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ईरान की मुद्रा रियाल डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. देश में महंगाई दर 40 प्रतिशत हो गई. तेल, सब्ज़ी, मांस जैसी रोज़मर्रा की ज़रूरतों की चीज़ें इतनी महंगी हो गई कि आम लोगों के लिए ख़रीदना मुश्किल हो गया है .
तेहरान के दुकानदारों ने हड़ताल कर दी और कुछ ही दिनों में महंगाई से परेशान लोग देश के कई शहरों में सड़कों पर उतर आए. देखते ही देखते लोगों ने देश के सर्वोच्च नेता को हटाने की मांग तेज़ कर दी.
विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए. गाडियों और इमारतों को आग लगा दी गई. सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में तीन हफ़्ते के भीतर हज़ारों लोग मारे गए.
ईरान में 1979 में इस्लामी क्रांति को बाद वहां के शाह को हटा दिया गया था. उसके बाद से सरकार को पहली बार इतनी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

कुछ लोग सत्ता से हटाए गए शाह के निर्वासन में रह रहे पुत्र रज़ा पहलवी से देश लौटने की अपील भी कर रहे हैं.
ईरान विरोध प्रदर्शनों के दौर से गुज़र रहा है. इसलिए इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या ईरान में इतिहास दोहराया जा रहा है?
एक साम्राज्य का पतन
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एक समय ईरान पर्शिया कहलाता था और कई क्षेत्रों में फैला शक्तिशाली साम्राज्य था. समय के साथ-साथ पर्शियन साम्राज्य ढहने लगा और दूर देशों पर से उसका प्रभाव समाप्त होता गया. मगर पर्शिया की संस्कृति और उसकी पहचान बरकरार रही.
अमेरिका की ब्रांडेइस यूनिवर्सिटी में मिडिल ईस्ट स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर और आधुनिक ईरान की विशेषज्ञ नग़मेह सोहराबी बताती हैं कि 18वीं शताब्दी तक ईरान साम्राज्य नहीं रहा था. वहां कज़ार राजवंश का शासन था. लेकिन उन्नीसवीं सदी में उसे बड़ा झटका लगा था.
वह कहती हैं कि 19वीं सदी के पूर्वार्ध में ईरान और रूस के बीच युद्ध हुआ जिसमें ईरान की हार हुई. इसके बाद संधि हुई जिसके तहत ईरान को रूस को हर्जाना देना पड़ा और ज़मीन का बड़ा हिस्सा खोना पड़ा. इसी के साथ ईरान का नक़्शा बदल गया.
फिर 20वीं सदी की शुरुआत में बड़े बदलावों का दौर शुरू हुआ. नग़मेह सोहराबी कहती हैं कि ईरान के निष्कासित शाह के युवराज रज़ा पहलवी फ़िलहाल ईरान में विपक्ष के नेतृत्व का दावा कर रहे हैं लेकिन अगर हम इतिहास में झांके तो उनके दादा रज़ा शाह पहलवी ने तत्कालीन कज़ार राजवंश का तख़्ता पलट कर सत्ता हथियाई और पहलवी राजवंश के पहले शाह बने थे.
20वीं सदी में उन्होंने पर्शिया का नाम बदल कर ईरान कर दिया था. तब ईरान के अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ अच्छे संबंध थे.
दूसरे महायुद्ध के दौरान ईरान ने तटस्थ रहने का फ़ैसला किया मगर अमेरिका और ब्रिटेन वहां जर्मनी के प्रभाव को लेकर चिंतित थे. इसके बाद सोवियत और ब्रितानी सेना ने ईरान पर कब्ज़ा कर लिया.
1941 में रज़ा शाह पहलवी ने गद्दी त्याग कर अपने पुत्र मोहम्मद रज़ा पहलवी को ईरान का शाह बना दिया. जल्द ही शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को लगने लगा कि उनकी सत्ता ख़तरे में आ सकती है.
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नग़मेह सोहराबी के अनुसार 1963 में ईरान के इतिहास में एक अहम मोड़ आया. शाह की सत्ता को सबसे बड़ा ख़तरा बड़े ज़मींदारों और वामपंथी गुटों से था.
सोहराबी कहते हैं, “इसी ख़तरे को टालने के लिए शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने ईरान में भूमि सुधार योजना शुरू की जिसे श्वेत क्रांति भी कहा जाता है. इसके तहत बड़े ज़मींदारों से ज़मीन लेकर किसानों में बांटने की योजना बनाई गई.”
नतीजा यह हुआ कि इससे शाह के एक विरोधी अयातुल्लाह ख़ुमैनी की ताक़त बढ़ गई. उन्होंने शाह के ख़िलाफ़ भाषण देने शुरू कर दिये. आख़िरकार ख़ुमैनी को देश छोड़ना पड़ा. फिर 60 और 70 के दशक में शाह के सामने नया विपक्ष खड़ा हो गया जिसमें अधिकांश युवा थे.
नग़मेह सोहराबी कहती हैं कि शाह ने उनके आंदोलन को हिंसक तरीके से कुचलने की कोशिश की. कई निहत्थे प्रदर्शनकारियों को गोली मार दी गई. मगर इससे सत्ता विरोधी प्रदर्शन थमे नहीं. युवा और धार्मिक नेता शाह से नाराज़ हो गए. स्थिति बिगड़ती गई और 1979 में शाह ईरान छोड़ कर विदेश चले गए और अयातुल्लाह ख़ुमैनी वापस ईरान लौटे.
नग़मेह सोहराबी ने कहा कि ख़ुमैनी ने लौट कर एक अंतरिम सरकार बनाई. मगर उस समय राजशाही समाप्त नहीं हुई थी.
इसका मतलब है कि ईरान में उस समय दो सरकारें बन गई थीं. “मार्च 1979 में एक जनमत संग्रह कराया गया. इसमें मतदाताओं से सवाल पूछा गया था कि क्या वह इस्लामिक गणतंत्र चाहते हैं? अगर जवाब हां है तो इसका अर्थ था कि आप शाह के इतर कोई नेतृत्व चाहते हैं और अगर जवाब न है तो आप राजशाहीवादी हैं. ज़ाहिर है कि इस्लामी क्रांति के महज़ एक महीने बाद हुए इस जनमत संग्रह में 98 प्रतिशत लोगों ने इस्लामी गणतंत्र की स्थापना के पक्ष में वोट दिया.”
नया प्रशासन
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1979 में ईरान को इस्लामी गणतंत्र घोषित किए जाने के बाद देश में महिलाओं के लिए सिर ढकना वगैहरा कानूनी तौर पर अनिवार्य कर दिया गया.
उस दौर के बारे में हमने बात की अज़ादे कियान से जो ईरान की मूल निवासी हैं, अब फ़्रांस में बस गई हैं और पेरिस सिटी यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर हैं.
वह कहती हैं कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि धार्मिक नेता सत्ता हथिया लेंगे.
उन्होंने आगे कहा कि, “इस्लामी क्रांति के डेढ़ साल बाद मैंने ईरान छोड़ दिया. उस समय मैं 20 साल की थी. इस्लामी क्रांति के शुरुआती महीनों में लोग ख़ुश थे क्योंकि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल होती दिख रही थी. लेकिन जल्द ही स्थिति बदल गई. सड़कों पर इस्लामी मिलिशिया घूमने लगे जो महिलाओं और छात्रों को निशाना बनाने लगे और उन पर इस्लामी तौर तरीकों का पालन करने के लिए ज़ोर देने लगे.”
उसके बाद शहर में सिनेमाघर और कैफ़े बंद कर दिए गए.
1989 में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता की मृत्यु के बाद अयातुल्लाह अली ख़ामनेई देश के सर्वोच्च नेता बने. उनकी परमाणु नीतियों के चलते ईरान पर कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लाद दिए गए जिससे देश की स्थिति और बिगड़ गई.
मानवाधिकार संस्थाओं ने उनकी सरकार को विश्व की सबसे दमनकारी सरकारों में से एक करार दिया था.
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हाल में ईरान में विरोध प्रदर्शनों का दौर लौट रहा है. ताज़ा प्रदर्शनों के अलावा कई पुराने प्रदर्शनों के वीडियो भी इंटरनेट पर दोबारा शेयर किए जा रहे हैं. इनमें 2022 के विरोध प्रदर्शन भी शामिल है जब महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी.
उन्हें हिजाब ठीक तरह से न पहनने के आरोप में जेल में बंद कर दिया गया था. इसके बाद नाराज़ लोग सड़कों पर उतर आए.
अज़ादे कियान ने कहा, “यह आंदोलन महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें देश के अल्पसंख्यक, युवा और सभी तबके के पुरुष और महिलाएं शामिल हो गई थीं. ऐसा देश में पहली बार हुआ था. पहली बार आंदालोनकारी महिलाओं और अल्पसंख्यकों को समान अधिकार और सामाजिक न्याय की मांग के नारे लगा रहे थे.”
देश में प्रदर्शनकारियों का मक़सद भले ही एक जैसा हो लेकिन ईरान में विविध समुदाय के लोग बसते हैं.
अज़ादे कियान ने बताया कि ईरान की आबादी नौ करोड़ है और देश में 31 प्रांत हैं. अल्पसंख्यकों की आबादी 27 प्रतिशत है जिसमें सुन्नी अल्पसंख्यक बड़ा गुट है लेकिन दूसरे जातीय अल्पसंख्यक समुदाय भी हैं. ईरान में पढ़ी-लिखी महिलाओं की बड़ी आबादी है और देश में प्रजनन दर केवल 1.4 है जो कि 1979 में 8.8 थी.
घटती जन्म दर की समस्या से निपटने के लिए सरकारी अस्पतालों में गर्भ निरोधक दवाइयों सहित कई परिवार नियोजन संबंधी सेवाएं सीमित कर दी गई हैं और यह केवल उन्हीं महिलाओं को दी जाती हैं जिनकी जान को प्रसूति से ख़तरा हो. बढ़ती महंगाई, मकानों की किल्लत और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का भी ईरान की घटती प्रजनन दर पर असर पड़ा है.
व्यापारियों का विद्रोह
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पिछले साल दिसंबर में तेहरान के ग्रैंड बाज़ार के दुकानदारों ने हड़ताल कर दी थी. कुछ ही दिनों में देश के दूसरे शहरों के दुकानदार भी हड़ताल में शामिल हो गए क्योंकि महंगाई का व्यापार पर बुरा असर पड़ रहा है.
जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी की इंस्टीट्यूट फ़ॉर सिक्योरिटी पॉलिसी में नॉन रेज़िडेंट रीसर्च फ़ेलो सारा बाज़ुबंदी कहती हैं ईरान के लोगों पर लगातार आघात हो रहे हैं.
बाज़ुबंदी कहती हैं, “महंगाई की वजह से ईरान में खाद्य सुरक्षा का संकट इतना गहरा गया है कि लोग खाने-पीने की सामान्य चीज़ें भी ख़रीद नहीं पा रहे हैं. मिसाल के तौर पर मुझे पता चला कि एक अंडे की कीमत उतनी है जितनी जर्मनी में एक बर्गर की है. अगर देश में चीज़ों के दाम यूरोप के बराबर हो जाएं जबकि आय यूरोपीय लोगों की आय के तुलना में बहुत कम हो तो खाद्य संकट खड़ा हो जाएगा.”
उन्होंने आगे कहा कि पहला विरोध प्रदर्शन एक ऐसे शॉपिंग सेंटर में हुआ जहां दुकानदार ज़्यादातर मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर जैसा इक्ट्रॉनिक सामान बेचते हैं. इससे पता चलता है कि ईरानी रियाल की गिरती कीमत से बाज़ार में कितनी बड़ी अस्थिरता पैदा हो गई है. दुकानदारों के लिए अपना माल बेचना मुश्किल हो गया है.
जल्द ही छात्र भी विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गए. देश भर में प्रदर्शनकारियों की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग शुरू किया.
सारा बाज़ुबंदी का कहना है कि ऐसे माहौल में स्थिति बिगड़ते देर नहीं लगती.
वह कहती हैं, “जहां लोगों का दमन किया जा रहा हो वहां चंद लोगों के साहस से भी और लोग हिम्मत जुटा कर संघर्ष में जुट जाते हैं. ईरान की जनता देख रही है कि ऊंचे वर्ग के लोग अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाने के लिए हज़ारों डॉलर्स खर्च कर रहे हैं जबकि आम लोगों के पास रोज़मर्रा की चीज़ें ख़रीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं.”
वह कहती हैं कि देश में आर्थिक असमानता बहुत बढ़ गई है. साथ ही जनता प्रशासन से जुड़े लोगों के वक्तव्यों से नाराज़ हैं जो जनता से संयम बरतने या दिन में तीन बार के बजाय दो बार खाना खाने का सुझाव देते हैं.
ईरान में हज़ारों प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की ख़बरें आने लगीं. देश के सर्वोच्च नेता ने भी इसकी पुष्टि की. मानवाधिकार गुटों का मानना है कि मारे गए लोगों की असल संख्या इससे कहीं ज़्यादा है. हमने सारा बाज़ुबंदी से पूछा कि वह जर्मनी में रह रही हैं और ईरान में उनका अपने लोगों से संपर्क बहुत सीमित हो गया है. ऐसे में वह क्या महसूस करती हैं?
उन्होंने कहा, “मैं बीस साल से ईरान से बाहर रही हूं लेकिन एक पल के लिए भी ईरान मुझसे बाहर नहीं गया. अपनी मातृभूमि में यह सब होता देख तकलीफ़ होती है. डर लगता है कि जो लोग मारे गए हैं उनमें मेरे रिश्तेदार और दोस्त हो सकते हैं. मेरे जानने वाले ईरान में लगातार चलते दमन से उम्मीद खो रहे हैं.”
निष्कासित युवराज
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कुछ रिपोर्टों के अनुसार सरकार के दमन के बाद से राजधानी तेहरान और दूसरे शहरों में सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की संख्या काफ़ी कम हो गई है. मगर ईरान में इंटरनेट बंद होने और प्रसार माध्यमों पर नियंत्रणों के चलते इसकी पुष्टि कर पाना संभव नहीं है.
प्रदर्शनों के दौरान ईरान के निष्कासन में रह रहे युवराज रज़ा पहलवी का नाम विपक्ष के नेता के रूप में उभरने लगा. इस बारे में हमने बात की बीबीसी पर्शिया के वरिष्ठ पत्रकार सियावाश अर्दलान से.
अर्दलान कहते हैं कि ईरान की जनता 1979 से ही युवराज रज़ा पहलवी के नाम से परिचित हैं क्योंकि वह ईरान के अंतिम नरेश के पुत्र हैं. जब उनके पिता को सत्ता से हटाया गया तो वह उनके साथ ही निष्कासन में चले गए थे.
वह कहते हैं, “दस साल पहले तक उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता था. लेकिन अब वह जिन योजनाओं का प्रस्ताव रख रहे हैं उससे जनता का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ है. पहली बार बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी उनसे लगभग 47 साल बाद देश वापिस लौटने की अपील कर रहे हैं जब कि ईरान इतने सालों में बहुत बदल चुका है.”
प्रदर्शनकारियों में अधिकांश युवा है जिन्होंने शाह का शासन नहीं देखा था. तो क्या वह एक ऐसे नेतृत्व की वापसी चाहते हैं जिसके बारे में वह बहुत कम जानते हैं?
सियावाश अर्दलान के अनुसार ईरान में इस सवाल पर चर्चा गर्म है. दरअसल शाह के शासन काल के दौरान ईरान के पास मध्य पूर्व में दक्षिण कोरिया या जापान जैसी शक्ति बनने का अवसर था. ईरान के युवा देश में संपन्नता और धर्मनिरपेक्षता चाहते हैं. मुल्लाओं को सत्ता से बाहर करना चाहते हैं जिसकी वजह से युवराज रज़ा पहलवी को समर्थन मिल रहा है.
क्या यह समर्थन इसलिए है क्योंकि बाकी बचे विपक्षी नेता या तो मार दिए गए हैं, या जेल में बंद हैं, या अलग थलग कर दिए गए हैं?
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ख़बरों के अनुसार सरकार ने हज़ारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया है. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही है. इस दमन के ख़िलाफ़ अमेरिका ने सैनिक हस्तक्षेप की धमकी भी दी थी लेकिन अब तक ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
अर्दलान ने कहा, “इससे कई प्रदर्शनकारी निराश हैं. मुझे नहीं लगता निकट भविष्य में लोग जोखिम उठा कर दोबारा विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरेंगे. जिस स्तर पर प्रदर्शनकारियों की हत्याएं हुई हैं उसे देखते हुए लोग अगर सिर पर कफ़न बांध लें, तभी सड़कों पर आएंगे क्योंकि हथियारों से लैस सरकार के ख़िलाफ़ निहत्थे लोगों का लड़ पाना मुश्किल है. हां, हालात में कोई नाटकीय बदलाव आए तो बात अलग है.”
एक सवाल यह भी है कि सरकार को देश में कितना समर्थन है?
सियावाश अर्दलान के अनुसार ईरान में दस से पंद्रह प्रतिशत लोग कट्टरपंथी विचारधारा का समर्थन करते हैं, जो सरकार के साथ हैं.
तो क्या ईरान में इतिहास दोहराया जा रहा है?
28 दिसंबर को आर्थिक समस्याओं के मुद्दे पर जो विरोध प्रदर्शन देश में शुरू हुए थे, वे जल्द ही सत्ता परिवर्तन की मांग में बदल गए.
ईरान सरकार ने इन प्रदर्शनों को देश के दुश्मनों द्वारा भड़काए जा रहे दंगे करार दिया था.
ईरान में इस्लामिक गणतंत्र की स्थापना क्रांति के ज़रिए हुई थी. इस्लामिक क्रांति के लगभग पचास साल बाद अब देश के कई तबके के लोग सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं.
मगर अब सत्ता पर सरकार की पकड़ 1979 में आख़िरी शाह की पकड़ से कहीं अधिक कड़ी है.
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