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अमेरिका बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी पार्टी के साथ अपने संबंधों को बेहतर करने पर ज़ोर दे रहा है. उसे उम्मीद है कि फ़रवरी महीने में हो रहे आम चुनावों में जमात सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर सकती है.
ख़ास बात यह है कि जमात को एक कट्टरपंथी संगठन और पाकिस्तान के क़रीबी के तौर पर देखा जाता है.
अंग्रेज़ी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिकी प्रशासन का अनुमान है कि बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी ‘जमात’ अगले महीने होने वाले चुनावों में अपना अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकती है, इसलिए अमेरिका उससे बातचीत को आगे बढ़ाने के प्रयास में लगा हुआ है.
‘जमात-ए-इस्लामी संगठन’ पर बांग्लादेश में कई बार प्रतिबंध लगाया गया है. सबसे हाल के समय में शेख़ हसीना के शासनकाल में इस संगठन को प्रतिबंधित किया गया था.
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जमात-ए-इस्लामी पार्टी पारंपरिक रूप से शरिया कानून के आधार पर शासन करने और महिलाओं के काम के समय को कम करने की वकालत करती रही है ताकि वे “अपने बच्चों के प्रति अपने कर्तव्य पूरा कर सकें.”
हालाँकि हाल में इसने अपनी सार्वजनिक छवि को नरम करने और अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश की है.
जमात-ए-इस्लामी के प्रवक्ता मोहम्मद रहमान ने कहा कि पार्टी “भ्रष्टाचार विरोधी, पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन” के मंच पर चुनाव लड़ रही है. उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए काम के घंटे कम करने का प्रस्ताव “प्रारंभिक चरण” में है, और पार्टी की शरिया क़ानून लागू करने की कोई योजना नहीं है.
साल 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जमात के कई नेताओं पर लोगों पर अत्याचार के संगीन आरोप लगे. पार्टी अलग बांग्लादेश का विरोध कर रही थी क्योंकि उसकी निगाह में ये इस्लाम विरोधी था.
भारत में बाबरी विध्वंस के बाद जमात के नेताओं और छात्र संगठन पर बांग्लादेश में हिन्दू विरोधी दंगे भड़काने का भी आरोप भी लगा था.
बांग्लादेश में जैसे-जैसे राजनीतिक तस्वीर बदल रही है, वहां के अमेरिकी राजनयिकों ने संकेत दिया है कि वे फिर से उभरते इस्लामी आंदोलन के साथ काम करने के लिए तैयार हैं.
एक ऑडियो लीक के आधार पर दावा
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वॉशिंगटन पोस्ट को मिली एक ऑडियो रिकॉर्डिंग के मुताबिक़, 1 दिसंबर को बांग्लादेशी महिला पत्रकारों के साथ एक बंद कमरे में हुई बैठक में, ढाका में तैनात एक अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि देश “इस्लामी हो गया है” और उन्होंने भविष्यवाणी की कि जमात-ए-इस्लामी 12 फ़रवरी के चुनाव में “पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन करेगी.”
अमेरिकी राजनयिक ने कहा, “हम चाहते हैं कि वे हमारे दोस्त बनें.”
वॉशिंगटन पोस्ट ने इस राजनयिक का नाम सार्वजनिक नहीं किया है.
अख़बार के मुताबिक़, अमेरिकी राजनयिक ने इस चिंता को कम करके आंका कि जमात बांग्लादेश पर इस्लामी क़ानून की अपनी समझ को थोपने की कोशिश करेगी.
राजनयिक ने कहा, “मुझे विश्वास नहीं होता है कि जमात शरिया थोप सकती है. अगर पार्टी के नेताओं ने ऐसे चिंताजनक क़दम उठाए, तो अमेरिका अगले ही दिन उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ़ लगा देगा.”
जमात-ए-इस्लामी का क्या कहना है?
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द वॉशिंगटन पोस्ट को दिए एक बयान में ढाका में अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शी ने कहा, “दिसंबर में हुई बातचीत एक नियमित बैठक थी. यह अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों और स्थानीय पत्रकारों के बीच ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा थी.”
उन्होंने कहा कि मीटिंग के दौरान “कई राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा हुई” और “अमेरिका किसी एक राजनीतिक पार्टी का दूसरे के मुक़ाबले पक्ष नहीं लेता है और बांग्लादेश के लोग जो भी सरकार चुनेंगे, अमेरिकी सरकार उसके साथ काम करने की योजना बना रही है.”
हालाँकि वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि बांग्लादेश में अमेरिकी राजनयिक एक अहम बदलाव के दौर में देश के राजनीतिक भविष्य को कैसे देखते हैं.
ढाका में दूतावास की बैठक में, अमेरिकी अधिकारी ने संकेत दिया कि जमात-ए-इस्लामी से संपर्क करने के अलावा, मिशन के कर्मचारी हेफ़ाज़त-ए-इस्लाम बांग्लादेश और इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश सहित अन्य रूढ़िवादी इस्लामी राजनीतिक दलों के साथ भी जुड़ सकते हैं.
राजनयिक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है और ऐसी नीतियां लागू करती है जो वॉशिंगटन को मंज़ूर नहीं हैं, तो अमेरिका देश के बड़े कपड़ा उद्योग के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई करेगा.
अधिकारी ने कहा है कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा अमेरिका पर निर्भर करता है. इसमें उन्होंने ख़ास तौर पर बांग्लादेश से होने वाले कपड़े के निर्यात का ज़िक्र किया है.
विश्लेषकों ने कहा कि इससे नई दिल्ली में चिंताएं कम होने की संभावना नहीं है.
भारत ने 2019 में जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी के चैप्टर को एक “ग़ैरकानूनी” समूह घोषित किया था और साल 2024 में विधानसभा चुनाव के दौरान भी इस पर प्रतिबंध लगाया गया था.
यहाँ पहले भी साल 1975 और 1993 में जमात पर पाबंदी लगाई गई थी.
वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक़, जमात-ए-इस्लामी के अमेरिकी प्रवक्ता मोहम्मद रहमान ने एक बयान में कहा कि “हम एक निजी राजनयिक बैठक के दौरान कथित तौर पर की गई टिप्पणियों पर बयान नहीं देना चाहते हैं.”
भारत और अमेरिका संबंधों पर क्या हो सकता है असर
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हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते बेहतर नहीं दिख रहे हैं. दूसरी तरफ मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनने के बाद से भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक तौर पर सबसे बुरे दौर में हैं.
वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक़, अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के सीनियर फ़ेलो माइकल कुगेलमैन ने कहा है कि जमात-ए-इस्लामी के साथ अमेरिकी संपर्क “संभावित रूप से अमेरिका और भारत के बीच एक और दरार पैदा कर सकता है.”
उनका मानना है, “भारत-अमेरिका के बीच संबंध पहले से ही बुरे दौर में हैं, जिसका कारण पाकिस्तान के साथ भारत के हालिया संघर्ष, रूसी तेल की ख़रीद, एक अधूरा व्यापार समझौता और कई भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ़ हैं.”
कुगेलमैन ने कहा, “कई सालों से बांग्लादेश में भारत का सबसे बड़ा डर जमात रहा है. भारत इस पार्टी को पाकिस्तान का सहयोगी मानता है और इसे अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति के लिए ख़तरे के तौर पर देखता है.”
कुगेलमैन का कहना है कि अगर अमेरिका-भारत संबंध “बेहतर स्थिति में होते “तो अमेरिकी चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी के बारे में भारतीय चिंताओं पर अधिक ध्यान देने को तैयार हो सकते थे. लेकिन “साझेदारी की स्थिति बहुत ख़राब होने के कारण… मुझे नहीं लगता कि अमेरिकी अधिकारियों को भारतीय चिंताओं पर इतना ध्यान देने या संवेदनशील होने की ज़रूरत महसूस होगी.”
हालाँकि मोनिका शी ने अपने बयान में लिखा है कि बांग्लादेश चुनावों का “अमेरिका-भारत संबंधों पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा.”
उनका कहना है कि बांग्लादेश और भारत के साथ अमेरिका के संबंध “अपने दम पर कायम हैं.”
जमात ‘मुख्यधारा’ में शामिल
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बांग्लादेश एक सियासी उथल-पुथल पर बना देश है. साल 1971 में युद्ध के बाद पाकिस्तान से आज़ादी मिली. तब से लेकर अब तक बांग्लादेश ने सैन्य तख्तापलट, तानाशाही और स्थापित राजनीतिक पार्टियों के दौर में भी अशांति का सामना किया है.
जैसा कि शेख़ हसीना की अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के दौर में देखा गया है.
भारत-बांग्लादेश संबंध पहले से ही बहुत ख़राब हालात में है. शेख़ हसीना को भारत के क़रीबी नेताओं में गिना जाता था और सत्ता से हटाए जाने के बाद से वो भारत में रह रही हैं.
नवंबर में, एक बांग्लादेशी ट्रिब्यूनल ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई, जिसने उन्हें कम से कम 1,400 प्रदर्शनकारियों की हत्या की ज़िम्मेदारी का दोषी पाया. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के अनुरोध के बावजूद भारत ने उन्हें ढाका को नहीं सौंपा है.
वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक़- अमेरिकी राजनयिक ने दिसंबर की बैठक में कहा, “हसीना को दोषी ठहराना राजनीतिक रूप से बहुत सही था.” अधिकारी ने आगे कहा कि ट्रिब्यूनल “स्वतंत्र और निष्पक्ष” नहीं था, लेकिन “वह दोषी हैं.”
इस बीच कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को भी उम्मीद है कि जमात-ए-इस्लामी अच्छा प्रदर्शन करेगी.
ऑस्ट्रेलिया में वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी में बांग्लादेशी राजनीति के सहायक शोधकर्ता और विशेषज्ञ मुबाशर हसन के अनुसार, “अब यह मुख्यधारा में है.”
क्या कह रहे हैं भारत और बांग्लादेश के पत्रकार
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बांग्लादेश के वरिष्ठ पत्रकार सलाहउद्दीन शोएब चौधरी ने सोशल मीडिया एक्स पर इस ऑडियो लीक और वॉशिंगटन पोस्ट की ख़बर पर टिप्पणी की है.
उन्होंने लिखा, “पत्रकारिता के मेरे 38 साल के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि किसी अमेरिकी की इस तरह की बातचीत ‘लीक’ होना लगभग असंभव है, जब तक वो ‘राजनयिक’ किसी अन्य को ये ऑडियो न दें.”
उन्होंने लिखा है, “यहाँ सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि द वॉशिंगटन पोस्ट जैसे बेहद रूढ़िवादी अख़बार ने उस तथाकथित लीक ऑडियो के आधार पर एक लंबी रिपोर्ट छापी है, जो मुझे रिपब्लिकन पार्टी के नेता राष्ट्रपति निक्सन के शर्मनाक इस्तीफे़ के पीछे इस अख़बार की भूमिका की याद दिलाता है.”
“क्या 22 जनवरी की रिपोर्ट का मक़सद राष्ट्रपति ट्रंप और उनके प्रशासन को बदनाम करना है? क्या यह कोई गहरी साज़िश है? अगर ऐसा है, तो तथाकथित लीक ऑडियो और रिपोर्ट के पीछे किसका हाथ था?”
वरिष्ठ बांग्लादेशी पत्रकार ज़ुलकरनैन समी ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, “जैसे-जैसे बांग्लादेश में राजनीतिक माहौल बदल रहा है, वहां मौजूद अमेरिकी डिप्लोमैट्स ने संकेत दिया है कि वे फिर से उभर रहे इस्लामी आंदोलन के साथ काम करने के लिए तैयार हैं.”
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के विदेश मामलों के संपादक स्टेनली जॉनी ने एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है कि उन्हें एक भारतीय राजनयिक ने बताया था कि अमेरिका को शेख़ हसीना कभी पसंद नहीं थीं, और अमेरिका को बांग्लादेश में भारत का असर कभी पसंद नहीं था.
उन्होंने लिखा है, “मुझे बताया गया कि अमेरिका ने हमेशा शेख़ हसीना के विरोधियों को सपोर्ट किया. हसीना के बाद की सरकार के पहले बड़े राजनीतिक फै़सलों में से एक जमात-ए-इस्लामी पर लगा बैन हटाना शामिल था.”
“जमात, जिसने बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान नरसंहार करने वाली पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था, उसके हाथ खून से सने हैं. वे बांग्लादेश के सेक्युलरिज्म को ख़त्म करके देश को इस्लामी बनाना चाहते हैं. लेकिन पिछले डेढ़ साल में उन्हें सिस्टमैटिक तरीके से मेनस्ट्रीम में लाया गया है. इस बैकग्राउंड में, मुझे वॉशिंगटन पोस्ट की कहानी पर बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई.”
स्टेनली जॉनी ने लिखा है, “डिप्लोमैट ने तो पत्रकारों से यह भी पूछा कि क्या वे जमात के स्टूडेंट विंग के नेताओं को अपने शो में लाएंगे, क्या आप उनसे बात कर सकती हैं? क्या वे आपके शो में आएंगे?”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.