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अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमले के बाद मध्यपूर्व के हालात तेज़ी से बदल रहे हैं और इस संघर्ष की आग अब खाड़ी देशों तक पहुंच चुकी है.
बुधवार को ईरान ने अपने गैस फ़ील्ड पर हमलों के बाद खाड़ी देशों के तेल और गैस ठिकानों पर हमलों की चेतावनी दी और देर शाम मिसाइल हमले कर दिए.
दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी उत्पादन फ़ील्ड साउथ पार्स धुएं के काले बादलों से ढक गया.
क़तर की सरकारी तेल कंपनी के मुताबिक़ ईरान के मिसाइल हमले में तेल प्रोसेसिंग यूनिट रास लाफ़ान में भारी नुक़सान हुआ.
वहीं सऊदी अरब ने राजधानी रियाद के ऊपर चार बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने का दावा किया.
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़, ईरान ने सऊदी की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको के ठिकानों को भी निशाना बनाया है.
संयुक्त अरब अमीरात पर भी ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए.
ये युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है खाड़ी देशों के लिए स्थिति जटिल होती जा रही है.
एनर्जी मार्केट पर असर
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28 फ़रवरी को अमेरिकी हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई तेज़ कर दी.
इन हमलों में इसराइल और अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ-साथ खाड़ी देशों के ऊर्जा और रणनीतिक ढांचे को भी निशाना बनाया गया है.
जब फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां बढ़ रहीं थीं और मध्य पूर्व में युद्ध के बादल छा रहे थे, खाड़ी देशों के नेता सैन्य संघर्ष शुरू होने से रोकने के लिए हर संभव कूटनीतिक कोशिश कर रहे थे.
लेकिन अब ये देश ख़ुद इस युद्ध की चपेट में आ गए हैं.
गंभीर हो रहे इस युद्ध ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और क़तर के सामने चुनौतीपूर्ण हालात पैदा कर दिए हैं.
इसका असर कच्चे तेल के दामों पर भी हुआ. बुधवार को कच्चे तेल के दाम पांच प्रतिशत तक बढ़ गए. युद्ध से पहले कच्चे तेल के दाम 60 डॉलर प्रति बैरल के क़रीब थे जो अब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं.
फ़ारस की खाड़ी के एक तरफ़ ईरान है और दूसरी तरफ़ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और क़तर. अब ये सारे देश ख़ुद को इस जंग में बुरी तरह फंसा हुआ पा रहे हैं.
विश्लेषकों के मुताबिक़, तेल और गैस संसाधनों में समृद्ध इन देशों के पास अब विकल्प बहुत सीमित हैं.
ईरान के आक्रामक हमले
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रिपोर्टों के मुताबिक़, ईरान ने अब तक दो हज़ार से अधिक मिसाइल और ड्रोन इन देशों पर दागे हैं. सबसे आक्रामक हमले संयुक्त अरब अमीरात के ख़िलाफ़ हुए हैं.
ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात स्थित अमेरिका के अल ज़फ़रा सैन्य अड्डे, क़तर स्थित अल उबैद एयरबेस और कुवैत स्थित कैम्प बुएहरिंग पर मिसाइल हमले किए हैं. इसके अलावा बहरीन स्थित अमेरिकी सेंटकॉम (सेंट्रल कमांड) के ठिकानों को भी निशाना बनाया है.
दुबई एयरपोर्ट भी हमलों से प्रभावित है. संयुक्त अरब अमीरात के शाह गैस फ़ील्ड पर भी हमले हुए हैं और फुजैराह बंदरगाह को भी निशाना बनाया गया है.
संयुक्त अरब अमीरात के पूर्वी तट पर स्थित फुजैराह बंदरगाह स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से बाहर है और इसे खाड़ी के तेल के लिए एक रणनीतिक रूप से अहम वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखा जाता है.
दरअसल, अमेरिका-इसराइल के हमले के बाद ईरान ने खाड़ी देशों के ठिकानों पर आक्रामक हमले करके ऊर्जा संकट पैदा करने की कोशिश की है.
भले ही इसके जवाब में इन देशों ने ईरान पर अभी तक आक्रामक कार्रवाई ना की हो लेकिन ये सवाल उठ रहा है कि ये देश कब तक ख़ामोश रहेंगे और क्या ये किसी सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल हो सकते हैं?
अनचाहा शिकार?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और अमेरिका की डेलेवेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, “ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका-इसराइल की जंग का सबसे बड़ा अनचाहा शिकार खाड़ी देश बन गए हैं. तेल महंगा हुआ है, लेकिन फ़ायदा उन्हें नहीं, बल्कि रूस और अमेरिका जैसे दूसरे उत्पादकों को हो रहा है.”
दरअसल, इस युद्ध ने जहां खाड़ी देशों के तेल निर्यात को सीधा प्रभावित किया है वहीं रूस का तेल निर्यात बढ़ रहा है.
अमेरिका ने भारत को भी एक महीने के लिए रूस से कच्चा तेल ख़रीदने की छूट दी है.
ईरान ने अपने नेतृत्व और सैन्य ठिकानों पर हमलों के बाद स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को पूरी तरह बंद करने की चेतावनी दी है. ईरान के कड़े रवैये की वजह से यहां यातायात कम हुआ है और इससे वैश्विक तेल व्यापार प्रभावित हुआ है.
विश्लेषकों के मुताबिक़, ईरान की पूरी कोशिश है कि इस युद्ध को अमेरिका-इसराइल और खाड़ी देशों के लिए इतना ख़र्चीला कर दिया जाए कि उन्हें ये युद्ध जारी रखना मुश्किल लगने लगे.
मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, ” स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर ईरान की पकड़ ने पूरी दुनिया की तेल सप्लाई को अस्थिर कर दिया है, और इसका सीधा असर खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है.”
विश्लेषक इसे खाड़ी देशों के लिए एक ऐसा अनचाहा युद्ध मानते हैं जिसमें वो घिर तो गए हैं लेकिन इससे बाहर निकलने का कोई साफ़ रास्ता नहीं है.

सुरक्षा मामलों के जानकार प्रवीण साहनी कहते हैं, “खाड़ी देश एक ऐसे ‘क्वैगमायर’ में फंस गए हैं, जिसमें वे न तो खुलकर अमेरिका-इसराइल के साथ खड़े हो सकते हैं और न ही ईरान के ख़िलाफ़ जा सकते हैं.”
हालांकि, प्रवीण साहनी ईरान के मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले या ऊर्जा ठिकानों पर आक्रामक कार्रवाई से हैरान नहीं है.
साहनी कहते हैं, “ईरान ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अगर उस पर हमला होगा तो वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा, और वही अब हो रहा है.”
वहीं मध्य पूर्व मामलों के जानकार और इंडियन काउंसिल ऑन वर्ल्ड अफ़ेयर के सीनियर फेलो फ़ज़्ज़ुर्रहमान मानते हैं कि खाड़ी देशों के मौजूदा हालात की वजह उनकी कमज़ोर सैन्य क्षमता है.
फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “खाड़ी देशों के पास न सैन्य क्षमता है, न राजनीतिक इच्छाशक्ति, इसलिए वे इस युद्ध में फंसे हुए हैं लेकिन कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा पा रहे.”
भारी सैन्य ख़र्च लेकिन मज़बूत सुरक्षा ढांचा नहीं

पिछले तीन दशकों में खाड़ी देशों ने अपनी तेल से अर्जित दौलत को सुरक्षा और सैन्य क्षमता विकसित करने पर बेहिसाब ख़र्च किया है.
अलग-अलग स्रोतों पर उपलब्ध भरोसेमंद आंकड़ों के मुताबिक़ सऊदी अरब, क़तर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और कुवैत ने 1990 के दशक के मध्य से अब तक 2 से 3 ट्रिलियन डॉलर हथियारों और सुरक्षा पर ख़र्च किए हैं.
अकेले सऊदी अरब हर साल 70–80 अरब डॉलर के आसपास सैन्य बजट रखता है, जबकि यूएई 20–25 अरब डॉलर और क़तर करीब 15 अरब डॉलर सालाना खर्च करता रहा है.
यह ख़र्च कितना असाधारण है इसे इससे समझा जा सकता है कि नेटो देश अपने जीडीपी का करीब 2 फ़ीसदी रक्षा पर ख़र्च करते हैं.
इस भारी निवेश का बड़ा हिस्सा उन्नत हथियारों, लड़ाकू विमानों, मिसाइल रक्षा प्रणालियों और अमेरिकी सुरक्षा ढांचे पर ख़र्च हुआ है. लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने ट्रिलियन डॉलर के इस सुरक्षा मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “सबसे बड़ा सवाल यह है कि आपके ख़रबों डॉलर के डिफेंस प्रोक्योरमेंट (रक्षा ख़रीद) का क्या हुआ? आप ईरान की साधारण मिसाइलों और ड्रोनों तक को रोकने में नाकाम हैं और आपकी पूरी अर्थव्यवस्था ठप है.”
सुरक्षा की गारंटी बनी ख़तरा?

खाड़ी देशों की सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि अमेरिका के जिन सैन्य अड्डों को उन्होंने अपनी सुरक्षा की गारंटी समझा था वही अब उनके लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गए हैं.
विश्लेषकों के मुताबिक़, खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा अमेरिकी सैन्य अड्डों के भरोसे छोड़ दी थी और वे पूरी तरह इन पर निर्भर हो गए थे.
प्रवीण साहनी कहते हैं, “अरब देशों की सुरक्षा पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर है, लेकिन यही निर्भरता अब उनके लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गई है.”
मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, “खाड़ी देशों ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपनी सुरक्षा की गारंटी समझा था, लेकिन अब वही बेस उन्हें ईरान के हमलों का निशाना बना रहे हैं.”
विश्लेषक मानते हैं कि खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा अमेरिका को आउटसोर्स की थी और उन्हें भरोसा था कि अमेरिका पूरी ताक़त से उनकी सुरक्षा करेगा. यह भरोसा अब टूट रहा है.
फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, “खाड़ी देशों ने दशकों से अपनी सुरक्षा ‘आउटसोर्स’ कर दी थी, लेकिन यह मॉडल अब पूरी तरह फेल होता दिख रहा है. ईरान पहली बार सीधे इस बड़े पैमाने पर खाड़ी क्षेत्र को निशाना बनाकर यह संदेश दे रहा है कि अमेरिकी सुरक्षा ढांचा भरोसेमंद नहीं है.”
यही नहीं, खाड़ी देशों को अपने महंगे इंटसेप्टर अमेरिकी सैन्य अड्डों की सुरक्षा पर ख़र्च करने पड़ रहे हैं.
फ़ज़्जुर्रहमान कहते हैं, “स्थिति यह है कि अमेरिका के खाड़ी देशों को सुरक्षा देने की बजाय अब ये देश अमेरिकी ठिकानों की सुरक्षा करने को मजबूर हो रहे हैं. रिश्ता पूरी तरह उलट गया है.”
अमेरिका-इसराइल के ईरान पर कुछ घंटों के भीतर ही ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना दिया था. विश्लेषक इससे हैरान नहीं है.
प्रवीण साहनी कहते हैं, “ईरान ने पहले ही साफ कर दिया था कि अगर उस पर हमला होगा तो वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा, और वही अब हो रहा है.”
प्रवीण साहनी मानते हैं कि ईरान इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार था और अब वह खाड़ी देशों को निशाना बनाकर ना सिर्फ़ अमेरिकी सुरक्षा गांरटी को तोड़ रहा है बल्कि भारी आर्थिक नुक़सान भी पहुंचा रहा है.
मध्य पूर्व, ख़ासकर संयुक्त अरब अमीरात अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का बड़ा केंद्र हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि हवाई अड्डों पर हमलों और प्रभावित हुए यातायात ने मध्य पूर्व के आलीशान शहरों के भरोसों को तोड़ा है और भविष्य पर सवाल उठा दिए हैं.
मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, “युद्ध ने सिर्फ़ तेल उत्पादन नहीं, बल्कि खाड़ी देशों की ‘सुरक्षित और स्थिर’ छवि को भी तोड़ दिया है. निवेश, पर्यटन और रियल एस्टेट सब प्रभावित हो रहे हैं. ये स्थिति पेट्रो डॉलर पर निर्भर इन देशों के लिए बहुत जटिल होने वाली है.”
ये हालात खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर फिर से सोचने को मजबूर कर सकते हैं.
फ़ज़्जुर्रहमान कहते हैं, “यह युद्ध खाड़ी देशों को मजबूर कर रहा है कि वे अपनी पूरी सिक्योरिटी आर्किटेक्चर पर फिर से सोचें.”
वहीं प्रवीण साहनी मानते हैं कि मौजूदा युद्ध खाड़ी देशों के लिए एक बड़ा सबक होगा.
वो कहते हैं, “इस युद्ध के बाद खाड़ी देश सबसे बड़ा सबक यही सीखेंगे कि उनकी जमीन पर मौजूद अमेरिकी बेस उनकी सुरक्षा नहीं, बल्कि असुरक्षा की वजह हैं.”
आगे क्या?
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मौजूदा हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि खाड़ी देश आगे क्या करेंगे. युद्ध शुरू होने तक क़तर और ईरान के बीच दोस्ताना संबंध थे.
अब जो पार्स गैस फ़ील्ड आग की लपटों में घिरा है, क़तर और ईरान उसे साझा रूप से चला रहे थे और ये दुनिया का सबसे बड़ा गैस उत्पादन क्षेत्र क़तर की समृद्धि का प्रतीक भी था.
क़तर ने युद्ध शुरू होने से पहले तक इसे रोकने के प्रयास भी किए थे.
सऊदी अरब और ईरान के बीच चीन की मध्यस्थता में समझौता भी हुआ था. अब ये सब अधर में लटक गया है. खाड़ी देशों और ईरान के बीच जो भरोसा था, वह इस युद्ध से गर्त में चला गया है.
हालांकि, भारी हमले झेलने के बावजूद, अभी तक खाड़ी देश औपचारिक रूप से अमेरिका-इसराइल की आक्रामक कार्रवाइयों में शामिल नहीं हुए हैं.
इस वक़्त खाड़ी देश एक मुश्किल और नाज़ुक मोड़ पर खड़े नज़र आते हैं. एक ओर वे अमेरिका और इसराइल के साथ अपने संबंधों को बनाए रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ सीधे टकराव से भी बचना चाहते हैं.
प्रवीण साहनी कहते हैं, “अरब देश न अमेरिका-इसराइल की आलोचना करते हैं, न ईरान का खुला समर्थन, लेकिन इसकी क़ीमत अब उन्हें चुकानी पड़ रही है. आगे उनके लिए हालात और भी मुश्किल ही होते जाएंगे.”
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