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ईरान से सटे इलाके में अमेरिकी सेना की लगातार बढ़ती तैनाती अब सिर्फ़ संकेत देने तक सीमित नहीं लगती. बल्कि ये वास्तविक तैयारी का संकेत दे रही है.
अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के ईरानी जलक्षेत्र के पास पहुंचने से स्थिति पहले ही काफी गंभीर मानी जा रही है.
एक अन्य विमानवाहक पोत यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड अब पूरब दिशा की ओर बढ़ रहा है ताकि संभावित सैन्य अभियानों में शामिल हो सके.
इसे आख़िरी बार जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के पास देखा गया था.
इसके अलावा दूसरे सैन्य साजो-सामान भी इस इलाके में लाए गए हैं.
इससे ये संकेत मिलता है कि अमेरिका यहां कई स्तरों पर सैन्य कार्रवाई के लिए विकल्प तैयार कर रहा है.
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ऐसी सैन्य तैनाती कूटनीति में दबाव बनाने का ज़रिया हो सकती है. लेकिन इन सभी कदमों को मिलाकर देखा जाए तो यह संकेत भी मिलता है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत में कोई अड़चन आ गई है.
अगर इस अड़चन के बाद दोनों पक्ष अपने रुख में बदलाव नहीं करते तो मिलिट्री एक्शन हो सकता है.
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है. आखिर क्यों ईरानी नेता, कम से कम सार्वजनिक तौर पर, दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना और मध्य पूर्व में उसके सबसे मजबूत क्षेत्रीय सहयोगी के सामने भी अपने रुख़ पर अड़े हैं.
इसका जवाब अमेरिका की ओर बातचीत के लिए रखी शर्तों में छिपा है.
ईरान की नज़र में अमेरिकी शर्तें मानना आत्मसमर्पण करने जैसा
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ईरान मानता है कि इन मांगों को मानना आत्मसमर्पण करने जैसा है.
अमेरिकी शर्तों में यूरेनियम इनरिचमेंट को ख़त्म करना और बैलेस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता को इतनी कम करना कि वे इसराइल के लिए खतरा न रहें, जैसी शर्तें शामिल हैं.
इसके अलावा कई और शर्तें भी हैं- जैसे पूरे क्षेत्र में सशस्त्र समूहों को समर्थन रोकना और ईरान को अपने नागरिकों के साथ व्यवहार में बदलाव करना भी शामिल है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी यही कहा है.
ईरानी नेतृत्व के लिए ये कोई सेकेंडरी पॉलिसी नहीं है. ये उस व्यवस्था के मूल तत्व हैं, जिसे वह अपना सुरक्षा स्ट्रक्चर मानता है.
शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के बिना भी ईरान ने दशकों तक वह चीज खड़ी की है जिसे वह ‘प्रतिरोध की धुरी’ यानी एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस कहता है.
यह सहयोगी सशस्त्र समूहों का एक नेटवर्क है, जिसे इस तरह तैयार किया गया है कि टकराव ईरान की सीमाओं से दूर रहे और दबाव को इसराइल के करीब सरकाया जा सके.
ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम उसकी पुरानी पड़ चुकी वायुसेना और एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी तक उसकी सीमित पहुंच की कमी की भरपाई करता है.
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर शांतिपूर्ण बताया जाता है, लेकिन व्यापक तौर इसे उसकी प्रतिरोधक क्षमता माना जाता है.
ईरान के यूरेनियम एनरिचमिंट साइकिल का इस्तेमाल भले ही हथियार बनाने में न किया गया हो लेकिन इस पर पकड़ बनाए रखना विशेषज्ञों की भाषा में “थ्रेशहोल्ड क्षमता” पैदा करना है.
इसका मतलब है ऐसा बुनियादी ढांचा, जिसे केवल एक राजनीतिक फ़ैसले के ज़रिये सैन्य इस्तेमाल की दिशा में मोड़ा जा सकता है. यही क्षमता अपने आप में दबाव बनाने का साधन बन जाती है.
ईरान मानता है कि अगर ये शर्तें मान ली जाएं तो उसकी प्रतिरोधक क्षमता की बुनियाद कमजोर हो जाएगी.
सर्वोच्च नेता के लिए जोख़िम
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ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई के नज़रिये से ऐसी शर्तों को स्वीकार करना, डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका के साथ सीमित युद्ध का ज़ोखिम उठाने से भी अधिक ख़तरनाक दिखाई दे सकता है.
सैन्य टकराव, चाहे वह कितना भी महंगा क्यों न हो सहा जा सकता है. संभव है कि सहने योग्य समझा जाए. लेकिन अपनी पूरी रणनीति को वापस ले लेना शायद मंजूर न हो.
हालांकि इस आकलन में गहरे ज़ोखिम छिपे हैं और वे केवल ईरान तक सीमित नहीं हैं.
किसी भी अमेरिकी अभियान की शुरुआत में शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया जा सकता है.
अगर ख़ामेनेई मारे जाते हैं तो इससे न केवल तीन दशकों से अधिक समय से चला आ रहा उनका शासन समाप्त होगा, बल्कि एक नाज़ुक क्षण में उत्तराधिकार की प्रक्रिया भी अस्थिर हो सकती है.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और अन्य सुरक्षा संस्थानों पर हमले उस तंत्र को भी कमजोर कर सकते हैं, जिसने हाल ही में ईरान के इतिहास की सबसे घातक और हिंसक कार्रवाइयों के तरीकों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है.
हाल के हफ़्तों में में सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी सिर्फ़ बल प्रयोग के बाद पीछे हटे हैं. उनमें अब भी गहरा असंतोष है. इसलिए सरकार की दमनकारी मशीनरी पर अचानक पड़ी कोई चोट घरेलू सत्ता संतुलन को अप्रत्याशित तरीके से बदल सकता है.
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ईरान यह मान सकता है कि अमेरिका का मक़सद सिर्फ़ उसकी परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने तक सीमित होगा. लेकिन युद्ध शायद ही कभी शुरुआती धारणाओं के अनुसार आगे बढ़ते हैं.
लक्ष्यों, लड़ाई की अवधि या राजनीतिक परिणामों को लेकर कोई गलत आकलन संघर्ष को तेजी से फैला सकता है.
आर्थिक दबाव जोख़िम की एक और कड़ी है. प्रतिबंधों, महंगाई और लोगों की घटती ख़रीद क्षमता पहले से ही दबाव में है. ईरान की अर्थव्यवस्था पर लगने वाले अतिरिक्त झटके को सहने में कठिनाई महसूस करेगी.
तेल निर्यात में मुश्किल या उसके बुनियादी ढांचे को नुक़सान देश के लोगों के गुस्से को और बढ़ा सकता है. लोगों के गुस्से को अब तक दबाया गया है. शांत नहीं किया गया है.
ऐसी स्थिति में अगर ईरानी नेतृत्व का रुख चुनौती देने वाला लग रहा है तो यह बाहर की दुनिया को उसकी दृढ़ता का संकेत देता है और भीतरी ताक़त को भी दिखाता है. लेकिन यह समझौते की गुंजाइश को भी सीमित कर देता है.
अमेरिका का जोख़िम
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अमेरिका के सामने भी जोख़िम है.
कागज़ पर देखा जाए तो तनाव बढ़ने की स्थिति में अमेरिकी सेना के पास अपने सर्वोच्च कमांडर के मक़सद को पूरा करने की क्षमता है.
लेकिन युद्ध कागज़ पर नहीं लड़े जाते. वे गलत आकलन, तनाव की बढ़ोतरी और उम्मीद से परे नतीजों की वजह से शक्ल अख्त़ियार करते हैं.
पिछली बार इसराइल के साथ 12 दिनों के युद्ध ने ईरान की कमान संरचना और सैन्य इन्फ़्रास्ट्रक्चर की कमियों को उजागर कर दिया था. साथ ही इस तरह के सबक भी दिए थे कि हमलों को कैसे सहना है या रणनीति को कैसे फिर से संतुलित करना है. साथ ही दबाव में कैसे जवाब देना है.
एक व्यापक टकराव दोनों पक्षों के लिए ऐसे नतीजे लेकर आ सकता है, जिसकी शायद उम्मीद दोनों पक्ष न करना चाहें.
ईरान में केंद्रीय सत्ता कमज़ोर होती भी है तो इससे वहां स्थिरता आ जाएगी ऐसा नहीं है. होना अपने आप स्थिरता या पश्चिमी हितों के साथ तालमेल में बदल नहीं जाएगा.
सत्ता के शिखर पर शून्य पैदा हुआ तो शायद ईरान में ज़्यादा कट्टर असर के केंद्र दिखें. इससे क्षेत्रीय संतुलन इस तरह जटिल हो सकता है. ये अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए मुश्किल ला सकता है.
ईरान के सामने विकल्प
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आयतुल्लाह ख़ामेनेई के पक्ष में अब काफी कम पसंदीदा विकल्प बचे हैं.
अमेरिका की शर्तें स्वीकार करना शासन की प्रतिरोधक रणनीति को खोखला करने का जोखिम पैदा करता है. उन्हें ठुकराना ऐसे समय में टकराव की आशंका बढ़ाता है, जब अंदरूनी हालात पहले ही नाज़ुक हैं.
उनके इस टकराव को दो तरह से देख सकते हैं. उनके हिसाब से सबसे ‘ख़राब विकल्प’ रणनीतिक समर्पण होगा. और सबसे कम ख़राब विकल्प होगा एक सीमित और नियंत्रित हो सकने वाला युद्ध. ईरान फिलहाल सार्वजनिक तौर पर दूसरे विकल्प की ओर से झुकता दिख रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.