना शामिल है.
अराघची ने जवाब दिया, “राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ‘कोई परमाणु हथियार नहीं’, और हम इससे पूरी तरह सहमत हैं. यह एक बहुत अच्छा समझौता हो सकता है. बेशक इसके बदले हम प्रतिबंधों में राहत की उम्मीद करेंगे. ऐसा समझौता संभव है. आइए असंभव बातों पर चर्चा न करें.”
ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा.
हालांकि ट्रंप ने एनबीसी इंटरव्यू में दावा किया कि पिछले साल जून में इसराइल और ईरान के बीच 12 दिनों के युद्ध से पहले ईरान “एक महीने के भीतर परमाणु हथियार बना सकता था”.
उसी दौरान ट्रंप ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हवाई और मिसाइल हमलों का आदेश दिया था.
इस युद्ध के दौरान इसराइली सेना ने भी ईरान के परमाणु ठिकानों, परमाणु वैज्ञानिकों, सैन्य कमांडरों और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया था.
ट्रंप ने कहा कि इन हमलों से ईरान की यूरेनियम संवर्धन क्षमता “पूरी तरह नष्ट” हो गई, लेकिन ईरानी अधिकारी “देश के किसी दूसरे हिस्से में नया परमाणु ठिकाना बनाने” के बारे में सोच रहे थे.
उन्होंने कहा, “हमें इसके बारे में पता चल गया. मैंने कहा, ”अगर आपने ऐसा किया, तो हम आपके साथ बहुत बुरा करेंगे.’
ट्रंप ने ईरान के प्रदर्शनकारियों से यह भी कहा कि “हम उनके साथ खड़े रहे हैं”.
यह टिप्पणी उन्होंने पिछले महीने सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर ईरानी सुरक्षा बलों की सख़्त कार्रवाई के बाद की.
ये विरोध प्रदर्शन ईरानी मुद्रा के गिरने और महंगाई बढ़ने से शुरू हुए थे, लेकिन जल्दी ही राजनीतिक बदलाव की मांग में बदल गए.
सरकार की ओर से 8 जनवरी से इंटरनेट बंद किए जाने के कारण हिंसा में हुई मौतों का पूरा आंकड़ा अब तक सामने नहीं आ सका है.
हालांकि अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी का कहना है कि उसने अब तक 6,445 प्रदर्शनकारियों, 164 बच्चों, 214 सरकारी पक्ष से जुड़े लोगों और 60 राहगीरों की मौत की पुष्टि की है. वह 11,280 अन्य मौतों की रिपोर्ट की भी जांच कर रही है.
ईरानी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि कम से कम 3,117 लोग मारे गए हैं, लेकिन उनका कहना है कि इनमें से अधिकांश सुरक्षा बलों के सदस्य थे या “दंगाइयों” की हिंसा में मारे गए आम लोग थे.
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने इस पूरे आंदोलन को अमेरिका और इज़राइल की रची गई “राजद्रोही साज़िश” बताया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.