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अमेरिका दुनिया के किसी भी दूसरे देश के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा तेल का उत्पादन करता है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अक्सर तेल की बात करते रहते हैं. लेकिन वह सिर्फ़ अमेरिका के तेल के बारे में ही बात नहीं करते हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि जब अमेरिका ख़ुद इतने बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का उत्पादन करता है, तो उसे और तेल क्यों चाहिए?
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अमेरिका को और तेल क्यों चाहिए?
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क्या अमेरिका का काम अपने ही देश में पैदा हो रहे तेल से नहीं चल पा रहा है.
तेल के इस पूरे कारोबार से वेनेज़ुएला किस तरह जुड़ा हुआ है?
दरअसल इसकी वजह कच्चे तेल की किस्म पर आधारित है.
ज़मीन से जो कच्चा तेल यानी क्रूड ऑयल निकाला जाता है, वह डेन्सिटी, सल्फ़र की मात्रा और बहने की क्षमता के आधार पर अलग-अलग ग्रेड किया जाता है.

मोटे तौर पर कच्चा तेल दो तरह का होता है.
1. हल्का कच्चा तेल (लाइट क्रूड ऑयल)
2. भारी कच्चा तेल (हेवी क्रूड ऑयल)
ऊर्जा विश्लेषक गौरव शर्मा बताते हैं, “कच्चे तेल की लगभग 160 से ज़्यादा किस्में हैं. दुनिया भर की अलग-अलग रिफ़ाइनरियां कच्चे तेल के अलग-अलग ग्रेड को प्रोसेस करती हैं.”
हल्के कच्चे तेल को भारी गाढ़े कच्चे तेल की तुलना में रिफ़ाइन करना आसान होता है.
रिफ़ाइनिंग के बाद हल्के तेल का ज़्यादातर इस्तेमाल पेट्रोल और जेट फ़्यूल (विमानों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन) जैसे प्रोडक्ट्स के लिए किया जाता है.
वहीं भारी तेल का इस्तेमाल जहाज़ों के लिए ईंधन, सड़क बनाने के सामान और लिप बाम जैसी कई दूसरी चीज़ों के लिए किया जा सकता है.
हल्का कच्चा तेल भारी कच्चे तेल से ज़्यादा कीमती होता है, इसलिए इसे ख़रीदना महंगा होता है.
अमेरिका के मामले में यही तथ्य अहम है.

साल 2025 में, अमेरिका ने हर दिन 1 करोड़ 34 लाख बैरल तेल बेचा. इसी दौरान उसने हर दिन लगभग 20 लाख बैरल तेल दूसरे देशों से खरीदा.
ऐसे में सवाल ये कि अमेरिका जिस तेल का उत्पादन कर रहा है, वो उसे ही अपने पास क्यों नहीं रखता?
पूरा मामला हल्के और भारी तेल का है.
अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट के मुताबिक़ अमेरिका का 80 प्रतिशत तेल हल्का है.
लेकिन अमेरिका की ज़्यादातर तेल रिफ़ाइनरी भारी तेल के हिसाब से बनी हैं.
ऐसा इसलिए क्योंकि 20वीं सदी में अमेरिका को मिलने वाला ज़्यादातर तेल लैटिन अमेरिका और कनाडा से आयात किए जाने वाला भारी कच्चा तेल होता था.
फिर 2000 के दशक की शुरुआत में अमेरिकी के तेल उत्पादन में एक बड़ा बदलाव आया.
टेक्नोलॉजी में तरक्की हुई और शेल चट्टानों से बड़े पैमाने पर हल्का कच्चा तेल निकालना संभव हुआ.
अब अमेरिका जिस तरह का कच्चा तेल निकालता है और जिस तरह के कच्चे तेल को उसकी रिफ़ाइनरियां प्रोसेस कर सकती हैं, उसमें मेल नहीं है.
मतलब अमेरिका ज़्यादातर हल्का तेल निकालता है, लेकिन उसके पास भारी तेल को रिफ़ाइन करने की क्षमता है.
गौरव शर्मा कहते हैं, “एक बार रिफ़ाइनरी बन जाने के बाद, उसे बदलना बहुत मुश्किल होता है. और इसके लिए लाखों-करोड़ों डॉलर के निवेश की ज़रूरत होती है.”
ऐसा करना फ़ायदेमंद नहीं है.
वहीं भारी कच्चे तेल के मुक़ाबले हल्के कच्चे तेल की कीमत ज़्यादा होने के नाते अमेरिका अपना हल्का कच्चा तेल ज़्यादा दाम पर बेच सकता है और भारी कच्चा तेल सस्ते दाम पर ख़रीद सकता है.
आर्थिक रूप से यही सही है.
तेल को लेकर अमेरिका और वेनेज़ुएला संबंध
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दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वेनेज़ुएला, सऊदी अरब, ईरान, कनाडा, ईराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, रूस, अमेरिका और लीबिया में हैं.
इनमें से कई देश भारी कच्चा तेल निकालने के लिए जाने जाते हैं.
इनमें से तीन देश हैं, वेनेज़ुएला, ईरान और रूस जिन पर फ़िलहाल अमेरिका के प्रतिबंध लगे हुए हैं.
इसके बावजूद वेनेज़ुएला से थोड़ा-बहुत तेल अमेरिका तक पहुंचता रहा है. इसकी वजह ये है कि वेनेज़ुएला में तेल मिलने के बाद वहां की तेल इंडस्ट्री को खड़ा करने में ज़्यादातर मदद अमेरिकी कंपनियों ने की थी.
20वीं सदी में ज़्यादातर वक़्त तक अमेरिका वहां से भारी कच्चा तेल निकालता रहा.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ नवार्रा की डॉ. कारमेन बीट्रिज़ फर्नांडीज कहती हैं, “दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों के उलट, वेनेज़ुएला ने 1976 में तेल के राष्ट्रीयकरण के दौरान भी अमेरिका के साथ ये अच्छे रिश्ते बनाए रखे. इसमें उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन रिश्ता हमेशा अच्छा रहा.”
लेकिन इस रिश्ते में बदलाव 1999 में तब आया जब सोशलिस्ट नेता ह्यूगो शावेज़ सत्ता में आए.
उन्होंने ख़ास तौर पर तेल उद्योग पर सरकारी कंट्रोल मज़बूत किया.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज़ में सेंटर फ़ॉर लैटिन अमेरिकन स्टडीज़ की डॉ. ग्रेस लिविंगस्टोन कहती हैं, “उन्होंने विदेशी तेल कंपनियों पर कड़ी शर्तें लगा दीं, और यही बात अमेरिकी सरकार और अमेरिकी तेल कंपनियों को बिल्कुल पसंद नहीं आई.”

जब 2013 में ह्यूगो शावेज़ की मौत हुई तो निकोलस मादुरो वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति बने और उन्होंने इन नीतियों को जारी रखा.
2019 में वर्ल्ड बैंक के एक ट्रिब्यूनल ने वेनेज़ुएला की सरकार को अमेरिकी तेल कंपनियों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया. लेकिन इसका भुगतान नहीं किया गया.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब वह आरोप लगाते हैं कि वेनेज़ुएला ने अमेरिका का तेल चुराया है, तब वह इसी बात का ज़िक्र करते हैं.
वहीं वेनेज़ुएला इन आरोपों से इनकार करता है.
साल 2025 के आख़िर में दोनों देशों के बीच हालात और बिगड़ गए, जब अमेरिकी सेना ने तेल टैंकर ज़ब्त कर लिए और वेनेज़ुएला के बंदरगाहों पर घेराबंदी कर दी.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यह नार्कोटेररिज़्म से निपटने के लिए किया गया है.
क्या वेनेज़ुएला के तेल पर अब अमेरिका का दख़ल होगा?
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3 जनवरी, 2026 को, अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ लिया. उन्हें ड्रग और हथियारों की तस्करी से जुड़े मुक़दमे के लिए अमेरिका ले जाया गया है.
इस कार्रवाई के बाद ट्रंप ने कहा, “हम दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों को वहां अरबों-खरबों डॉलर निवेश करने के लिए भेजेंगे. वहां से कमाया पैसा वहीं इस्तेमाल होगा और इससे सबसे ज़्यादा फ़ायदा वेनेज़ुएला के लोगों को मिलेगा.”
पिछले कई दशकों से वेनेज़ुएला पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से रूस, ईरान और खासकर चीन के लिए जगह बनी.
ग्रेस लिविंगस्टोन कहती हैं, “चीन न सिर्फ़ वेनेज़ुएला, बल्कि ज़्यादातर दक्षिण अमेरिकी देशों का एक बहुत ही अहम ट्रेड पार्टनर बन गया है. और ख़ासकर वह तेल, तांबा और दूसरे प्राकृतिक संसाधन बड़े पैमाने पर खरीद रहा है.”
चीन वेनेज़ुएला का लगभग 90 प्रतिशत तेल खरीदता रहा है.
ट्रंप प्रशासन यही रोकना चाहता है. जैसा कि उन्होंने कहा था, “हम वहां सुरक्षा चाहते हैं. हम ऐसे पड़ोसी चाहते हैं जो दुनिया भर में हमारे दुश्मनों को पनाह न दे रहे हों.”
वेनेज़ुएला के तेल को लेकर हालात जल्दी बदलने वाले नहीं हैं.
वेनेज़ुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात तेल भंडार, जो लगभग 303 अरब बैरल है. इसके बावजूद वेनेज़ुएला रोज़ दस लाख बैरल से भी कम तेल निर्यात करता है.
ऐसा प्रतिबंधों और दशकों से कम फंडिंग और ख़राब प्रबंधन के कारण है.
गौरव शर्मा कहते हैं, “कई जगह इंफ़्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से खड़ा करना होगा और वेनेज़ुएला के कच्चे तेल की ठीक-ठाक मात्रा में सप्लाई शुरू होने में तीन से चार साल लग सकते हैं.”
हालांकि, जलवायु परिवर्तन की चिंताओं के बीच ज़्यादा नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया जा रहा है, लेकिन आज भी ग्लोबल ऑर्डर में तेल की बहुत अहम भूमिका है.
गौरव शर्मा कहते हैं, “पिछली एक सदी में ऑयल इंडस्ट्री कई देशों के लिए बेहिसाब दौलत का ज़रिया रही है. यह एक मल्टी-ट्रिलियन-डॉलर की इंडस्ट्री है जिसने रातों-रात कई देशों की किस्मत बदल दी है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित