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राहुल रंजन और विनोद श्रीधरन भारत के दो अलग-अलग छोर से आते हैं. लेकिन जब अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच जंग शुरू हुई तो दोनों को अपनी नौकरी की चिंता सताने लगी.
बिहार के रहने वाले रंजन उस अफ़रातफ़री का हिस्सा थे जो सऊदी अरब की राजधानी रियाद में अमेरिकी दूतावास पर ईरानी ड्रोन के हमले के बाद फैली थी.
यह दूतावास उनकी इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) कार कंपनी के दफ़्तर के पास ही है. रंजन इस कंपनी में रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंजीनियर के तौर पर काम करते हैं.
उधर श्रीधरन को कोच्चि से रियाद जाने वाली फ़्लाइट के रद्द होने का परेशान करने वाला अनुभव हुआ. इस फ़्लाइट के कैंसिल होने के बाद आगे और भी मुश्किलें सामने आईं.
चार दिन बाद श्रीधरन का वीज़ा ख़त्म हो रहा था. हालांकि रिफ़ाइनरी प्रोजेक्ट्स का काम करने वाली उनकी कंपनी ने उनके वीज़ा का मामला सुलझा लिया.
राहुल रंजन और श्रीधरन ने अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए घुमावदार रास्ते अपनाए. श्रीधरन ने कोझिकोड से फ़्लाइट ली, रियाद पहुंचे और फिर ट्रेन से दम्माम जाकर अपनी नौकरी दोबारा शुरू की.
रंजन ने रियाद से लखनऊ, फिर दिल्ली और फिर सिलीगुड़ी (जहां उनकी पत्नी काम करती हैं) होते हुए घर पहुंचने के लिए लंबा रास्ता लिया.
यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि श्रीधरन की तरह ही रंजन के दफ़्तर ने आर एंड डी स्टाफ़ को वर्क फ़्रॉम होम की अनुमति दे दी.
राहुल रंजन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “फ़िलहाल नौकरी सुरक्षित है. लेकिन अगर यह जंग जारी रहती है, तो कुछ कहा नहीं जा सकता. ज़्यादातर भारतीय, एयरपोर्ट पहुंचकर भारत लौट आए हैं. जो वहां बचे हैं, वे सिर्फ़ हाउसकीपिंग स्टाफ़ हैं. और ये सभी भारतीय हैं.”
राहुल रंजन ने बताया कि कंपनी में काम करने वाले 1500 लोगों में से एक तिहाई भारत से हैं. बाकी अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों के हैं. कंपनी साल के अंत तक एक ईवी कार लॉन्च करने की योजना बना रही थी.
कंदाकुरी परिवार की मुश्किल
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राहुल रंजन और श्रीधरन की यात्रा मुश्किल लग सकती है. लेकिन इसके मुक़ाबले बहरीन में रह रहे 25 साल के कंदाकुरी रंजीत की स्थिति ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि वहां ईरान ने ज़ोरदार हमले किए हैं.
तेलंगाना के निर्मल (पहले अदीलाबाद) में 26 फ़रवरी से कंदाकुरी रंजीत का परिवार इंतज़ार में है. यह तारीख़ अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमले से दो दिन पहले की है. रंजीत अपने पिता कंदाकुरी राजेश्वर के शव को घर लाना चाहते हैं.
रंजीत ने बहरीन से बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “दूतावास के कर्मचारी कह रहे हैं कि हालात ठीक नहीं हैं और हमें यहीं अंतिम संस्कार कर देना चाहिए, लेकिन हम निर्मल में अपने घर पर सभी रस्में करना चाहते हैं.”
उन्होंने कहा, “यहां बमबारी भी नहीं हो रही है. फ़िलहाल स्थिति सामान्य है.”
63 साल के राजेश्वर की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई. वह क़रीब दस साल तक बहरीन में निर्माण क्षेत्र में काम करते थे. वह अपने बेटे से 10-15 किलोमीटर दूर रहते थे. रंजीत एक स्थानीय कंपनी में वेयरहाउस स्टोरकीपर हैं.
तेलंगाना सरकार की एनआरआई सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष मंधा भीम रेड्डी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “तेलंगाना सरकार ने विदेश मंत्रालय और बहरीन में भारतीय दूतावास को राजेश्वर के शव को जल्दी भारत लाने के लिए पत्र लिखा है. लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.”
जंग से भारतीयों में बढ़ी चिंता
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सेंटर फ़ॉर इंडियन माइग्रेंट स्टडीज़ के रफ़ीक रवुथर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “पूरे इलाक़े में तनाव के कारण भारतीय कामगारों में अनिश्चितता और डर बढ़ रहा है. कई लोग अपनी सुरक्षा और नौकरी को लेकर चिंतित हैं. आगे क्या होगा, इसे लेकर मानसिक तनाव बना हुआ है.”
मध्य पूर्व में काम कर रहे भारतीयों और भारत में उनके परिवारों की स्थिति केरल के नॉन रेजिडेंट केरलाइट अफ़ेयर्स यानी एनओआरकेए (नोरका) विभाग के आंकड़ों में भी दिखती है.
जंग शुरू होने के बाद केरल के इस विभाग को करीब 1000 शिकायतें मिली हैं. इन शिकायतों में खाड़ी के देशों में रह रहे भारतीयों और केरल में उनके परिवारों की चिंताएं साफ़ झलकती हैं.
आंकड़ों के अनुसार, ज़्यादातर शिकायतें फ़्लाइटों की कमी से जुड़ी हैं. 16 फ़ीसदी लोगों ने इसी बारे में पत्र लिखे हैं. सामान्य जानकारी और पूछताछ के मामले 16.2 प्रतिशत हैं. फंसे हुए लोगों के बारे में 12 प्रतिशत शिकायतें हैं. 10.9 प्रतिशत लोगों ने अपनी शिकायतों में सुरक्षा और घबराहट की स्थिति का जिक्र किया है.
करीब 9.9 प्रतिशत लोग वापस देश लौटना चाहते हैं और 8.9 प्रतिशत लोगों ने आर्थिक मुश्किलों का ज़िक्र किया है.
वीज़ा और क़ानूनी मुद्दों के बारे में 8 प्रतिशत लोगों ने शिकायतें की हैं. रहने और खाने की समस्या का ज़िक्र 7.9 प्रतिशत लोगों ने किया है. फ़्लाइट टिकट के बढ़े दामों के बारे में 7.4 प्रतिशत लोगों ने लिखा है.
और मेडिकल आपात स्थिति में मदद की गुहार 2.9 प्रतिशत लोगों ने लगाई है.
नोरका के विश्लेषण के मुताबिक़, 65.8 प्रतिशत लोग खाड़ी में काम कर रहे अपने परिजनों के बारे में चिंतित हैं.
नोरका के सीईओ अजीत कोलासेरी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “ये सभी लगातार बने गतिरोध के कारण बढ़ती चिंता और परेशानी के संकेत हैं. प्रवासी समुदाय से हमें पता चला है कि होस्पिटैलिटी सेक्टर पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है. इससे जुड़ी टैक्सी सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं. नौकरियां जाने की ख़बरें हैं, लेकिन पुख़्ता आंकड़े अभी नहीं मिले हैं.”
असर का पूरा आकलन बाकी

अजीत मानते हैं कि मिसाइल और ड्रोन का युद्ध अब पूरी तरह आर्थिक युद्ध बन चुका है. उनका कहना है, “इसका असर वैश्विक स्तर तक पहुंच गया है और अब यह हमारे घरों तक आ गया है, जहां रसोई गैस और ईंधन की कमी हो रही है.”
तिरुवनंतपुरम के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट के प्रोफ़ेसर इरुदया राजन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि विदेश से भारत आने वाली रक़म (रेमिटेंस) में कमी आना तय है.
उन्होंने बताया, “लोग वापस भारत लौटेंगे. कुछ लोग उन देशों में दोबारा नहीं जा पाएंगे. 2008 और कोविड के दौरान 2019 में भी ऐसा ही हुआ था.”
प्रोफ़ेसर राजन ने वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि भारत को हर साल 150 अरब डॉलर की रक़म प्रवासियों से मिलती है. करीब एक करोड़ भारतीय मध्य पूर्व में काम करते हैं और ये कुल रक़म का आधा हिस्सा भेजते हैं.
उन्होंने कहा, “आर्थिक असर का आकलन करना मुश्किल है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध कितने समय तक चलता है. लेकिन इतना तय है कि इसका असर सभी पर पड़ेगा,”
उन्होंने यह भी कहा कि “अगर अगले एक महीने में युद्ध ख़त्म हो जाता है, तो पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से माइग्रेशन बढ़ सकता है.”
कोच्चि के सेंटर फ़ॉर माइग्रेशन एंड इन्क्लूसिव डेवलपमेंट के कार्यकारी निदेशक बेनोय पीटर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि भारत में ज़मीनी असर कई कारणों से दिख रहा है.
बेनोय पीटर ने बताया, “रमज़ान से पहले बड़ी संख्या में प्रवासी भारत आते हैं और ख़रीदारी होती है. लेकिन इस बार युद्ध ऐसे समय आया है जब प्रवासी कामगार पहले ही अपने काम के पैटर्न में कई रुकावटों का सामना कर चुके हैं.”
उन्होंने कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न, पश्चिम बंगाल और असम चुनाव के कारण भी कामगार अपने राज्यों में लौटे थे.
माइग्रेशन गवर्नेंस की शोधकर्ता पार्वती देवी ने कहा, “अभी कई कामगार नौकरी को लेकर असुरक्षा के कारण केरल वापस नहीं लौट रहे हैं. छात्र भी परीक्षा देने नहीं आ रहे हैं.”
दुबई में असर कम

इन हालात के बीच मोहम्मद असलम ख़ान और उनकी पत्नी बुधवार को दुबई से लखनऊ आए, जबकि उनके बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई के लिए वहीं रुके हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “वहां स्थिति इतनी ख़राब नहीं है. यहां जो घबराहट दिखाई जाती है, वैसी ज़नी स्तर पर नहीं है.”
असलम खान निर्माण से जुड़ी कंपनी चलाते हैं, जिसमें करीब 500 कर्मचारी हैं. इनमें ज्यादातर भारत, बांग्लादेश और नेपाल से हैं.
असलम ख़ान बताते हैं, “पिछले हफ़्ते क़रीब 1800 ड्रोन और मिसाइलें दागी गईं. कोई हताहत नहीं हुआ. ईरान पहले से हमले की घोषणा कर देता है. मेरा एक दफ़्तर बुर्ज ख़लीफ़ा के पास है, जहां 20-25 कर्मचारी काम करते हैं. सभी सुरक्षित हैं.”
उन्होंने बताया कि मंगलवार को एक बड़ी रियल एस्टेट कंपनी ने 700 विला का प्रोजेक्ट लॉन्च किया, “लोगों को लगा कि युद्ध के कारण घरों की क़ीमतें कम होंगी, लेकिन कंपनी ने पुराने रेट पर ही बिक्री शुरू कर दी है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.