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कभी किसी उबाऊ मीटिंग में बैठे हुए क्या अचानक आपके मन में यह ख़्याल आया है: “क्या होगा अगर मैं चिल्लाना शुरू कर दूं?”
या आप गाड़ी चला रहे हों और सोचने लगें: “अगर मेरी टक्कर हो जाए तो?”
इन परेशान करने वाली स्थितियों को ‘अवांछित विचार’ या इंट्रूसिव थॉट्स कहा जाता है. हममें से ज़्यादातर लोग समय-समय पर इनका अनुभव करते हैं और इन्हें झटककर हटा देने में सक्षम होते हैं.
लेकिन कुछ लोगों के लिए, ये विचार एक भारी फ़ितूर बन सकते हैं, जो उन्हें कुछ ख़ास बर्ताव ( कंपलसिव बिहेवियर) करने पर मजबूर कर देते हैं.
जब डॉक्टर नीना हिग्सन-स्वीनी छोटी थीं, तो उन्हें पक्का यकीन था कि अगर स्कूल से घर वापस आते समय उनके मन में पूरे रास्ते सिर्फ ‘अच्छे’ विचार नहीं आए, तो उनके परिवार को नुक़सान पहुंचेगा.
वह कहती हैं, “अगर मेरे मन में कोई ऐसा अवांछित विचार आता, तो मैं बस स्टॉप से दोबारा चलना शुरू कर देती थी. मुझे सच में डर लगता था कि अगर मैंने इसे दोबारा नहीं किया और कुछ हो गया, तो वह मेरी गलती होगी.”
दुनिया की 1 से 3% फ़ीसदी आबादी ओसीडी से प्रभावित
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नीना को 10 साल की उम्र में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) होने का पता चला था. अब वे यूके की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक मनोविज्ञान शोधकर्ता के रूप में काम करती हैं. उन्हें बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञता हासिल है.
नीना ने बीबीसी को बताया, “ऑब्सेशन्स (सनक या फ़ितूर) अवांछित और बिन बुलाए विचार, भावनाएं और संवेदनाएं होती हैं, जबकि कंपल्शन (विवशतापूर्ण बर्ताव) वे दोहराए जाने वाले, औपचारिक कार्य हैं जो ऑब्सेशन्स की वजह से होने वाली घबराहट को कम करने या शांत करने के लिए किए जाते हैं.”
अवांछित विचार बेहद तनावपूर्ण हो सकते हैं और अक्सर उन विषयों पर केंद्रित होते हैं जो व्यक्ति के मूल्यों या पहचान के बिल्कुल विपरीत लगते हैं.
नीना कहती हैं, “आपके मन में अपनों को नुक़सान पहुंचने के विचार आ सकते हैं. यह किसी के यौन आकर्षण पर सवाल उठने जैसा भी हो सकता है, जैसे कि क्या आप होमोसेक्सुअल हैं? क्या आप हेट्रोसेक्सुअल हैं? यहां तक कि यह इस हद तक भी हो सकता है जहां आप चिंता करने लगें कि कहीं आप ‘पेडोफ़ाइल’ तो नहीं हैं?”
वह कहती हैं, “एक बहुत ही सामान्य विचार संक्रमण और बीमार होने या बीमारी फैलाने की चिंताओं से जुड़ा होता है.”
वह बताती हैं कि ओसीडी आमतौर पर यौवनारंभ या प्यूबर्टी या शुरुआती किशोरावस्था में शुरू होता है. लेकिन कुछ लोगों में इसका पता जीवन में बाद में भी चलता है क्योंकि वे “वर्षों तक अपनी इस परेशानी को छिपाने या ढकने में बिता देते हैं.”
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शोध बताते हैं कि ओसीडी होने के पीछे आनुवंशिक कारण हो सकते हैं और साथ ही इसका संबंध जीवन के शुरुआती तनाव जैसे कि धौंस झेलना, किसी की मृत्यु या परिवार के टूटने से भी हो सकता है.
चार्टर्ड मनोवैज्ञानिक किम्बरली विल्सन कहती हैं कि लगभग हर कोई कोई कभी न कभी ‘अवांछित विचार’ का अनुभव करता है. वह कहती हैं, “शोध बताते हैं कि हम में से करीब 80% लोगों को ऐसे विचार आते हैं.”
ज़्यादातर लोगों के दिमाग से ये विचार जल्दी ही निकल जाते हैं.
वह कहती हैं, “हम उन्हें देख सकते हैं, सोच सकते हैं कि ये कितने अजीब हैं, और फिर उन्हें किनारे कर देते हैं.”
उनके मुताबिक, मदद लेने की जरूरत तब पड़ती है जब आप इन विचारों को ख़ारिज करने में असमर्थ हों.
“ओसीडी से जुड़े विचार ऐसे ही गुज़र नहीं जाते, वे दिमाग में घर कर लेते हैं और वे कभी भी सकारात्मक नहीं होते – वे आक्रामक और शत्रुतापूर्ण होते हैं जिन्हें झेलना आसान नहीं होता. यहीं पर यह स्थिति आप पर पूरी तरह हावी होने लगती है और ‘कंपल्शन’ (मजबूरन किए जाने वाले काम) का रूप ले लेती है.”
इन कंपल्शन के लक्षण मानसिक हो सकते हैं, जैसे कि किसी ख़ास नंबर तक गिनना, या फिर नज़र आने वाले हो सकते हैं, जैसे कि गाड़ी के टायरों को बार-बार चेक करना, भले ही आप जानते हों कि वे बिल्कुल ठीक हैं.
ओसीडी को कैसे मैनेज करें?
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नीना कहती हैं कि ऐसे मामलों में “एक प्रोफेशनल या विशेषज्ञ यह तय कर सकता है कि आपके लिए सबसे अच्छा क्या होगा.”
नीना बताती हैं कि प्रोफेशनल मदद के साथ-साथ, कुछ ऐसी तकनीकें भी हैं जिन्हें लोग अपनी घबराहट कम करने के लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपना सकते हैं.
इनमें से एक है विचारों की पहचान करना. वह कहती हैं, “यह पहचानना कि ‘मुझे एक अवांछित विचार आ रहा है’, उस विचार से एक दूरी बना देता है और मुझे याद दिलाता है कि यह विचार ‘मैं’ नहीं हूँ.”
कुछ लोगों को ओसीडी को खुद से अलग एक चीज़ के रूप में कल्पना करना भी मददगार लगता है.
“ओसीडी कैसा दिखता है, इसका चित्र बनाना मदद कर सकता है – एक मैं हूं और एक ओसीडी है, और ये दोनों अलग-अलग हैं.”
अपना ख़्याल रखना भी बहुत मायने रखता है. वह कहती हैं, “अच्छा खाना, आराम करना और शारीरिक गतिविधि मदद कर सकती है, क्योंकि मेरा ओसीडी तब और बिगड़ जाता है जब मैं तनाव में होती हूं और अपना ख्याल नहीं रख रही होती.”
नीना अब भी ओसीडी के साथ जी रही हैं, लेकिन उन्होंने इसे मैनेज करना सीख लिया है.
“मैं ओसीडी से पूरी तरह कभी नहीं उबरी, लेकिन मैं इसके साथ अपना सामान्य जीवन जी सकती हूं. अब मुझे हल्के ‘अवांछित विचार’ आते हैं और मुझे इस बात की गहरी समझ है कि इन्हें कैसे संभालना है. हालांकि, जब मैं तनाव में होती हूं, तो उन्हें ख़ारिज करना मुश्किल होता है और वे अब भी मुझे कंपल्शन की ओर ले जा सकते हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.