पीटीआई, नई दिल्ली। आर्थिक सर्वेक्षण (2025-26) के अनुसार, भारत का एथेनाल सम्मिश्रण कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि बनकर उभरा है। अगस्त 2025 तक, इस पहल ने 1.44 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचाई है और लगभग 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल को प्रतिस्थापित किया है।
हालांकि, सर्वेक्षण ने आगाह किया है कि एथेनाल उत्पादन के लिए मक्का पर बढ़ती निर्भरता देश की खाद्य सुरक्षा और पोषण के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही है।
सरकार द्वारा मक्का-आधारित एथेनाल के लिए दी जा रही अनुकूल मूल्य निर्धारण नीतियों के कारण किसान अन्य फसलों को छोड़कर मक्के की ओर रुख कर रहे हैं।
वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच मक्का-आधारित एथेनाल की कीमतों में 11.7 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि देखी गई, जो चावल या शीरे की तुलना में अधिक है।
मक्का उत्पादन और खेती के क्षेत्र में क्रमश: 8.77 प्रतिशत और 6.68 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर, दालों के उत्पादन और रकबे में गिरावट आई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मक्का अब सीधे तौर पर दलहन, तिलहन, सोयाबीन और कपास जैसी महत्वपूर्ण फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
सर्वेक्षण के अनुसार, दलहन और तिलहन भारतीय आहार के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसानों की प्राथमिकता सूची में वे नीचे खिसक रहे हैं। इससे खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ने और खाद्य कीमतों में अस्थिरता का जोखिम है।