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26 फ़रवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल का अपना दौरा ख़त्म करने के बाद भारत के लिए रवाना हुए. दो दिन बाद यानी 28 फ़रवरी को इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया.
इसराइल और अमेरिका के हमले के बाद ईरान ने उन खाड़ी देशों पर हमले हुए किए हैं, जहां अमेरिका के मिलिट्री बेस हैं.
इसराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जंग के शुरुआती दो दिनों में भारत ने दो बयान जारी किए. एक बयान में इस जंग पर चिंता जताई गई और बातचीत से मुद्दे को सुलझाने की अपील की गई.
पीएम मोदी ने एक अन्य बयान में संयुक्त अरब अमीरात पर ईरान के हमले की ‘कड़ी निंदा’ की और कहा कि भारत उसके साथ खड़ा है. लेकिन भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ इसराइल और अमेरिका के हमले की खुलकर निंदा नहीं की.
भारत के विदेश मंत्री और ईरान के विदेश मंत्री के बीच 12 मार्च को एक बार फिर बात हुई है लेकिन यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भारत ने गर्मजोशी दिखाने में देर कर दी.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की इस हमले में मौत के पांच दिन बाद भारत की ओर से उन्हें औपचारिक तौर पर श्रद्धांजलि दी गई. भारत सरकार के इस रुख़ की काफ़ी आलोचना हुई थी.
हालांकि विदेश मंत्रालय ने कहा कि शोक पुस्तिका पांच दिनों के बाद खुली थी. इसलिए पांच मार्च को ही विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए थे.
भारत की विदेश नीति की सबसे ज़्यादा आलोचना हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत डेना को अमेरिकी पनडुब्बी की ओर से डुबोये जाने के बाद हुई थी. इस युद्धपोत में तक़रीबन 130 लोग सवार थे और ‘डेना’ नामक ये जहाज़ भारतीय नौसेना के न्योते पर एक सैन्य अभ्यास में शामिल होने के लिए भारत आया था.
ईरान के एक जहाज़ को भारत में शरण दिए जाने के सवाल पर भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में बयान दिया है. हालांकि उन्होंने हिंद महासागर में डुबोए गए ईरानी जहाज़ ‘आईआरआईएस डेना’ के बारे में कुछ नहीं कहा.
लेकिन इसराइल-अमेरिका और ईरान की जंग पर इस ‘बैलेंसिंग एक्ट’ के बाद पिछले तीन-चार दिनों में भारत का रुख़ तेजी से बदला है.
भारत-ईरान के विदेश मंत्रियों के बीच बात
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पहले नौ मार्च को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में कहा कि जंग के इस माहौल में ईरानी नेतृत्व से संपर्क मुश्किल था. विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया था कि जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची के साथ तीन बार बातचीत की है.
गुरुवार शाम दोनों विदेश मंत्रियों के बीच चौथी बातचीत हुई.
फिर 12 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से बात की. उन्होंने ईरान की जंग को बातचीत के जरिये जल्द ख़त्म करने पर जोर दिया.
वो ईरान और खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा के प्रति चिंतित थे. उन्होंने ईरान से सटे समुद्री मार्ग से तेल और दूसरे सामानों के बिना किसी अड़चन के सुरक्षित ट्रांसपोर्टिंग पर जोर दिया. भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ दोनों नेताओं ने संपर्क में बने रहने पर सहमति जताई.
इसके बाद ये ख़बर आई कि ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरने वाले भारतीय झंडे लगे जहाजों को वहां से सुरक्षित रास्ता देने के लिए तैयार हो गया है.
हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन करते हुए कहा कि अभी इस बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी. वैसे एस. जयशंकर ने अराग़ची से इस बारे में बातचीत की है.
ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी एक्स पर पोस्ट कर भारत और ईरान के विदेश मंत्रियों के बीच हुई बातचीत की जानकारी दी. ईरान के विदेश मंत्रालय ने लिखा कि ईरानी विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराग़ची ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से बातचीत में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से ईरान पर हुए सैन्य हमलों की निंदा करने की आवश्यकता पर जोर दिया.
उन्होंने यह भी कहा कि बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ाने वाले मंच के तौर पर ब्रिक्स की खास अहमियत है और मौजूदा हालात में क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता का समर्थन करने में ब्रिक्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है.
भारत की दुविधा

सवाल है कि भारत अब अचानक ईरान के रिश्तों में गर्मजोशी क्यों दिखा रहा है. और क्या भारत ने ईरान के साथ खड़े होने में देरी कर दी है.
विपक्षी दलों और विदेश नीति के कई जाने-माने विशेषज्ञों ने ईरान को लेकर भारत के रुख़ की आलोचना की है. लेकिन सवाल ये है कि क्या भारत के लिए इस युद्ध में किसी इसराइल-अमेरिका या ईरान का पक्ष लेना इतना आसान है?
इस सवाल पर इंडियाज वर्ल्ड पत्रिका के संपादक और शिव नाडार यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर हैप्पीमोन जैक़ब ने कहा, ”शुरू से ही ये साफ़ था कि भारत ईरान युद्ध में किसी एक पक्ष के साथ खड़ा नहीं हो सकता. भारत अगर इसराइल और अमेरिका का पक्ष लेगा तो बचे रहने की स्थिति में तो ईरान की मौजूदा सत्ता के साथ इसके रिश्ते बुरी तरह बिगड़े जाएंगे. भारत के अंदर भी सरकार के रुख़ की आलोचना होगी और ईरान का समर्थन काफ़ी बढ़ जाएगा.”
हैप्पीमोन जैकब ने कहा, ”भारत ने इसराइल और अमेरिका का पक्ष लिया तो मध्यपूर्व में रूस और भारत के हितों में भी टकराव पैदा हो सकता है. दूसरी ओर, भारत ने ईरान पर हमले की निंदा की तो इसराइल और अमेरिका के साथ संबंध ख़राब होंगे. याद रहे कि भारत इन देशों से क्रिटिकल डिफ़ेंस टेक्नोलॉजी लेता है.”
भारतीयों की सुरक्षा पर चिंता
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इस जंग का असर अब पूरी दुनिया के साथ भारत पर भी दिखने लगा है. ईरान ने चेतावनी दी है कि वह होर्मुज़ से गुजरने की कोशिश करने वाले जहाज़ों को रोकता रहेगा.
ईरान की इस चेतावनी के बाद इस रास्ते से तेल और गैस लेकर बहुत कम जहाज गुज़र रहे हैं.
होर्मुज़ से होकर पूरी दुनिया की तेल सप्लाई का 20 फ़ीसदी हिस्सा गुजरता है. भारत की तेल सप्लाई का लगभग 40-50 फ़ीसदी हिस्सा इस रास्ते से आता है. हालांकि अब यह घटकर 30 फ़ीसदी हो गई है.
खाड़ी देशों पर ईरान के जवाबी हमलों ने तेल और गैस संकट खड़ा कर दिया है.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम अब भी 100 डॉलर प्रति बैरल पर बरकरार हैं. जो युद्ध के पहले 68 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच थे.
भारत में एलपीजी की किल्लत महसूस होने लगी है.होर्मुज़ स्ट्रेट में जहाजों की कम आवाजाही से सप्लाई के मोर्चे पर संकट बन गया है.
अगर यहां से भारतीयों का पलायन शुरू हुआ तो ये मोदी सरकार के लिए बड़ी चिंता का सबब हो जाएगा. यही वजह है कि पीएम मोदी ने भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है.
भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र केवल तेल आयात का सवाल नहीं है. यह रोज़गार, परिवारों की आय और भारत की बाहरी वित्तीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है. इसीलिए भारत ने ईरान के मोर्चे पर अब चुस्ती दिखानी शुरू की है.
‘देर ही सही लेकिन सही क़दम’
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अंतरराष्ट्रीय मामलों की वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा ने बीबीसी से कहा, ”देर से ही सही है लेकिन पीएम मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बातचीत की है. यह सही कदम है.’
वह कहती हैं, ”खाड़ी देशों में एक करोड़ भारतीय हैं. ईरान वहां हमले कर रहा है. लिहाजा ईरान के साथ तो बातचीत करनी ही होगी. भारत के तेल टैंकर होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर आने हैं. यहां लगभग नाकेबंदी की स्थिति है. शिपिंग मिनिस्ट्री ने कहा है कि भारत के 28 तेल के जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट में पश्चिम की ओर फंसे हुए हैं. ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई ने ये साफ़ कर दिया है कि ये नाकेबंदी जारी रहेगी. ऐसे में ईरान के सर्वोच्च नेता से बात किए बगैर होर्मुज़ से तेल के जहाजों को निकलना मुश्किल होगी.”
स्मिता शर्मा कहती हैं कच्चे तेल की सप्लाई और दाम को लेकर भारत पर दबाव बढ़ रहा है. उनका कहना है कि भारत में एलपीजी की सप्लाई को लेकर हाहाकार मचा है. इसके अलावा भारत के अंदर विदेश नीति के पूर्व विशेषज्ञ सरकार के रुख़ को लेकर सवाल कर रहे हैं. उससे भारत पर ईरान के साथ नज़दीकियां बढ़ाने का दबाव बढ़ा है.
उन्होंने कहा, ”ईरान में अभी 9000 भारतीय हैं. इनमें स्टूडेंट्स भी हैं और बिज़नेसमैन भी. उनकी सुरक्षा को लेकर भारत पर दबाव है.”
वह कहती हैं, ”हाल में भारत और ईरान के बीच जो बातचीत हुई है उसमें अभी तक ख़ामेनेई को मारने के सवाल कोई बातचीत नहीं हुई है. फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हुई है. ये संतोष की बात है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.