डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के विफल होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता गहरा गई है।
विदेश मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेवा ने इसे सभी पक्षों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है और टकराव की स्थिति और तीखी हो गई है।
ईरान ने होर्मुज को बनाया हथियार
सचदेवा के अनुसार, वार्ता के मुख्य विवादित मुद्दों में होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु संवर्धन और संप्रभुता से जुड़े सवाल शामिल रहे। उन्होंने कहा कि भारी सैन्य दबाव के बावजूद ईरान ने अमेरिकी मांगों के आगे झुकने से इनकार किया है और होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है, जो अब इस संघर्ष में एक ‘सुपर हथियार’ के रूप में उभर चुका है।
विशेषज्ञ ने बताया कि ईरान ने छोटे पनडुब्बियों, टारपीडो, तेज नावों और समुद्री माइंस के जरिए यह साबित कर दिया है कि वह वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित कर सकता है। इससे समुद्री व्यापार पर गहरा असर पड़ा है, क्योंकि युद्ध क्षेत्र में बीमा कंपनियां जहाजों को कवर देने से इनकार कर रही हैं, जिससे वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो सकती है।
रोबिंदर सचदेवा ने कहा कि केवल सैन्य ताकत से होर्मुज को खोलना संभव नहीं है, क्योंकि बिना बीमा के कोई भी जहाज इस मार्ग से गुजरने का जोखिम नहीं उठाएगा। इससे ईरान को रणनीतिक बढ़त मिल गई है। ईरान अब इस जलमार्ग में शुल्क वसूली की नई राह पर भी बढ़ सकता है।
मिडिल ईस्ट में और बढ़ेगा तनाव?
विशेषज्ञ ने बताया कि यूरेनियम संवर्धन और होर्मुज पर नियंत्रण ईरान के लिए रेड लाइन हैं, जिन पर तेहरान समझौता नहीं कर सकता। इसके अलावा ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते विदेशों में फंसी रकम भी छुड़ाना चाहता है। वहीं, लेबनान में इजरायली हमलों का भी वह सख्त विरोध कर रहा है।
ईरान परमाणु हथियारों की आकांक्षा को एक बार के लिए छोड़ भी सकता है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन रोकने को वह तैयार नहीं होगा। उधर, अमेरिका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप घरेलू और वैश्विक दबावों से घिरे हैं।
पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और आगामी मध्यावधि चुनावों के कारण उनके सामने राजनीतिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। इस बीच, ट्रंप ने होर्मुज पर नौसैनिक नाकेबंदी का संकेत दिया है, जिससे तनाव और बढ़ने की आशंका है।
(समाचार एजेंसी एएनआइ के इनपुट के साथ)
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