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- Author, फ्रैंक गार्डनर
- पदनाम, रक्षा संवाददाता, बीबीसी
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ऐसा लग रहा है कि अमेरिका कुछ ही दिनों में ईरान पर हमला करने वाला है.
हालाँकि इस हमले के संभावित टारगेट का अनुमान काफ़ी हद तक लगाया जा सकता है, लेकिन इसका नतीजा क्या होगा यह बता पाना आसान नहीं है.
अगर ईरान के साथ अंतिम समय में कोई डील नहीं हो पाती है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी सेना को हमला करने का आदेश देते हैं, तो इसके संभावित परिणाम क्या होंगे?
आइए नज़र डालते हैं ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका कार्रवाई के पांच संभावित नतीजों पर-
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1. आम लोगों को बचाते हुए टारगेट पर सर्जिकल स्ट्राइक और लोकतंत्र की तरफ कदम

अमेरिकी हवाई और नौसेना बल ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) और बसीज यूनिट मिलिट्री बेस (आईआरजीसी के कंट्रोल में एक पैरामिलिट्री फोर्स), बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने के ठिकानों और इनके स्टोरेज साइट्स पर हमला करे.
इसके साथ ही वो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को निशाना बनाकर सटीक हमले कर दे.
अगर इन हमलों के बाद पहले से ही कमजोर हो चुकी सरकार गिर जाती है, और आख़िरकार ईरान में एक असली लोकतंत्र आता है और ईरान बाक़ी दुनिया के साथ फिर से जुड़ सकता है.
यह एक बहुत ही आशावादी स्थिति है. इराक़ और लीबिया दोनों में पश्चिमी मिलिट्री दखल से लोकतंत्र में आसानी से बदलाव नहीं आया.
हालाँकि दोनों मामलों में हस्तक्षेप ने क्रूर तानाशाही ख़त्म कर दी, लेकिन इसने कई वर्षों तक अराजकता और खून-खराबा फैला दिया.
जबकि सीरिया ने साल 2024 में पश्चिमी देशों की सेना की मदद के बिना राष्ट्रपति बशर अल-असद को हटाकर अपनी क्रांति की, वह अब तक बेहतर स्थिति में है.
2. ईरानी शासन बच जाए लेकिन उसकी नीतियाँ नरम हो जाएं
इसे मोटे तौर पर “वेनेज़ुएला मॉडल” कहा जा सकता है, जिसमें अमेरिकी कार्रवाई से सरकार तो बनी रहे, लेकिन उसकी नीतियों में बदलाव आ जाए.
ईरान के मामले में इसका मतलब होगा कि इस्लामिक रिपब्लिक बच जाएगा, जो बड़ी संख्या में ईरानियों को संतुष्ट नहीं करेगा, लेकिन उसे पूरे मिडिल ईस्ट में हिंसक मिलिशिया को दिए जाने वाले समर्थन को कम करना होगा.
ईरान को अपने घरेलू परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को रोकना या कम करना होगा, साथ ही विरोध प्रदर्शनों पर अपनी दमनकारी कार्रवाई में भी ढील देनी होगी.
हालाँकि इस स्थिति की संभावना भी काफ़ी कम है.
इस्लामिक रिपब्लिक का नेतृत्व 47 सालों से अपनी नीतियों पर अड़ा हुआ है और बदलाव का विरोधी रहा है. ऐसा लगता है कि अब इसमें अपना रास्ता बदलने की क्षमता नहीं है.
3. मौजूदा ईरानी शासन का अंत और सैन्य शासन की स्थापना

कई लोगों को लगता है कि इस स्थिति की संभावना सबसे ज़्यादा है.
हालाँकि मौजूदा ईरानी सरकार स्पष्ट तौर पर कई लोगों के बीच अलोकप्रिय है, और पिछले कुछ वर्षों में हर नया विरोध प्रदर्शन सरकार को कमज़ोर करता दिखता है.
फिर भी ईरान में एक बहुत विस्तृत सुरक्षा तंत्र है जिसका मौजूदा स्थिति को बनाए रखने में अपना स्वार्थ है.
ये विरोध प्रदर्शन अब तक सरकार को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे हैं. इसकी प्रमुख वजहें ये हैं कि उनके पक्ष में कोई ख़ास तादाद में दलबदल नहीं हुआ है, जबकि सत्ता में बैठे लोग सत्ता में बने रहने के लिए असीमित बल और क्रूरता का इस्तेमाल करने को तैयार हैं.
किसी भी अमेरिकी हमले के बाद की उथल-पुथल में यह मुमकिन है कि ईरान पर एक मज़बूत, सैन्य सरकार का राज हो जाए, जिसमें ज़्यादातर आईआरजीसी के लोग शामिल हों.
4. अमेरिकी सेना और पड़ोसी देशों पर हमला करके ईरान जवाबी कार्रवाई करे
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ईरान ने अमेरिका के किसी भी हमले का बदला लेने की कसम खाई है, और कहा है कि “उसकी उंगली ट्रिगर पर है.”
यह स्पष्ट है कि वह अमेरिकी नौसेना और वायु सेना की ताक़त का मुक़ाबला नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी वह अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के जखीरे से हमला कर सकता है. इन हथियारों में से कई गुफाओं, ज़मीन के नीचे या दूरदराज के पहाड़ों में छिपाकर रखे गए हैं.
खाड़ी के अरब सागर की तरफ अमेरिकी बेस और ठिकाने फैले हुए हैं, ख़ासकर बहरीन और क़तर में. लेकिन अगर ईरान चाहे तो वह किसी भी ऐसे देश के कुछ अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बना सकता है जिसे वह अमेरिकी हमले में शामिल मानता है, जैसे कि जॉर्डन.
साल 2019 में सऊदी अरामको के पेट्रोकेमिकल ठिकानों पर विनाशकारी मिसाइल और ड्रोन हमला किया गया था, जिसका आरोप इराक़ में ईरान समर्थित मिलिशिया पर लगा था.
इन हमलों ने सउदी को दिखाया कि वे ईरानी मिसाइलों के सामने कितने कमजोर हैं.
खाड़ी में मौजूद ईरान के अरब पड़ोसी देश, जिनमें सभी अमेरिका के सहयोगी हैं, स्वाभाविक रूप से अभी बहुत घबराए हुए हैं.
उन्हें डर है कि कोई भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई उन्हीं पर भारी पड़ सकती है.
5. ईरान खाड़ी में माइन बिछाकर जवाबी कार्रवाई करे
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ईरान साल 1980-88 के ईरान-इराक़ युद्ध के बाद से ही ग्लोबल शिपिंग और तेल सप्लाई के लिए एक संभावित ख़तरा बना हुआ है, जब ईरान ने सच में शिपिंग लेन में माइन बिछा दी थीं और रॉयल नेवी के माइनस्वीपर्स ने उन्हें हटाने में मदद की थी.
ईरान और ओमान के बीच होर्मुज का संकरा जलडमरूमध्य एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है.
दुनिया के लगभग 20% लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) एक्सपोर्ट और 20-25% तेल और तेल उत्पाद हर साल इसी से होकर गुज़रते हैं.
ईरान ने समुद्र में तेजी से माइन बिछाने का अभ्यास किया है. अगर वह ऐसा करता है तो इसका असर निश्चित रूप से दुनिया के व्यापार और तेल की सप्लाई और कीमतों पर पड़ेगा.
6. ईरान जवाबी कार्रवाई करते हुए एक अमेरिकी युद्धपोत को डुबो दे

खाड़ी में एक जंगी जहाज़ पर सवार एक अमेरिकी नौसेना के कैप्टन ने एक बार मुझसे कहा था कि ईरान से जिन ख़तरों के बारे में उन्हें सबसे ज़्यादा चिंता होती है, उनमें से एक है “स्वार्म अटैक.”
इसमें ईरान एक या कई टारगेट पर इतने ज़्यादा हाई एक्सप्लोसिव ड्रोन और तेज़ टॉरपीडो बोट लॉन्च करता है कि अमेरिकी नौसेना के मज़बूत क्लोज-इन डिफेंस भी समय पर उन सभी को खत्म नहीं कर सकते.
आईआरजीसी नौसेना ने खाड़ी में पारंपरिक ईरानी नौसेना की जगह ले ली है, जिसके कुछ कमांडरों को शाह के समय में डार्टमाउथ में ट्रेनिंग दी गई थी.
ईरान के नौसैनिकों ने अपनी ज़्यादातर ट्रेनिंग अपरंपरागत या “बेमेल” युद्ध पर केंद्रित की है, और अपने मुख्य दुश्मन, अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े को मिले तकनीकी फायदों को दूर करने या उनसे बचने के तरीकों पर ध्यान दिया है.
एक अमेरिकी जंगी जहाज़ का डूबना, और उसके क्रू के बचे हुए लोगों का संभावित रूप से पकड़ा जाना, अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ी शर्मिंदगी होगी.
हालाँकि इस तरह की स्थिति की संभावना कम मानी जाती है, लेकिन साल 2000 में अदन बंदरगाह में अल-कायदा के आत्मघाती हमले में अरबों डॉलर का डिस्ट्रॉयर यूएसएस कोल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसमें 17 अमेरिकी नाविक मारे गए थे.
उससे पहले, साल 1987 में एक इराक़ी जेट पायलट ने ग़लती से एक अमेरिकी जंगी जहाज़, यूएसएस स्टार्क पर दो एक्सोसेट मिसाइलें दाग़ दी थीं, जिसमें 37 नाविक मारे गए थे.
7. ईरानी शासन की समाप्ती और देश में अराजकता
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यह हक़ीकत में एक बहुत बड़ा ख़तरा है और यही क़तर और सऊदी अरब जैसे पड़ोसी देशों की बड़ी चिंताओं में से एक है.
सीरिया, यमन और लीबिया जैसे गृह युद्ध की संभावना के साथ-साथ, यह भी ख़तरा है कि अराजकता और भ्रम में, जातीय तनाव सशस्त्र संघर्ष में बदल सकता है.
क्योंकि कुर्द, बलूच और अन्य अल्पसंख्यक देशव्यापी सत्ता के खालीपन के बीच अपने लोगों की रक्षा करना चाहेंगे.
मध्य पूर्व का अधिकांश हिस्सा निश्चित रूप से इस्लामिक रिपब्लिक से छुटकारा पाकर खुश होगा, ख़ासकर इसराइल, जिसने पहले ही पूरे क्षेत्र में ईरान के प्रॉक्सी को भारी नुक़सान पहुंचाया है और जो ईरान के संदिग्ध परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए ख़तरे के तौर पर देख कर डरता है.
लेकिन कोई भी आबादी के हिसाब से मध्य पूर्व के सबसे बड़े देश ईरान जिसकी आबादी 9 करोड़ से ज़्यादा है, उसे अराजकता में डूबते हुए नहीं देखना चाहता. इससे मानवीय और शरणार्थी संकट भी पैदा होगा.
अब सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप, ईरान की सीमाओं के पास शक्तिशाली सेना को इकट्ठा करने के बाद क्या यह तय करते हैं कि उन्हें कार्रवाई करनी होगी या अपनी इज्जत खोनी होगी.
इससे एक ऐसा युद्ध शुरू होगा जिसका कोई स्पष्ट अंत नहीं है और जिसके अप्रत्याशित और संभावित रूप से हानिकारक नतीजे हो सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.