जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रेलवे और सरकार की जमीन पर अतिक्रमण कर अवैध कब्जा करने वालों को उनकी हद बता दी। कोर्ट ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले में सुनवाई के दौरान मौखिक तौर पर कई कड़ी टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण करने वाले तय नहीं कर सकते कि रेलवे कहां और कैसे योजना का विस्तार करे।
साथ ही कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि यह राज्य की जमीन है और जमीन का इस्तेमाल कैसे करना है, यह तय करना राज्य का अधिकार है। रेलवे की भूमि पर कब्जा करने वालों को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इससे साफ है कि रेलवे की भूमि का अतिक्रमण कर वहां रह रहे करीब पांच हजार परिवारों को जमीन खाली करनी होगी।
शीर्ष अदालत ने कहा, अब मुद्दा यह है कि जब प्रभावितों को जाने के लिए कहा जाएगा तो उनका पुनर्वास कैसे किया जाएगा ताकि उन्हें कुछ सहारा मिल सके। यह पहली नजर में मदद ज्यादा है, अधिकार कम। शीर्ष अदालत ने उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य के अधिकारियों से प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत पात्रता की जांच करने का निर्देश दिया।
ये आदेश प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के सरकारी और रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने और अवैध कब्जाधारियों को वहां से बेदखल किए जाने के आदेश के विरुद्ध दाखिल अपील पर सुनवाई के दौरान दिए। कोर्ट ने उक्त टिप्पणियां तब कीं जब अवैध कब्जाधारियों के वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट से कहा कि रेलवे के पास योजना विस्तार के लिए जरूरत से ज्यादा जमीन है।
पीठ ने कहा कि कोर्ट रेलवे को परियोजना स्थानांतरित करने के लिए नहीं कह सकता, यह विशेषज्ञों का काम है। भूषण ने बेदखली आदेश से प्रभावित हो रहे लोगों की पैरवी करते हुए कहा कि वे लोग वहां चार-पांच दशक से रह रहे हैं। राज्य सरकार ने पहले कहा था कि वह इस क्षेत्र को नियमित करेगी, लेकिन कुछ नहीं किया।
इस पर पीठ के न्यायाधीश जोयमाल्या बागची ने कहा कि यह सरकारी भूमि है या कहें कि यह रेलवे की जमीन है। इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है। वास्तव में आपको वहां रहने के लिए रियायत मिल रही है। आप इसे वहां रहने का अधिकार नहीं कह सकते। आपको रियायत इसलिए मिल रही है क्योंकि अधिकारियों ने वर्षों तक अवैध गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया।
जब प्रभावितों की ओर से पेश एक अन्य वकील कोलिन गोंसाल्विस ने उन लोगों को वहां से नहीं हटाने और उचित ढंग से पुनर्वास करने की दलील दी तो कोर्ट ने कहा कि इन लोगों पर दया कीजिए, ये लोग अस्वच्छ परिस्थितियों में रह रहे हैं। जहां पीने योग्य पानी, बिजली और सीवेज की व्यवस्था तक नहीं है।
पीठ ने कहा कि उन्हें तय करने दीजिए कि वे पीएमएवाई योजना के तहत घर चाहते हैं या नहीं। यदि कोई बाधा आती है तो अदालत उसका समाधान करेगी। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें वहीं रहने के लिए क्यों कहा जाए, जबकि बेहतर सुविधाओं वाली दूसरी जगह हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि अपील करने वालों को उस जगह पर पुनर्वास के लिए जोर देने का कोई अधिकार नहीं है, जो रेलवे योजान के विस्तार के लिए जरूरी है। पीएम आवास योजना के तहत याचिकाकर्ता पुनर्वास के लिए आवेदन कर सकते हैं, उनमें अधिकतर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की श्रेणी में आएंगे।
कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट के बेदखली के आदेश पर अंतरिम रोक को हमेशा के लिए जारी नहीं रहने दिया जा सकता। यह जरूरी है कि याचिकाकर्ताओं की रोजी-रोटी पर असर न पड़े और इसलिए पीएम आवास योजना के तहत आवेदन किया जाए। इसके बाद कोर्ट ने नैनीताल के कलेक्टर और हल्द्वानी के एसडीएम सहित राजस्व अधिकारियों और जिला स्तरीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों को क्षेत्र का दौरा करने और योजना का लाभ उठाने के लिए प्रभावित लोगों से आवश्यक फार्म और औरपचारिकताओं को पूरा करवाने के लिए शिविर लगाने का आदेश दिया। ताकि पात्र आवेदकों की पहचान हो सके।
कोर्ट ने प्रक्रिया 19 मार्च से शुरू करके 31 मार्च तक पूरी करने को कहा है।रेलवे की ओर से पेश एएसजी ऐश्वर्य भाटी ने सुनवाई के दौरान कहा कि गोला नदी की बाढ़ में रेलवे लाइन बह गई है। हल्द्वानी से ऊपर पहाडि़यां शुरू होने के कारण रेलवे को योजना विस्तार करना है। उन्होंने कहा कि प्रभावित हो रहे लोगों में से पात्र उम्मीदवार पीएमएवाई योजना के तहत उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में घर ले सकते हैं। उन्हें छह महीने तक 2000 रुपये प्रतिमाह मदद दी जा सकती है। गौरतलब है कि यह मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट आया है।
हाई कोर्ट ने हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे। जिसके विरुद्ध प्रभावित लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में बेदखली आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में करीब 50 हजार की आबादी निवास करती है। यहां रेलवे ने करीब 31 हेक्टेयर भूमि पर दावा किया है।