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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
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पढ़ने का समय: 7 मिनट
पटना के राजू साह सब्ज़ी बेचते हैं. राजू साह हफ़्ते में सोमवार और गुरुवार के दिन ‘हज़रत साहब’ के दरबार में अगरबत्ती जलाने जाते हैं.
बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच (पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल) में हज़रत साहब के मज़ार पर खड़े राजू के हाथ दुआ के लिए उठे हैं और रुमाल से ढँके हुए सिर के नीचे होंठ हिल रहे हैं.
क्या करने यहाँ आते हैं? मेरे यह पूछने पर वो आहिस्ता से कहते हैं, “बहुत फ़ायदा हुआ है हज़रत साहब से. इन्हीं की दुआ से सारा काम चलता है. परिवार में दिक़्क़त नहीं आती. यहाँ आने से बहुत आराम मिलता है.”
राजू साह जिन हज़रत साहब के मज़ार पर सालों से आ रहे हैं, वह ईरान के एक शहज़ादे मिर्ज़ा मुराद शाह की मज़ार है.
यह मज़ार पटना के अशोक राजपथ स्थित पीएमसीएच के टाटा वार्ड के पास है. कई स्थानीय लोग मिर्ज़ा मुराद शाह को किसी सूफ़ी संत की तरह पूजते हैं.
आज यह बात आश्चर्यजनक लगती है कि ईरान के शहज़ादे मिर्ज़ा मुराद आख़िर पटना में क्या कर रहे थे और उन्होंने अपने आख़िरी वक़्त के लिए गंगा किनारे बसे इस शहर पटना को ही क्यों चुना?
ईरानी शहज़ादे मुराद और पटना कनेक्शन
मुग़ल शासक जहाँगीर (1605-27) और शाहजहाँ (1627-58) के समय बिहार शासकीय लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण सूबा था.
इतिहासकार सैयद हसन असकरी और क़यामुद्दीन अहमद अपनी किताब ‘कंप्रिहैंसिव हिस्ट्री ऑफ़ बिहार– पार्ट टू’ में लिखते हैं, “उस वक़्त सूबे (बिहार) में प्रतिष्ठित सूबेदार और मनसबदारों की नियुक्ति की गई थी. कई शहज़ादों को बिहार का सूबेदार बनाया गया था और इस काल में सूबे की भौगोलिक सीमा का विस्तार भी हुआ था.”
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जहाँगीर के शासन काल में अंतिम गर्वनर मिर्ज़ा रुस्तम सफ़वी (1626-27) थे, जिनका उपनाम मसूद फ़िदाई भी था.
मिर्ज़ा रुस्तम सफ़वी, ईरान के सफ़वी वंश से ताल्लुक़ रखते थे और यह फ़ारस (आज का ईरान) के राजा शाह इस्माइल के पड़पोते थे.
इन्हीं रुस्तम सफ़वी के सबसे बड़े बेटे थे मिर्ज़ा मुराद, जिनकी मज़ार पटना के पीएमसीएच में है.
मिर्ज़ा मुराद शाहजहाँ और जहाँगीर दोनों के ही दरबार में रहे.
एशियाटिक सोसाइटी से प्रकाशित किताब ‘द मआसिर- उल-उमारा’ में मिर्ज़ा मुराद का ज़िक्र करते हुए लिखा गया है, “मिर्ज़ा मुराद की शादी अब्दुर रहीम खान-ए-खाना की बेटी से हुई थी. जहाँगीर ने उन्हें इल्तिफ़ात ख़ान के टाइटल से नवाज़ा था. उन्हें 2000 रैंक और 800 घोड़े मिले थे. शाहजहाँ के दरबार से उन्होंने 16वें साल में इस्तीफ़ा दे दिया था, जहाँ से उन्हें 40,000 रुपए की सालाना पेंशन मिलनी तय हुई थी. इसके बाद वह पटना में शांति से अपना जीवन गुज़र बसर करने लगे.”
पीएमसीएच, मुरादपुर और मुराद शाह
मुराद शाह ने पटना में रहते हुए गंगा किनारे अपनी हवेली बनाई. उन्होनें एक बाग़ीचा और एक मार्केट भी बनवाया.
हवेली को मुराद कोठी, मुराद बाग़ (आज का सब्ज़ीबाग उसका हिस्सा था) और मार्केट को मुरादपुर कहा गया, जिसके नाम से एक मोहल्ला भी बसा.
बिहार सरकार की ओर से निकाली गई कॉफ़ी टेबुल बुक ‘पटना’ में पीएमसीएच बिल्डिंग की स्थापना में मिर्ज़ा मुराद शाह का ज़िक्र मिलता है.
इसके मुताबिक़, “1857 के युद्ध के बाद बंगाल सरकार ने पटना में एक स्वास्थ्य संस्थान खोलने का फ़ैसला किया, ताकि कलकत्ता मेडिकल स्कूल पर बोझ कम हो सके.1874 में बाँकीपुर डिस्पेंसरी खुली जो बाद में टेंपल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन कहलाई. (यहीं बाद में पीएमसीएच बना). बाँकीपुर डिस्पेंसरी पहले उस जगह खुली थी, जहाँ वर्तमान में बीएन कॉलेज (पटना यूनिवर्सिटी का एक कॉलेज) के हॉस्टल हैं. साल 1875 में जगह की कमी के चलते यह 16वीं सदी के संत शाह मुराद जो गर्वनर रुस्तम सफ़वी के बेटे थे, उनकी मुराद कोठी में शिफ़्ट कर दिया गया.”
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कॉफ़ी टेबुल बुक में लिखा है कि 18वीं सदी की शुरूआत में यह कोठी अंग्रेज़ों के अधिकार में थी लेकिन बाद में यह निजी हाथ में चली गई.
इसके चलते सरकार को टेंपल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के लिए जुलाई 1875 में 28,000 रुपए में यह ज़मीन ख़रीदनी पड़ी.
बाद में 1903 में इसी परिसर में एक लाख रुपए की लागत से जनरल हॉस्पिटल ऑफ़ बाँकीपुर खोला गया.
बिहार के बंगाल से अलग होने के बाद 1927 में मेडिकल कॉलेज औपचारिक रूप से बना, जो पीएमसीएच कहलाता है.
पीएमसीएच का एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक जिस जगह आज है, वहीं मुराद कोठी हुआ करती थी.
इसी तरह ओ मैली के ‘बिहार एंड उड़ीसा गजेटियर- पटना’ में मुराद बाग़ का उल्लेख है.
गजेटियर में लिखा, “रेवेन्यू कांउसिल के सेकेंड ऑफ़िसर का यह आवास हुआ करता था. साल 1771-75 तक यह फ़ैक्टरी चीफ़ का आवास रहा. 1777 में ईवान ला नाम का आधिकारी यहाँ भारत छोड़ने तक रहा. मिसेज हेस्टिंग्स यहाँ 1781 तक रहीं. लेकिन बाद में यह ख़ाली रहने लगा और टेंपल मेडिकल स्कूल के लिए अधिगृहित किया गया.”
इतिहासकार एसएच अस्करी की किताब मेडिवल बिहार, सल्तनत एंड मुग़ल पीरियड के फ़ुटनोट में लिखा है कि 1776 में इस घर की क़ीमत 15 हज़ार रुपए थी.
चार जनवरी 1790 को इस घर और कंपाउंड की गवर्नर जनरल के आदेशानुसार नीलामी हुई.
सफ़वी और मुग़ल वंश- मध्यकाल में इस्लामिक वर्ल्ड की कहानी
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पटना स्थित 1891 में स्थापित ख़ुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के निदेशक और प्रसिद्ध इतिहासकार इम्तियाज अहमद ने बीबीसी से कहा, “मध्यकाल में सफ़वी वंश का शासन था और यह मुग़लों के समकालीन थे. बाबर के ज़माने से ही इनका संबंध मुग़लों से था लेकिन ज़्यादा नज़दीकी हुमायूँ के वक़्त में बढ़ी, जब हुमायूँ शेरशाह से हार गया. हारने के बाद हुमायूँ ईरान चला गया और सफ़वी राजा शाह ताहमस्प की शरण ली.”
मध्यकाल में इस्लामिक वर्ल्ड में चार ताक़तें थी.
इम्तियाज़ अहमद बताते हैं, “ऑटोमन तुर्क, भारत में मुग़ल, सेंट्रल एशिया में उज़बेक और ईरान में सफ़वी वंश. सफ़वी शिया थे जबकि बाक़ी सभी सुन्नी. बाबर के भारत आने की वजह उज़बेक थे क्योंकि दोनों में लड़ाई चलती रहती थी. उज़बेक साम्राज्य के दबाव के चलते ही बाबर को सेंट्रल एशिया छोड़कर भारत आना पड़ा. लोग कहते हैं कि शाह ताहमस्प ने हुमायूँ के सामने शर्त रखी थी कि वह शिया बन जाएँ. साथ ही शाह ताहमस्प ने कंधार वापस करने भी शर्त रखी थी.”
दरअसल कंधार सफ़वी साम्राज्य का हिस्सा था लेकिन उसे बाबर ने जीत लिया था. हुमायूं के सामने शाह ताहमस्प ने यह शर्त रखी लेकिन हुमायूं की भारत लौटने के कुछ समय बाद ही मृत्यु हो गई. इसके बाद कंधार को लेकर मुगल शासकों और सफ़वी राजाओं के बीच कई बार युध्द हुआ. जिसके बाद अंतत: कंधार सफ़वी साम्राज्य का हिस्सा बना.
नौज़र कटरा भी है पटना सिटी में
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मिर्ज़ा मुराद शाह जो सफ़वी वंश के थे आख़िर वह भारत कैसे आए?
इस सवाल के जवाब में पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले अविनाश कुमार झा बताते हैं, “मुग़ल साम्राज्य बहुत समृद्ध था और अकबर के शासनकाल में ईरान के बहुत सारे लोग भारत आकर बसे. औरंगज़ेब की पत्नी दिलराज बानो भी सफ़वी वंश की थी और मिर्ज़ा मुराद शाह के रिश्ते में आती थी.”
मिर्ज़ा मुराद शाह के चाचा मिर्ज़ा मुज़फ़्फ़र थे. मिर्ज़ा मुज़फ़्फ़र के बेटे का नाम मिर्ज़ा नौज़र था. इतिहासकार एस एच असकरी की किताब मेडिवल बिहार – सल्तनत एंड मुगल पीरियड के फुटनोट में लिखा है, “पुराने पटना (पटना सिटी) में नौज़र कटरा नाम का मोहल्ला मिर्ज़ा नौज़र के नाम पर ही है. मिर्ज़ा नौज़र बहराइच में पोस्टेड थे लेकिन बीमारी के चलते वह अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पा रहे थे जिसके चलते उन्हें अपने भाई मिर्ज़ा मुराद के पास भेज दिया गया. मिर्ज़ा नौज़र को सालाना 30,000 रुपए की पेंशन मिलती थी.”
नौज़र कटरा में भी हज़रत नौज़र ग़ाज़ी साह नाम से एक मज़ार है.
इतिहासकार इम्तियाज अहमद बताते हैं कि यह मिर्ज़ा नौज़र की ही मज़ार है.
मज़ार के ठीक बग़ल में रहने वाली सुमित्रा देवी बताती हैं, “यहाँ कभी-कभी पूजा होती है. ज़्यादातर यह बंद रहती है. लेकिन हम लोग यहाँ त्यौहार के मौक़े पर अगरबत्ती जला देते हैं.”
‘युद्ध से किसी का भला नहीं होता’
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सैय्यद मोहम्मद शमीम अख़्तर, इस वक़्त मिर्ज़ा मुराद शाह की मज़ार के मुतवल्ली हैं.
उनके पिता रज़ा करीम भी इसी मज़ार के मुतवल्ली थे.
शमीम अख़्तर कहते हैं, “मेरे वालिद बताते थे कि यह एक खुली हुई क़ब्र थी. जीएन वर्मा नाम के एक ठेकेदार ने ही यह मज़ार बनवाई. आज भी इस मज़ार पर मुसलमान से ज़्यादा हिंदू आते हैं.”
मिर्ज़ा मुराद शाह शिया थे, लेकिन यह मज़ार बिहार सुन्नी वक़्फ बोर्ड के अधीन है.
ईरान युद्ध पर सवाल पूछने पर शमीम अख़्तर कहते हैं, “हमारे बाबा (मिर्ज़ा मुराद) अमन चैन की बात करते थे. वह फ़कीर थे और लोगों का भला करते थे. हम लोग भी अमन चैन की चाहत रखने वाले लोग है. युद्ध से भला किसी का भला हुआ है हुकूमत के सिवा?”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.