डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने एक बार फिर अमेरिका-यूरोप संबंधों को गहरे संकट में डाल दिया है। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ये संबंध इस हद तक खराब हो चुके हैं, कि अमेरिका के अगले कई राष्ट्रपतियों को भरोसा कायम करने में अपनी भरपूर ऊर्जा खपानी पड़ सकती है।
अपने मौजूदा कार्यकाल में ट्रंप ने यूरोप के साथ पिछले सात दशकों में बने गठबंधनों को लगभग दरकिनार कर दिया है। ऐसे गठबंधन, जिन्होंने जर्मनी के पुर्नएकीकरण से लेकर सोवियत संघ के पतन तक में अहम भूमिका निभाई थी।
ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका-यूरोप संबंध गंभीर संकट में
ट्रंप का लहजा सहयोगियों के बजाय विरोधियों जैसा रहा है। उन्होंने यूरोपीय नेताओं पर आरोप लगाए, दबाव डाला और ऐसी मांगें रखीं, जिन्होंने अटलांटिक संबंधों की स्थिरता को झकझोर दिया।इस बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की धमकी रही।
उन्होंने डेनमार्क से ग्रीनलैंड को अमेरिका को सौंपने की मांग की और उसे महज “बर्फ का बड़ा टुकड़ा” कहकर खारिज किया। यह कदम नाटो के भीतर गंभीर दरार पैदा कर सकता था।
ट्रंप ने डेनमार्क को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी संरक्षण के लिए ‘कृतघ्न’ तक कह दिया, जबकि अफगानिस्तान में गठबंधन बलों के बीच डेनमार्क ने प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा जानें गंवाई थीं।
ट्रंप ने यूरोपीय नेताओं के साथ निजी संदेश सार्वजनिक किए, जिनसे यह दिखाने की कोशिश की गई कि वे उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने खुद की तस्वीरें साझा कीं, जिनमें वे ग्रीनलैंड में अमेरिकी झंडा गाड़ते नजर आए। दावोस में विश्व आर्थिक फोरम के मंच से उन्होंने कहा कि यूरोप सही दिशा में नहीं जा रहा और यहां तक कह दिया कि ‘कभी-कभी तानाशाह की जरूरत होती है।’
ग्रीनलैंड विवाद ने अटलांटिक गठबंधनों को कमजोर किया
कुछ ही घंटों बाद उन्होंने आर्कटिक सुरक्षा पर ‘भविष्य के समझौते की रूपरेखा’ की बात कही, लेकिन ठोस विवरण नहीं दिए।हालांकि फिलहाल ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर सबसे कड़े कदम पीछे खींच लिए हैं, लेकिन इस प्रकरण ने वैश्विक मंच पर अमेरिका की स्थिति को अनिश्चित बना दिया है।
नाटो के नेता अब ऐसी रणनीतियों का संकेत दे रहे हैं, जिनमें अमेरिका शामिल न हो। इससे भविष्य में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति- चाहे वह डेमोक्रेट हो या रिपब्लिकन- के लिए भरोसा बहाल करना बेहद कठिन हो सकता है।
बाइडन के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान फाइनर का कहना है कि रिश्तों में कुछ सुधार संभव है, लेकिन वे पहले जैसे कभी नहीं होंगे। उनका तर्क है कि अब देश अमेरिका को अधिकतम चार साल के अंतराल में भरोसेमंद मानेंगे। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी पहले ही अधिक स्वतंत्र राह पर बढ़ चुके हैं।
अमेरिकी विश्वसनीयता बहाल करना भविष्य में चुनौतीपूर्ण होगा
दावोस में उन्होंने नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को एक भ्रम करार दिया और कहा कि दुनिया एक संक्रमण नहीं, बल्कि टूटन के दौर से गुजर रही है।यूरोप में भी ट्रंप के खिलाफ स्वर तीखे हुए हैं।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने औपनिवेशिक मानसिकता के खिलाफ चेताया, जबकि बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर ने कहा कि इतनी लाल रेखाएं पार हो चुकी हैं कि अब चुप रहना गरिमा खोने जैसा होगा। यहां तक कि ब्रिटेन के नाइजल फराज जैसे दक्षिणपंथी नेता भी ट्रंप के रवैये को दशकों में सबसे बड़ी दरार बता रहे हैं।
अमेरिका के भीतर रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप को व्यापक समर्थन या चुप्पी मिली है, हालांकि कुछ नेताओं ने ग्रीनलैंड को लेकर धमकी को अनावश्यक बताया है।
डेमोक्रेट्स का मानना है कि भरोसा बहाल करने के लिए अमेरिका को केवल राष्ट्रपति नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में भी स्थायी बदलाव दिखाना होगा।