इसराइल में अमेरिका के राजदूत माइक हकाबी ने कहा है कि अगर इसराइल पूरे मध्य पूर्व पर कब्ज़ा कर ले तो भी ठीक है.
माइक हकाबी ने शनिवार को दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता और टिप्पणीकार टकर कार्लसन को एक इंटरव्यू में कहा कि इसराइल को ‘बाइबल के मुताबिक़ मध्य पूर्व के बड़े हिस्सों पर कब्ज़ा करने का अधिकार है.’
हकाबी के इस बयान पर जॉर्डन और इस्लामी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है.
जॉर्डन ने हकाबी के बयान को गैर-ज़िम्मेदाराना, भड़काऊ और बेतुका करार दिया है वहीं ओआईसी ने कहा है कि इसे किसी भी हालात में मंजूर नहीं किया जा सकता.
हकाबी ने क्या कहा
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इमेज कैप्शन, माइक हकाबी इसराइल के कट्टर समर्थक माने जाते हैं
टकर पूर्व रिपब्लिकन गवर्नर हकाबी से बातचीत में ओल्ड टेस्टामेंट की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ का ज़िक्र कर रहे थे.
जब टकर ने पूछा कि हकाबी ने ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ का तीन बार हवाला क्यों दिया और क्या वह मानते हैं कि इसराइल को मध्य पूर्व की ज़मीन पर कब्ज़ा करने का अधिकार है, तो उन्होंने कहा कि “अगर वे सब कुछ ले लें तो भी ठीक रहेगा.”
‘टकर कार्लसन नेटवर्क’ के इंटरव्यू में टकर कार्लसन ने कहा कि हकाबी ने जेनेसिस 15 का ज़िक्र किया है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वर ने अब्राहम को बताया था कि उनके वंशजों को यूफ्रेटिस नदी (जो आज के इराक और सीरिया से होकर बहती है) से लेकर नील नदी (मिस्र में) तक की भूमि विरासत में मिलेगी.
कार्लसन ने पूछा, ”आप जेनेसिस 15 का हवाला देते हैं, तो उसमें नील से लेकर यूफ्रेटिस तक की भूमि की बात है. यानी इसमें इसराइल, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और यहां तक कि सऊदी अरब और इराक के हिस्से भी आते हैं. तो क्या आप मानते हैं कि इसराइल का उस पूरे क्षेत्र पर अधिकार है?
इस पर हकाबी ने कहा, ”मुझे नहीं पता कि वह इतना दूर तक जाता है. लेकिन यह ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा है.”
कार्लसन ने कहा, ”तो क्या ईश्वर ने वह भूमि यहूदियों को दी या नहीं दी? आप कह रहे हैं कि दी. इसका क्या मतलब है? क्या उनका उस पर अधिकार है?
हकाबी ने कहा, ”अगर वे सब कुछ ले लें, तो भी ठीक होगा.”
हकाबी एक इवेंजेलिकल क्रिश्चियन हैं और इसराइल के कट्टर समर्थक माने जाते हैं.
जॉर्डन और ओआईसी ने किया विरोध
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हकाबी के इस बयान का जॉर्डन ने कड़ा विरोध किया है.
जॉर्डन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि ये बयान राजनयिक मर्यादाओं का उल्लंघन और क्षेत्र के देशों की संप्रभुता पर हमला है.
उन्होंने कहा कि हकाबी का बयान अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन हैं. ये बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से कब्जे वाले वेस्ट बैंक के विलय को नामंजूर करने की घोषित नीति के उलट हैं.
उन्होंने कहा कि यह बयान गैर-जिम्मेदाराना, भड़काऊ और बेतुका है.
वहीं ओआईसी के बयान में कहा गया है, ”इसराइल के विस्तार के बारे में जो बयान दिया गया है वो किसी भी तरह से मंजूर नहीं किया जा सकता है. एक झूठे और ऐतिहासिक तौर पर ख़ारिज कर दिए गए विचारधारा से जुड़े नैरेटिव पर आधारित फ़लस्तीन और अरब की ज़मीन को कब़्जा करने के तर्क को मंजूर नहीं किया जा सकता है.”
“ये बयान मध्यपूर्व के देशों की संप्रभुता का उल्लंघन है. साथ ही कूटनीतिक नियमों, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का भी उल्लंघन हैं.”
इसराइल कैसे बना
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इमेज कैप्शन, 1967 में छह दिन की लड़ाई के बाद यरूशलम पर कब्ज़े के बाद इसराइली पैराट्रूपर्स
यहूदियों का मानना है कि आज जहाँ इसराइल बसा हुआ है, ये वही इलाक़ा है, जो ईश्वर ने उनके पहले पूर्वज अब्राहम और उनके वंशजों को देने का वादा किया था.
पुराने समय में इस इलाक़े पर असीरियों (आज के इराक़, ईरान, तुर्की और सीरिया में रहने वाले क़बायली लोग), बेबीलोन, पर्सिया, मकदूनिया और रोमन लोगों का हमला होता रहा था. रोमन साम्राज्य में ही इस इलाक़े को फ़लस्तीन नाम दिया गया था और ईसा के सात दशकों बाद यहूदी लोग इस इलाक़े से बेदखल कर दिए गए.
इस्लाम के अभ्युदय के साथ सातवीं सदी में फ़लस्तीन अरबों के नियंत्रण में आ गया और फिर यूरोपीय हमलावरों ने इस पर जीत हासिल की. साल 1516 में ये तुर्की के नियंत्रण में चला गया और फिर पहले विश्व युद्ध तक ब्रिटेन के क़ब्ज़े में जाने तक यथास्थिति बनी रही.
फ़लस्तीन पर संयुक्त राष्ट्र की एक स्पेशल कमेटी ने तीन सितंबर, 1947 को जेनरल असेंबली को अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में कमेटी ने मध्य पूर्व में यहूदी राष्ट्र की स्थापना के लिए धार्मिक और ऐतिहासिक दलीलों को स्वीकार कर लिया.
साल 1917 के बालफोर घोषणापत्र में ब्रिटिश सरकार ने यहूदियों को फ़लस्तीन में ‘राष्ट्रीय घर’ देने की बात मान ली थी. इस घोषणापत्र में यहूदी लोगों के फ़लस्तीन के साथ ऐतिहासिक संबंध को मान्यता दी गई थी और इसी के आधार पर फ़लस्तीन के इलाक़े में यहूदी राज्य की नींव पड़ी.
यूरोप में नाज़ियों के हाथों लाखों यहूदियों के जनसंहार के बाद और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक अलग यहूदी राष्ट्र को मान्यता देने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा था.
अरब लोगों और यहूदियों के बीच बढ़ते तनाव को सुलझाने में नाकाम होने के बाद ब्रिटेन ने ये मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के विचार के लिए रखा.
29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फ़लस्तीन के बँटवारे की योजना को मंज़ूरी दे दी. इसमें एक अरब देश और यहूदी राज्य के गठन की सिफ़ारिश की गई और साथ ही यरूशलम के लिए एक विशेष व्यवस्था का प्रावधान किया गया.
इस योजना को यहूदियों ने स्वीकार कर लिया लेकिन अरब लोगों ने ख़ारिज कर दिया. वे इसे अपनी ज़मीन खोने के तौर पर देख रहे थे. यही वजह थी कि संयुक्त राष्ट्र की योजना को कभी लागू नहीं किया जा सका.
फ़लस्तीन पर ब्रिटेन का नियंत्रण समाप्त होने के एक दिन पहले 14 मई, 1948 को स्वतंत्र इसराइल के गठन की घोषणा कर दी गई.
इसके अगले दिन इसराइल ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए आवेदन किया और एक साल बाद उसे इसकी मंज़ूरी मिल गई. संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में 83 फ़ीसदी देश इसराइल को मान्यता दे चुके हैं. दिसंबर, 2019 तक 193 देशों में 162 ने इसराइल को मान्यता दे दी थी.
बुक ऑफ जेनेसिस क्या है
‘जेनेसिस’ तोराह की पांच किताबों में से पहली किताब है. इसलिए यह हिब्रू बाइबल और ईसाई ओल्ड टेस्टामेंट की भी पहली किताब मानी जाती है.
यहूदी समुदाय तोराह को अपना सबसे पवित्र ग्रंथ मानता है. वो खुद को अब्राहम की संतान मानता है. अब्राहम वही नाम है जो ‘जेनेसिस 17:4-8’ में अब्राम को दिया गया था.
पाठ के अनुसार, अब्राम के वंशजों को कनान की भूमि विरासत में मिलनी थी, जो मिस्र की नदी से लेकर यूफ्रेटिस नदी तक फैली हुई बताई गई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.