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(बीबीसी पर्शियन, बीबीसी न्यूज़ की फ़ारसी भाषा सेवा है, जिसके दुनिया भर में लगभग 2.4 करोड़ पाठक/दर्शक हैं. इनमें ज़्यादातर ईरान में हैं. हालांकि ईरानी अधिकारियों ने इसे ईरान में ब्लॉक किया है और इसके प्रसारण में अक्सर व्यवधान (जैमिंग) डाला जाता है.)
ईरान की राजधानी तेहरान जैसे शहरों में रोज़मर्रा की ज़िंदगी आंशिक तौर पर सामान्य होने के संकेत दिख रहे हैं.
लेकिन सोशल मीडिया पर ईरानी यूज़र्स के अलग-अलग अनुभव सामने आ रहे हैं.
यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें एक ओर जीवन को सामान्य रूप से जारी रखने की कोशिश है, तो दूसरी ओर मानसिक थकान, आर्थिक दबाव और इंटरनेट तक असमान पहुंच पर चल रही बहस भी शामिल है.
हालांकि ये अनुभव केवल कुछ लोगों की व्यक्तिगत झलक पेश करते हैं और इनसे पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं होता.
लेकिन ये बताते हैं कि पिछले हफ़्तों में उठाए गए कई मुद्दे, जैसे इंटरनेट प्रतिबंध, आर्थिक दबाव और युद्ध से पैदा हुई चिंता,अभी भी जारी हैं.
इन संदेशों के बीच हालात से निपटने के तरीके को लेकर मतभेद भी दिखाई देता है.
कुछ यूज़र्स ने इस बात की आलोचना की है कि ऐसे समय में कुछ लोग रोज़मर्रा की साधारण चीज़ों, जैसे कपड़े खरीदना या कैफ़े जाने के बारे में लिख रहे हैं. वो इसे मौजूदा स्थिति की अनदेखी बता रहे हैं.
जंग के बीच ज़िंदगी जारी रखने की जद्दोजहद
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इसके उलट, कुछ लोग अपनी ज़िंदगी जारी रखने के हक का बचाव करते दिख रहे हैं.
एक यूज़र ने लिखा कि भले ही वह “कल रात से अब तक कई बार रो चुका है”, फिर भी हो सकता है कि वह “अपने सुंदर कपड़े पहनकर दोस्तों के साथ कहीं घूमने जाए”.और इस बात पर किसी को उसे जज नहीं करना चाहिए.”
एक अन्य यूज़र ने फुटबॉल मैच के बारे में लिखने का ज़िक्र करते हुए कहा कि “हमारे दिमाग को भी कभी-कभी दूसरी चीज़ों में लगने की ज़रूरत होती है… इसलिए ‘सफेद सिम-कार्ड’ वालों (यानी जिन पर कम पाबंदियां हैं) को दोष मत दीजिए.”
ईरान में सफ़ेद सिम जिन लोगों के पास होती है वो बाक़ी यूज़र्स की तुलना में इंटरनेट बेहतर तरीक़े से एक्सेस कर पाते हैं. वो कई ऐसी साइट भी एक्सेस कर पाते हैं जो आम लोगों के लिए उपलबप्ध नहीं होतीं.
एक और यूज़र ने लिखा, “यह अजीब नहीं है…हमारे दिमाग को भी कुछ पल के लिए दूसरी चीज़ों में लगने की ज़रूरत होती है, ताकि हम टूट न जाएं. शायद हमारी ज़िंदगी अभी लंबे समय तक ऐसी ही रहने वाली है.”
कुछ संदेशों में एंग्जाइटी से निपटने की अलग-अलग कोशिशों का भी ज़िक्र मिलता है.
जैसे एक यूजर ने लिखा, “देखते ही देखते मेरी एंग्जाइटी इतनी बढ़ गई कि सुबह छह बजे से ही घर की सफ़ाई में लग गया.”
ईरान में “इंटरनेट प्रो” एक तरह की विशेष और सीमित इंटरनेट सुविधा है, जो कुछ यूज़र्स को अपेक्षाकृत कम प्रतिबंधों के साथ दी जाती है.
इंटरनेट का मुद्दा अब भी लोगों की बहस का केंद्र है. यूजर्स लगातार प्रतिबंधों, ऊँची कीमतों और इसके उनके रोज़मर्रा के जीवन पर पड़ने वाले असर के बारे में लिख रहे हैं.
सीमित इंटरनेट एक्सेस को लेकर नाराज़गी
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कुछ लोगों ने इंटरनेट एक्सेस में दिक़्कतों का ज़िक्र किया है.
जैसे एक यूज़र ने लिखा, “बहुत मुश्किल से मैं एक जीबी स्पेस ख़रीद पाया और इसके लिए मुझे दस लाख रियाल खर्च करने पड़े.”
एक अन्य यूज़र अपने इंटरनेट के जल्दी खत्म हो जाने को लेकर चिंतित है और कहता है, “मुझे लगातार डर रहता है कि ये महंगा दो जीबी इंटरनेट स्पेस ख़त्म हो जाएगा और मैं फिर अंधेरे में चला जाऊंगा.”
इसके साथ ही, यूज़र्स ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि वे इंटरनेट को एक सार्वजनिक अधिकार मानते हैं.
एक संदेश में लिखा है, ” खुला इंटरनेट सबका अधिकार है.”
एक अन्य यूज़र ने लिखा, “अधिकार भीख में नहीं मांगा जाता… इंटरनेट, बस इंटरनेट है. बगैर किसी किंतु-परंतु के साथ.”
यूज़र्स की बातों में बार-बार “इंटरनेट प्रो” नाम की एक योजना का ज़िक्र आता है.
इस शब्द का मतलब ऐसी इंटरनेट एक्सेस है जो किसी ख़ास और वर्ग को दी जा रही है, जैसे क़ारोबार या यूनिवर्सिटी से जुड़े लोग.
ये लोग एक्सट्रा पेमेंट या तय कोटा के ज़रिये कम प्रतिबंधों वाला या अधिक व्यापक इंटरनेट इस्तेमाल कर सकते हैं.
जबकि आम लोगों के लिए इंटरनेट की पहुंच पहले की तरह सीमित ही रहती है.
‘इंटरनेट प्रो’ पर इतनी बहस क्यों
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यूजर्स ने इस स्थिति को कई बार “वर्ग-आधारित इंटरनेट” (इंटरनेट का बंटवारा) भी कहा है.
कई संदेशों में कुछ यूजर्स ने इस व्यवस्था को असमान इंटरनेट एक्सेस का उदाहरण बताया है.
एक यूज़र ने लिखा, “इंटरनेट प्रो’ का मतलब है एक सार्वजनिक अधिकार को वर्गों में बाँटना.”
वहीं एक अन्य यूज़र ने कहा कि अलग-अलग समूहों को अलग तरह की इंटरनेट सुविधा देने से “समाज और वर्ग विभाजन और बढ़ेगा.”
अन्य संदेशों में भी उन लोगों के बीच खुले इंटरनेट तक पहुंच और इस पर पाबंदी की बात की गई है.
कुछ यूजर्स ने अपील की है, “उन लोगों की आवाज़ बनिए, जिन्हें हज़ारों घंटों से इंटरनेट नहीं मिला है.”
पिछले दिनों की तरह, कई यूज़र्स ने लिखा है कि इन हालात का उनके काम और आजीविका पर सीधा असर पड़ा है.
कुछ संदेशों में आर्थिक गतिविधियों के ठप होने की बात कही गई है.
ख़ासकर छोटे कारोबार से लेकर इंटरनेट पर निर्भर नौकरियों पर इसके असर की बात की गई है.
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एक यूज़र ने एक कैफ़े की स्थिति का ज़िक्र करते हुए लिखा कि उसके मालिक ने बेहद बेबसी में कहा, “यह जगह अब मोमबत्ती की तरह पिघल रही है, बस एक धागे से टिकी हुई है.”
एक अन्य संदेश में अलग-अलग क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के प्रोडक्ट की बिक्री रुकने की बात कही गई और चेतावनी दी गई कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो उनकी “ज़िंदगी और भविष्य” पर असर पड़ेगा.
कुछ यूज़र्स ने अपने या अपने आसपास के लोगों के बेरोज़गार होने की बात भी लिखी.
जैसे एक व्यक्ति ने कहा, “मैं और मेरा पूरा परिवार, स्टील और पेट्रोकेमिकल फैक्ट्रियों पर हमलों के कारण बेरोज़गार होकर घर बैठ गए हैं,”
कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा भी बार-बार सामने आ रहा है.
कुछ यूज़र्स ने रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतों का विस्तार से ज़िक्र किया और इसे बढ़ते आर्थिक दबाव का संकेत बताया.
एक मैसेज में रोटी और पनीर से लेकर दवाइयों तक की कीमतों की सूची दी गई, जबकि दूसरे में हाल के महीनों में अंडों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का ज़िक्र किया गया.
युद्ध का ख़ौफ और मानसिक तनाव
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कई संदेशों में मानसिक दबाव के संकेत भी साफ़ दिखते हैं.
चिंता, रोना और तनाव से जुड़ी शारीरिक प्रतिक्रियाएं.
एक यूज़र ने लिखा, “तनाव की वजह से मेरा पूरा शरीर कांप रहा है.”
कुछ संदेशों में युद्ध के अनुभव और उसके असर का भी ज़िक्र है.
जैसे अचानक आवाज़ों से डर जाना या दोबारा संघर्ष शुरू होने की चिंता.
एक यूज़र ने बताया कि बिजली की गड़गड़ाहट सुनकर उसे लगा “कहीं बम तो नहीं गिर रहा.”
एक अन्य यूज़र ने “युद्ध से पैदा हुआ सामूहिक ट्रॉमा” का ज़िक्र करते हुए लिखा कि कई लोग अब भी सामान्य आवाज़ों को लड़ाकू विमानों या धमाकों की आवाज़ समझ लेते हैं.
इसके अलावा, कुछ संदेशों में युद्ध के फिर से शुरू होने का डर भी दिखाई देता है.
एक जगह एक महिला ने लिखा, “शायद कल फिर युद्ध शुरू हो जाए,”
जबकि एक अन्य यूजर ने “एक नए, जानलेवा डर” का ज़िक्र किया, जिससे वह अभी तक उबर नहीं पाया है.
इन संदेशों के एक हिस्से में सामाजिक असमानता और बढ़ती खाई की भावना भी सामने आई है.
चाहे वह इंटरनेट तक पहुँच में अंतर हो या रोज़मर्रा के अनुभवों में फ़र्क.
कुछ यूजर्स ने इस स्थिति की आलोचना करते हुए कहा कि इससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है.
एक मैसेज में लिखा गया, “इससे आर्थिक नुक़सान, जन असंतोष और लोगों के बीच वर्ग विभाजन और सामाजिक खाई के अलावा और क्या हासिल हो रहा है?”
ये सभी संदेश, भले ही सीमित और बिखरे हुए हों, लेकिन यह दिखाते हैं कि पिछले हफ़्तों में उठे कई मुद्दे अब भी जारी हैं.
जैसे इंटरनेट पर पाबंदियाँ, आर्थिक दबाव, युद्ध से पैदा हुई चिंता और भविष्य को लेकर असुरक्षा.
इन सबके बीच, यूज़र्स एक ऐसे अनुभव को बयान कर रहे हैं, जहाँ ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश, थकान, चिंता और असमानता की भावना, सभी एक साथ मौजूद हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित