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सन् 1872 आते आते भारत में ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष तक पहुंच चुका था. 1857 के विद्रोह को निर्ममता से कुचलने के बाद भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों से निकलकर ब्रिटिश राजसत्ता के हाथ में पहुंच चुका था.
इस माहौल में 15 अगस्त, 1872 को उस समय की भारत की राजधानी कोलकाता में अरबिंदो एकरॉयड घोष का जन्म हुआ था. अरबिंदो के पिता कृष्ण धन ने अरबिंदो का मध्यनाम एकरॉयड अपनी एक मित्र अनेट एकरॉयड के नाम पर रखा था.
सन् 1893 में अरबिंदो ने यह शब्द अपने नाम से हटा दिया था. सन् 1879 के मध्य में कृष्ण धन अपने पूरे परिवार के साथ इंग्लैंड में रहने चले गए थे.
वहां पहुंचने के तीन महीनों के अंदर उनको वापस भारत लौटना पड़ा था लेकिन वह अपने तीनों बेटों को इंग्लैंड में अपने दोस्त विलियम ड्रेविट के पास छोड़ आए थे.
अतुलिंद्रनाथ चतुर्वेदी अपनी किताब ‘मिस्टिक फ़ायर द लाइफ़ ऑफ़ श्री अरबिंदो’ में लिखते हैं, “कृष्ण धन ने अपने बेटों की परवरिश के लिए ड्रेविट को हर साल 360 पाउंड भेजने का वादा किया था. उन्होंने कड़े निर्देश दिए थे कि इन लड़कों को भारत या भारतीयों, या भारतीय धर्म और संस्कृति से जुड़े किसी भी पक्ष से बिल्कुल अलग रखा जाए.”
“जब उनसे पूछा गया कि किस धर्म के अनुसार, उनका पालन पोषण किया जाए तो उनका जवाब था कि जब उनके लड़के बड़े हो जाएं तो वे खुद ही तय कर लें कि वे किस धर्म को मानना चाहेंगे. शुरू में ड्रेविट ने, जो ऑक्सफ़र्ड के पढ़े हुए थे, अरबिंदों को घर पर ही लैटिन और अंग्रेज़ी इतिहास की शिक्षा दी. उनकी पत्नी ने उन्हें फ़्रेंच, भूगोल और गणित पढ़ाया.”
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आईसीएस में चयन
सन् 1884 में उनका दाख़िला लंदन के मशहूर सेंट पॉल्स स्कूल में करवाया गया. खेलों के प्रति अरबिंदो की कोई रुचि नहीं थी लेकिन वह स्कूल की अंग्रेज़ी और फ़्रेंच वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया करते थे. उस समय शेली उनके पसंदीदा कवि हुआ करते थे.
सन् 1889 में वह केंब्रिज विश्वविद्यालय के किंग्स कॉलेज की छात्रवृत्ति परीक्षा में बैठे थे जिसमें उन्हें पहला स्थान प्राप्त हुआ था.
इसके बाद वह जून में 13 दिन तक चलने वाली थकाऊ इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठे थे. परीक्षा का पाठ्यक्रम उन लोगों के पक्ष में था जो ग्रीक और लैटिन में पारंगत थे. कुल 250 प्रतियोगियों में अरबिंदो को 11वां स्थान मिला था.
ग्रीक भाषा में उन्हें 600 में से 557 अंक मिले थे जबकि लैटिन में उन्हें सभी प्रतियोगियों में दूसरा स्थान मिला था. दिलचस्प बात यह है कि आईसीएस की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें बांग्ला भाषा एक अंग्रेज़ शख़्स आरएम टावर्स ने सिखाई थी जबकि संस्कृत उन्होंने अपने आप सीखी थी.
एबी पुरानी अपनी किताब ‘द लाइफ़ ऑफ़ श्री अरबिंदो’ में लिखते हैं, “यह एक अजीब बात थी कि आईसीएस परीक्षा में अरबिंदो ने ग्रीक भाषा में चार्ल्स बीचक्रॉफ़्ट को दूसरे स्थान पर छोड़ दिया था जबकि बंगाली भाषा की परीक्षा में बीचक्राफ़्ट ने बदला लेते हुए अरबिंदो से अधिक अंक प्राप्त किए थे.”
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घुड़सवारी में हुए फ़ेल
अरबिंदो ने आईसीएस की परीक्षा भले ही पास कर ली हो लेकिन अभी भी उन्हें अंतिम बाधा पार करनी थी. वह थी घुड़सवारी की परीक्षा. अरबिंदो इस परीक्षा में नाकामयाब रहे.
नतीजा यह हुआ कि आईसीएस में उनकी रुचि घटने लगी. अरबिंदो ने अपने आत्मवृतांत में लिखा, “शुरू से ही मेरी रुचि कविता और साहित्य में थी. आईसीएस में मेरी घटती रुचि का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि जहां मुझे मुख्य परीक्षा में 11वां स्थान मिला था, पहली आवधिक परीक्षा में मेरा स्थान घटकर 23वां रह गया.”
“घुड़सवारी की परीक्षा में मैं दो बार फ़ेल हुआ. तीसरी बार मैं उसमें भाग लेने ही नहीं गया. नतीजा यह हुआ कि 17 नवंबर, 1892 को मुझे सूचित किया गया कि मैं आईसीएस का सदस्य नहीं बन सकूंगा. वैसे भी आईसीएस में मेरी रुचि समाप्त हो चुकी थी और मैं इससे बच निकलने का कोई बहाना ढ़ूंढ़ रहा था.”
संयोग से इन दिनों बड़ौदा के महाराज सत्याजीराव गायकवाड़ लंदन आए हुए थे. अरबिंदो की महाराजा से मुलाकात हुई और उन्होंने अरबिंदो को बड़ौदा राज्य सेवा में 200 रुपए प्रति माह की नौकरी का प्रस्ताव दिया.
चौदह वर्ष इंग्लैंड में रहने के बाद अरबिंदो बड़ौदा के लिए रवाना हो गए.
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किताबें पढ़ने का जुनून
बड़ौदा में नौकरी के दौरान अरबिंदो ने गुजराती और मराठी भाषा भी सीख ली. इस तरह वह कुल 12 भाषाओं के ज्ञाता हो गए- अंग्रेज़ी, ग्रीक, लैटिन, फ़्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, इटालियन, संस्कृत, बंगाली, गुजराती, मराठी और हिंदी. बाद में जब वह पॉन्डिचेरी गए तो उन्होंने वहां तमिल भी सीख ली. अरबिंदो को पढ़ने का बहुत शौक था.
रोशन और अपूर्व अपनी किताब ‘श्री अरबिंदो इन बड़ौदा’ में लिखते हैं, “जब वह पढ़ने में व्यस्त रहते थे तो उन्हें अपने आसपास का कुछ भी ख़्याल नहीं रहता था. एक दिन उनके नौकर ने उनको खाना परोसा. जब वह एक घंटे बाद उनके कमरे में गया तो उसने देखा कि वह अब भी पढ़ने में व्यस्त थे और उन्होंने खाने को हाथ भी नहीं लगाया था.”
जेसी घोष अपनी किताब ‘लाइफ़ वर्क ऑफ़ श्री अरबिंदो’ में उनकी चचेरी बहन बासंती को कहते हुए बताते हैं, “अरो दादा जब हमारे यहां आते थे तो उनके साथ दो या तीन ट्रंक हुआ करते थे. हमें हमेशा लगता था कि उसमें उनके कीमती सूट और दूसरी इस्तेमाल की चीज़ें होंगी. लेकिन जब वह अपना ट्रंक खोलते थे तो मैं आश्चर्य में पड़ जाती थी. उसमें कुछ मामूली कपड़ों के अलावा सिर्फ़ और सिर्फ़ किताबें ही होती थीं.”
अरबिंदो का सोने का तरीका भी बहुत साधारण होता था. वह लोहे की चारपाई पर सोते थे जिस पर बहुत पतला गद्दा बिछा होता था. जब बहुत अधिक ठंड पड़ती थी तब ही वह अपने ऊपर एक पतला कंबल डालते थे. उनकी एक और आदत थी. वह अपना सारा पैसा एक बड़ी ट्रे पर रख कर छोड़ देते थे. कोई भी उसमें से अपनी ज़रूरत के हिसाब से पैसा उठा सकता था. वह अपने पैसे को न तो कभी ताले में रखते थे और न ही उसका हिसाब रखते थे.
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तिलक से दोस्ती
28 वर्ष की आयु में पारिवारिक दबाव के कारण उन्होंने विवाह किया था. उस समय की प्रथा के अनुसार अख़बारों में उनके विवाह का विज्ञापन दिया गया था.
करीब 50 परिवारों ने उनको अपना दामाद बनाने में रुचि दिखाई थी. वह कलकत्ता गए थे और उन्होंने भूपल चंद्र बोस की बेटी मृणालिनी को अपनी पत्नी के तौर पर चुना था. उस समय मृणालिनी की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी. 29 अप्रैल, 2001 को कलकत्ता में हुई शादी में लॉर्ड सत्येंद्रनाथ सिन्हा और मशहूर वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस जैसे महानुभाव उनकी शादी में आए थे.
उनकी शादी में उस समय हास्यास्पद स्थिति पैदा हो गई जब पंडित ने शादी से पहले अरबिंदो का शुद्धिकरण करने की मंशा प्रकट की क्योंकि वह विदेश में कई साल बिता कर बाहर लौटे थे.
अरबिंदो ने विनम्रता पूर्व पंडित की बात मानने से इनकार कर दिया. आख़िरी समय पर दूसरा पंडित ढूंढा गया जिसने शुद्धिकरण पर ज़ोर नहीं दिया.
सन् 1919 में फैली फ़्लू की महामारी में मृणालिनी का निधन हो गया था. बड़ौदा में प्रवास के दौरान ही अरबिंदों ने आज़ादी की लड़ाई में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी.
अरबिंदो के आत्मवृतांत में ज़िक्र है कि उन्होंने 1902 में अहमदाबाद में हुए कांग्रेस के सम्मेलन में भाग लिया था. यहीं पर उनकी बालगंगाधर तिलक से पहली मुलाकात हुई थी.
तिलक उन्हें पंडाल के बाहर ले गए थे. खुले मैदान में उन्होंने अरबिंदो के साथ एक घंटे तक मंत्रणा की थी और कांग्रेस में चल रहे सुधारवादी आंदोलन के प्रति अपना असंतोष प्रकट किया था.
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बंदे मातरम अख़बार ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उगली आग
15 अगस्त, 1906 को अरबिंदो ने बड़ौदा की नौकरी छोड़ कलकत्ता के बंगाल नैशनल कॉलेज में प्रधानाचार्य के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था.
कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने भाई बरिन और कुछ साथियों के साथ मिलकर बांग्ला भाषा में ‘युगांतर’ नाम का एक समाचारपत्र निकालना शुरू कर दिया था. एक वर्ष के अंदर इसकी 10,000 प्रतियां बिकने लगी थीं.
एक और स्वतंत्रता सेनानी बिपिन चंद्र पाल का मानना था कि राष्ट्रवादियों को अपने विचार अंग्रेज़ों तक पहुंचाने के लिए ज़रूरी है कि एक अंग्रेज़ी समाचार पत्र निकाला जाए.
उन्होंने इस अख़बार का नाम ‘बंदे मातरम’ रखा और अरबिंदो घोष से अनुरोध किया कि वह इस अख़बार के लिए लिखें.
अरबिंदो इसके लिए तुरंत राज़ी हो गए. वह एक अलग किस्म के क्रांतिकारी थे जो बंदूक की बजाए अपनी कलम का इस्तेमाल करना बेहतर समझते थे.
लक वेनेट अपनी किताब ‘श्री अरबिंदो एंड द रिवोल्यूशन ऑफ़ इंडिया’ में लिखते हैं, “बंदे मातरम उस समय के भारत का सबसे उग्र अख़बार था. किसी अन्य भारतीय अख़बार ने अंग्रेज़ों पर इतना ज़बरदस्त हमला नहीं बोला था. उसमें छपने वाले लेखों में लेखक का नाम नहीं दिया जाता था. अरबिंदो ज़रूर ‘माणिक’ और ‘काली’ के छद्मनाम से लिखा करते थे.”
“यह अख़बार उस इलाक़े में सनसनी फैलाने में कामयाब हो गया था. अरबिंदो और उनके लेखक अंग्रेज़ों पर निजी हमले करने से बचते थे लेकिन उनका निशाना ब्रिटिश राज का कुप्रशासन और देश में ग़रीबी बढ़ाने और सूखे का सामना करने में अक्षम ब्रिटिश नीतियां रहा करती थीं.”
कलकत्ता के वकील परमथानाथ मित्र और सतीश चंद्र बोस ने मिलकर एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाया जिसे अनुशीलन समिति का नाम दिया गया. अरबिंदो और उनके भाई बारिन ने इस संगठन के लिए बहुत काम किया.
डॉक्टर कर्ण सिंह अपनी किताब ‘प्रॉफ़ेट ऑफ़ इंडियन नेशनलिज़्म’ में लिखते हैं, “सच्चाई यह है कि आज़ादी से पहले भारतीय राजनीति के सभी मूलभूत आदर्श राष्ट्रीयता, स्वदेश प्रेम, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार जो बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के प्रेरणास्रोत बने, श्री अरविंद के महान व्यक्तित्व की देन है.”
“बंग भंग के विरुद्ध उपजे आंदोलन ने अपने सभी सिद्धांत और उद्देश्य श्री अरविंद से प्राप्त किए और इसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में होने वाले महान आंदोलनों के लिए आधार तैयार किया.”
बंगाल विभाजन के बाद उन्होंने एक लेख लिखा ‘नो कॉम्प्रोमाइज़’ जिसे बाद में एक पुस्तिका के तौर पर बांटा गया.
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अलीपुर षड्यंत्र केस में गिरफ़्तारी
अरबिंदो के लेखों से आजिज़ आकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार करने का आदेश दे दिया. लेकिन उन्हें ज़मानत पर छोड़ दिया गया और एक महीने बाद बरी कर दिया गया. अप्रैल 1908 में मुज़फ़्फ़रपुर के कलक्टर किंग्सफ़ोर्ड की हत्या का प्रयास किया गया.
इस संबंध में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को गिरफ़्तार किया गया. उन्होंने यह सोच कर एक बग्घी पर बम फेंका था कि उसमें किंग्सफ़ोर्ड सवार हैं लेकिन उसमें श्रीमती कैनेडी और उनकी बेटी सवार थीं. इस हमले में दोनों की मौत हो गई.
अगस्त, 1908 में खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई और प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मार ली. इसके बाद इस पूरे मामले की गहन जांच के बाद अलीपुर कॉन्सपिरेसी केस चला जिसमें 18 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया जिनमें अरबिंदो घोष भी शामिल थे.
2 मई, 1908 की सुबह 5 बजे पुलिस ने आकर उन्हें हिरासत में ले लिया. उनको हथकड़ी पहनाई गई और उनकी कमर में रस्सी बांध दी गई. उनको अलीपुर जेल में रखा गया. उनकी जेल कोठरी 9 फ़ुट लंबी और 5 फ़ुट चौड़ी थी.
अरबिंदो घोष ने अपनी किताब टेल्स ऑफ़ प्रिज़न लाइफ़ में लिखा, “मुझे सिर्फ़ एक प्लेट, टिन की एक कटोरी दी गई थी. कटोरी में पानी भरकर हम अपना शौच धोते थे. उसी कटोरी से हम ग़रारे करते थे, नहाते थे और उसी कटोरी में हमें दाल का सूप पीने के लिए दिया जाता था. रात को हमें दो चादरें दी जाती थीं. एक चादर का इस्तेमाल हम तकिए के तौर पर करते थे. खाने में हमें कंकड़ों भरा चावल, दाल का पनियल सूप और सब्ज़ियां दी जाती थीं जिसमें पत्तियां और घास मिली होती थी.”
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बंगाल के सबसे लोकप्रिय नेता
मनोज दास अपनी किताब ‘श्री अरोबिंदो इन द फ़र्स्ट डिकेड ऑफ़ ट्वेंटियथ सेंचुरी’ में लिखते हैं, “बंगाल के गवर्नर एंड्रू फ़्रेज़र ने वायसराय लॉर्ड मिंटो को अरबिंदो के बारे में पत्र लिख कर कहा था, यह व्यक्ति बहुत चालाक और कट्टर व्यक्ति है. हर देशद्रोही लेखन और हत्याओं का आदेश देने के पीछे इस व्यक्ति का हाथ है. लेकिन इसने बहुत सावधानी पूर्वक अपने आप को हमारी नज़र से दूर रखा है. हमारे पास उसके ख़िलाफ़ इतने सबूत नहीं हैं कि अदालत में उसके कारनामों को सिद्ध कर पाएं. लेकिन हमारे हाथ कुछ ऐसे सबूत ज़रूर लगे हैं जिसके आधार पर उसे देश से निर्वासित किया जा सकता है.”
वायसराय ने लाला लाजपत राय को निर्वासित करने के फ़ैसले के विरुद्ध भड़की जन भावनाओं को याद करते हुए इस तरह की मुहिम को अपना समर्थन नहीं दिया था.
गिरफ़्तारी से पहले अरबिंदो को कलकत्ता में बहुत कम लोग जानते थे. लेकिन ‘बंदे मातरम’ का मुक़दमा समाप्त होते होते वह पूरे भारत में मशहूर हो गए थे. उनके पुराने पारिवारिक मित्र रबींद्रनाथ टैगोर ने उनके सम्मान में एक कविता लिख डाली थी.
सुभाषचंद्र बोस ने अपनी आत्मकथा ‘एन इंडियन पिलग्रिम’ में लिखा था, “मेरे पढ़ाई के दिनों में सन् 1909 में राजनीति से अलग हो जाने के बावजूद अरबिंदो घोष बंगाल के सबसे लोकप्रिय नेता हुआ करते थे. कांग्रेस के मंच पर वह वामपंथियों का प्रतिनिधित्व करते थे और उस समय संपूर्ण आज़ादी की मांग करते थे जब अधिकतर कांग्रेसी की मांग सिर्फ़ स्वशासन तक सीमित रहा करती थी. आध्यात्म और राजनीति के सम्मिश्रण ने उनकी शख़्सियत में रहस्यवाद का पुट भर दिया था.”
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पॉन्डिचेरी का रुख़
अरबिंदो का सौभाग्य था कि इस मुक़दमे के जज चार्ल्स बीचक्रॉफ़्ट थे जो आईसीएस की ट्रेनिंग के दौरान उनके साथ हुआ करते थे. अरोबिंदो की वकालत कलकत्ता के मशहूर वकील चितरंजन दास कर रहे थे.
अनुराग बैनर्जी अपनी किताब ‘श्री अरबिंदो हिज़ पॉलिटिकल लाइफ़ एंड एक्टीविटीज़’ में लिखते हैं, “चितरंजन दास ने दलील दी थी, इस विवाद और मुकदमे के समाप्त होने और इसकी मृत्यु और इसके चले जाने के बाद अरबिंदो को देशभक्ति के कवि, राष्ट्रवाद के मसीहा और मानवता के प्रेमी के तौर पर याद किया जाएगा. उसके इस दुनिया से जाने के बाद उसके शब्द न सिर्फ़ भारत में बल्कि सात समुंदर पार पूरी दुनिया में गूंजते रहेंगे. इसलिए मैं कहता हूँ कि कठघरे में खड़ा यह व्यक्ति न सिर्फ़ इस अदालत के सामने खड़ा है बल्कि इतिहास की अदालत के सामने भी खड़ा है.”
बीचक्रॉफ़्ट ने अपने फ़ैसले में 50 पृष्ठ अरबिंदो को दिए और कहा कि अरबिंदो के ख़िलाफ़ दिए गए सबूत कमज़ोर हैं इसलिए उन्हें बरी किया जाता है.
लेकिन रिहा होने के बाद भी सरकार ने उन पर से अपनी निगरानी नहीं हटाई. इस बीच उनसे मिलने रबींद्रनाथ टैगोर और रैमसे मैक्डोनल्ड आए. मैक्डोनल्ड ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नेता थे जो बाद में दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने.
रोशन दलाल अपनी किताब ‘श्री अरबिंदो- द लाइफ़ ऑफ़ एंड टीचिंग ऑफ़ ए रिवोल्यूशनरी फिलॉस़्फ़र’ में लिखती हैं कि फ़रवरी, 1910 में अरबिंदो को संकेत मिले कि उन्हें फिर गिरफ़्तार किया जाने वाला है. उन्होंने ब्रिटिश भारत छोड़ कर फ़्रेंच भारत जाने का फ़ैसला किया. वह गुप्त रूप से कलकत्ता से एक नाव में सवार होकर पहले फ़्रेंच क्षेत्र चंद्रनगर पहुंचे. वहां दो महीने रहने के बाद वह पानी के जहाज़ से 4 अप्रैल, 1910 को पॉन्डिचेरी पहुंच गए. पॉन्डिचेरी (अब पुदुच्चेरी) में वह अगले चार दशक तक रहे.
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78 वर्ष की आयु में निधन
पॉन्डिचेरी निवास के दौरान अरबिंदो ने राजनीति छोड़ आध्यात्म की तरफ़ अपना मन लगा लिया. उन्होंने अपने आप को लोगों से अलग-थलग कर लिया.
उनसे मिलने आने वाले गिने-चुने लोगों में मशहूर कवि सुब्रमण्यम भारती हुआ करते थे. इस बीच उनकी मुलाकात फ़्रेंच मूल की मिरा अल्फ़ासा से हुई जो उनकी सहचरी बन गईं.
अरबिंदो उन्हें माता कहकर पुकारते थे, इसलिए उनके अनुयायी भी उन्हें श्रीमाँ कहकर पुकारने लगे.
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सन् 1925 में लाला लाजपत राय और पुरषोत्तम दास टंडन भी उनसे मिलने पॉन्डिचेरी गए थे. उन्होंने एक दार्शनिक पत्रिका ‘आर्य’ निकालनी शुरू की.
अरबिंदो को दो बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. सन् 1939 में उनकी पुस्तक ‘द लाइफ़ डिवाइन’ का पहला भाग प्रकाशित हुआ.
सन् 1943 में ‘द लाइफ़ डिवाइन’ को साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन उस वर्ष यह पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया.
सन् 1945 में उन्हें एक बार फिर साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन उस वर्ष यह पुरस्कार चिली की कवि गैब्रियला मिस्त्राल को मिला.
रोशन दलाल ने श्री अरबिंदो की बायोग्राफ़ी में लिखा है कि सन् 1949 के बाद अरबिंदो घोष का स्वास्थ्य गिरना शुरू हो गया था. उनका प्रोस्ट्रेट बढ़ गया. उनको गुर्दे की बीमारी और मधुमेह भी हो गया. उनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी. 4 दिसंबर, 1950 की रात उन्होंने आधा प्याला टमाटर का जूस पिया. 5 दिसंबर की सुबह एक बजकर बीस मिनट पर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए.
उनको एक सफ़ेद सिल्क की धोती पहनाई गई. करीब 60,000 लोगों ने उनके अंतिम दर्शन किए. फ़्रेंच सरकार के विरोध के बावजूद उन्हें आश्रम के प्रांगण में ही दफ़ना दिया गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.