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चीन के एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के पीछे की गलियों का माहौल उदास है.
कुछ मजदूर दुकानों के सामने पेड़ के नीचे खड़े होकर सिगरेट पी रहे हैं. इन दुकानों पर फ़ैक्ट्री की अस्थायी नौकरियों के विज्ञापन लगे हैं.
नाम न छापने की शर्त पर एक मजदूर कहता है, “कोई नहीं समझता कि हमारी ज़िंदगी कैसी है.”
दूसरा कहता है, “हम बस काम करते रहते हैं, हमारी कोई ज़िंदगी नहीं है. कृपया हमारी मदद करें.”
यह एक विदेशी पत्रकार से की गई एक दुर्लभ और जोख़िम भरी अपील है.
ये लोग बेहद परेशान दिखते हैं. वे इतना कमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि घर पैसे भेज सकें.
साथ ही, वे चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में हो रहे बड़े बदलावों से जूझ रहे हैं, जहां सस्ते, बड़े पैमाने पर बनने वाले सामान की जगह अब ऑटोमेशन और एडवांस टेक्नोलॉजी ले रही है.
और यह सब तो तब भी था, जब अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच युद्ध ने ग्लोबल इकोनॉमी को झटका नहीं दिया था.
दबाव में चीन
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चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही धीमी रफ़्तार और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रही थी.
पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ लगे. फिर भी, उसने मजबूती दिखाई, निर्यात बढ़ाया और लगभग 5 फ़ीसदी जीडीपी ग्रोथ दर्ज की. लेकिन असंतोष अंदर ही अंदर बढ़ता रहा.
अब मध्यपूर्व का संघर्ष नया दबाव डाल रहा है. इससे फ़ैक्ट्री ऑर्डर, लागत और नौकरियों पर असर पड़ रहा है.
दक्षिणी औद्योगिक प्रांत गुआंगदोंग के फोशान शहर में, मजदूरों के सामने सबसे अच्छा विकल्प यह है- प्लास्टिक ढालने या मोबाइल फोन के पुर्जे जोड़ने का कुछ हफ्तों का काम, जिसमें 18 से 20 युआन प्रति घंटा मिलते हैं. यानी कुछ ही डॉलर.
ग्रामीण इलाके से आया एक मजदूर कहता है, “मैं कहीं और काम ढूंढने की कोशिश करूंगा.”
अधिकतर मजदूर 40 साल से ऊपर के हैं और अनिश्चितता से परेशान हैं.
चीन के पास पर्याप्त तेल भंडार हैं. वह रिन्युबल एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहनों में बढ़त की वजह से ईंधन संकट के सबसे बुरे असर से बचा हुआ है.
लेकिन युद्ध के कारण होर्मुज़ स्ट्रेट प्रभावित हो रहा है और इससे निर्यात पर निर्भर चीनी अर्थव्यवस्था को झटका लग रहा है.
ट्रक से कपड़े के गट्ठे उतरवाकर उन्हें फैक्ट्रियों तक भिजवाने वाली एक व्यापारी कहती हैं, “लागत करीब 20 फ़ीसदी बढ़ गई है.”
ये कपड़े ज़ारा, शीन और टेमू जैसे ग्लोबल ब्रांड्स के लिए बनाए जाते हैं.
गुआंगझाऊ का ये बाज़ार दुनिया का सबसे बड़ा कपड़ा बाज़ार है. ये फोशान से एक घंटे की दूरी पर है. यहां सड़कों पर मोटरसाइकिलों पर रंग-बिरंगे कपड़ों के रोल लदे होते हैं और छोटे ट्रक सामान लेकर आते-जाते रहते हैं.
नायलॉन, पॉलिएस्टर और सिल्क के ढेरों के बीच दुकानों को पहचानना मुश्किल है, लेकिन हर दुकानदार और मालिक की कहानी लगभग एक जैसी है.
यह क़ारोबार सस्ते और तेल की स्थिरता पर निर्भर करता है. क्योंकि ये कपड़े पेट्रोकेमिकल्स से ही बनते हैं. अब तेल की कीमतें बढ़ने से क़ारोबार पर असर पड़ रहा है.
एक व्यापारी कहता है, “इसका मतलब है कम ऑर्डर.” कुछ ग्राहक ज्यादा कीमत देने से मना कर रहे हैं, जिससे कपड़े का स्टॉक गोदाम में जमा हो रहा है.
अगर व्यापारी कीमत नहीं बढ़ाते, तो उन्हें खुद नुक़सान उठाना पड़ता है. जो पहले से कम मुनाफे़ में काम करने वालों के लिए मुश्किल है.
आपदा में अवसर

एक साल पहले, जब अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर चल रहा था तब गुआंगझाऊ की सड़कों पर विरोध का माहौल था. लेकिन इस बार लोगों ने हालात से समझौता कर लिया है.
लेकिन अनिश्चितता के बीच भी अवसर हैं.
पास ही कैंटन फेयर में दुनिया भर के खरीदार आ रहे हैं.
यहां रोबोट हाथ हिलाते और गाने गाते हैं और लोग उनके साथ सेल्फी लेते हैं.
यह वही चीन है, जो इस देश के नेता दुनिया को दिखाना चाहता है. भविष्य की ओर बढ़ता हुआ, नई टेक्नॉलॉजी बनाता हुआ. जबकि उसका प्रतिद्वंद्वी मध्यपूर्व के युद्ध में फंसा हुआ है.
यहां एआई चश्मे हैं जो भाषाओं का अनुवाद करने का दावा करते हैं.
पहाड़ चढ़ने में मदद करने वाले रोबोटिक पैर हैं और रोजमर्रा के कई गैजेट्स भी हैं.
लेकिन व्यापारी कहते हैं कि इन सबकी कीमत बढ़ रही है क्योंकि इनमें प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, जो तेल से बनता है.
फिर भी ख़रीदार आ रहे हैं क्योंकि क़ारोबार चलाना जरूरी है.

ईंधन संकट के बीच एक सेक्टर में चीन की बढ़त और साफ़ दिख रही है. वो सेक्टर है इलेक्ट्रिक वाहनों का.
सिर्फ़ मार्च में चीन ने साढ़े तीन लाख इलेक्ट्रिक वाहन निर्यात किए, जो फरवरी से 30 फ़ीसदी और पिछले साल मार्च से 140 फ़ीसदी ज्यादा हैं.
मध्यपूर्व चीन के इलेक्ट्रिक वाहन का बड़ा बाज़ार है, लेकिन युद्ध के कारण अब वहां सप्लाई करना मुश्किल हो गया है.
व्यापारी जॉयस लियू कहती हैं, “पिछले साल हमारे 90 फ़ीसदी वाहन मध्यपूर्व गए थे, लेकिन इस साल युद्ध के कारण क़ारोबार लगभग बंद हो गया है. कुछ गाड़ियां अभी भी चीनी बंदरगाहों पर फंसी हैं.”
अब वो अफ़्रीका और दक्षिण अमेरिका में नए ख़रीदार ढूंढ रही हैं.
हालांकि ओमान का एक प्रतिनिधिमंडल अब भी कारों का निरीक्षण कर रहा है और सौदेबाजी कर रहा है.
एक प्रतिनिधि कहता है, “हम चीनी कंपनियों के साथ सहयोग करना चाहते हैं. अभी मुश्किल है, लेकिन इंशाअल्लाह युद्ध खत्म होगा और कारोबार फिर अच्छा होगा.”
फ़िलहाल जीत की स्थिति नहीं

चीन भी यही चाहता है. लंदन स्थित थिंक टैंक चैटम हाउस की यू जीए कहती हैं कि यह युद्ध चीन की आत्मनिर्भर बनने की कोशिश को मजबूत करेगा. लेकिन फिलहाल चीन जीत की स्थिति में नहीं है.
फिर भी चीन एक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. वह ट्रंप को नाराज भी नहीं करना चाहता.
चीन युद्धविराम की अपील कर रहा है और ईरान को बातचीत के लिए प्रेरित कर रहा है.
साथ ही, वह खाड़ी देशों के नेताओं से भी संपर्क बनाए हुए है.
यह चीन की कूटनीतिक ताक़त दिखाने की कोशिश है. दुनिया को यह बताने के लिए कि वह अब ग्लोबल पावर सेंटर बनता जा रहा है.
लेकिन फोशान के मजदूरों के लिए इन बातों का कोई ख़ास मतलब नहीं है.
एक मजदूर अपना कैंटन फेयर का पास दिखाता है और हंसते हुए कहता है, “मैंने वहां टॉयलेट साफ किए.”
उसे 14 घंटे के काम के लिए 150 युआन (करीब 20 डॉलर) मिले.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित