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- ईरान में 7 जनवरी तक 24 प्रांतों में विरोध प्रदर्शनों की खबरें सामने आई थीं, हालांकि ज्यादातर प्रदर्शन छोटे और बिखरे हुए रहे
- तेहरान में सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए हैं
- अब तक कुल मिलाकर, ईरान के 31 में से 24 प्रांतों के 80 से अधिक ज़िलों में विरोध प्रदर्शनों की खबरें मिली हैं
- विश्लेषक प्रदर्शनों के कारणों में आर्थिक हालात के ख़िलाफ़ शिकायतें, राजनीतिक दमन और लंबे समय से जमा हुए ग़ुस्से को गिना रहे हैं
ईरान से आ रहे कई वीडियो से ये पता चल रहा है कि राजधानी तेहरान समेत देश के कई बड़े शहरों में प्रदर्शकारी सड़कों पर उतर आए हैं.
गुरुवार शाम तेहरान और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर मशहद में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए.
इन प्रदर्शनों को सुरक्षा बलों ने नहीं रोका. बीबीसी फ़ारसी ने इन वीडियो की पुष्टि की है.
अब और भी कई शहरों में विरोध प्रदर्शन की ख़बरें हैं. हालांकि अलग-अलग इलाकों और समय के साथ लोगों की भागीदारी में काफ़ी फ़र्क रहा है.
सबसे बड़े शुरुआती प्रदर्शनों में से एक 28 दिसंबर 2025 को तेहरान में हुआ, जो विरोध प्रदर्शनों का पहला दिन था.
इस दिन सैकड़ों दुकानदार और कारोबारी सड़कों पर उतरे. इसके बाद के दिनों में प्रदर्शन आम तौर पर छोटे, बिखरे हुए और कम समय के लिए रहे.
ज़्यादातर प्रदर्शन रात में हुए और इनमें दर्जनों लोग शामिल थे. यह स्थिति लगभग दस दिनों तक बनी रही.
पश्चिमी प्रांत इलाम के अबदानान शहर में बड़ी भीड़ जुटी, जो प्रमुख विरोध केंद्रों में से एक बन गया.
इसके अगले दिन उत्तर ख़ुरासान प्रांत की राजधानी बोजनुर्द में भी बड़े प्रदर्शन की खबरें आईं.
यह शहर हाल के वर्षों में शायद ही कभी बड़े विरोध प्रदर्शनों का गवाह रहा था.
कुल मिलाकर, ईरान के 31 में से 24 प्रांतों के 80 से अधिक ज़िलों में विरोध प्रदर्शनों की खबरें मिली हैं. ईरान में कुल 480 से अधिक ज़िले और लगभग 1,400 शहर हैं.
इससे साफ़ है कि अशांति काफी बड़े क्षेत्र में फैल गई है. हालांकि विरोध सब जगह एक जैसा नहीं है.
बीबीसी मॉनिटरिंग के मुताबिक़ विरोध प्रदर्शन पहले के देशव्यापी आंदोलनों की तुलना में कहीं छोटे हैं, ख़ासकर 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए व्यापक प्रदर्शनों की तुलना में.
विरोध प्रदर्शन किस तरह के हैं
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कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ये प्रदर्शन मुख्य रूप से आर्थिक कारणों से हो रहे हैं. बढ़ती महंगाई, अस्थिर करेंसी और लोगों की खरीद क्षमता में गिरावट ने हालात को बिगाड़ा है.
शुरुआती दौर में दुकानदारों और कारोबारियों की भागीदारी इस सोच को मज़बूत करती है. वहीं, दूसरे विश्लेषक कहते हैं कि यह अशांति कहीं ज़्यादा गहरी और लंबे समय से चली आ रही नाराज़गी का नतीजा है.
उनके मुताबिक़, यह राजनीतिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक व्यापक लेकिन बिखरी हुई चुनौती है. स्पष्ट नेतृत्व और ठोस मांगों की कमी के कारण इन प्रदर्शनों को परिभाषित करना मुश्किल हो जाता है.
इनमें आर्थिक हालात के ख़िलाफ़ शिकायतें, राजनीतिक दमन और लंबे समय से जमा हुआ ग़ुस्सा शामिल है. यानी एक विरोध का एक मिला-जुला रूप दिखाई दे रहा है.
2022 के विरोध प्रदर्शन महिलाओं के अधिकार और सामाजिक आज़ादी को लेकर थे. लेकिन मौजूदा आंदोलन में कोई साफ़ और एकजुट करने वाला मुद्दा नहीं दिखता.
कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों के नारे सीधे धार्मिक व्यवस्था और सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के ख़िलाफ़ रहे हैं. पिछले विरोध प्रदर्शनों की तुलना में इस बार एक और अहम बदलाव यह है कि रज़ा पहलवी के समर्थन में नारे ज़्यादा सुनाई दिए हैं.
रज़ा पहलवी ईरान के आख़िरी शाह के बेटे हैं जो निर्वासन में रह रहे हैं. इसे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के प्रति बढ़ती निराशा और असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
विरोध प्रदर्शनों में कौन लोग हिस्सा ले रहे हैं?
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हालांकि विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत दुकानदारों ने की लेकिन कई जगहों पर इसमें भागीदारी का दायरा बढ़ता गया है.
कई शहरों में विश्वविद्यालय परिसरों के भीतर छात्रों ने भी प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है. इससे यह आंदोलन व्यापक रूप लेने लगा है. इसके बावजूद अलग-अलग समूहों के बीच आपसी तालमेल अब भी सीमित है.
अशांति के शुरुआती दिनों में तबरीज़, इस्फ़हान, मशहद और अहवाज़ समेत कई शहरों के व्यापार-वाणिज्य संघों ने खुद को इन प्रदर्शनों से अलग कर लिया.
उन्होंने आर्थिक दबावों को स्वीकार तो किया, लेकिन यह कहते हुए विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करने से इनकार कर दिया कि कुछ विरोधी गुट माहौल का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं.
7 जनवरी को आई कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि तबरीज़ में दुकानदार हड़ताल पर चले गए हैं, लेकिन सरकारी मीडिया ने इस दावे को तुरंत खारिज कर दिया.
कुर्द बहुल कुछ इलाकों में दुकानदारों की ओर से 8 जनवरी को हड़ताल की योजना बनाए जाने की खबरें भी सामने आई थीं.
ईरान में सुधार समर्थक विश्लेषक अब्बास अब्दी के मुताबिक, महसा अमीनी से जुड़े विरोध प्रदर्शनों की तुलना में इस बार महिलाएं बहुत कम संख्या में शामिल हो रही हैं.
उनका मानना है कि यही बदलाव कुछ घटनाओं के ज़्यादा हिंसक होने की एक वजह हो सकता है.
उन्होंने युवाओं, खासकर युवा पुरुषों की अधिक प्रमुख भूमिका की ओर भी इशारा किया और कहा कि यह समाज में बढ़ते विभाजन का संकेत देता है.
मीडिया और पुलिस का रुख़
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ईरानी मीडिया ने विरोध प्रदर्शनों के पहले ही दिन से इन्हें कवर करना शुरू कर दिया.
सरकारी ब्रॉडकास्टर ने भी कुछ समय के लिए प्रदर्शनों की ख़बरें दिखाईं और जनता की शिकायतों को स्वीकार करने वाले इंटरव्यू प्रसारित किए.
अशांति के दौर में ऐसा होना आम तौर पर असामान्य माना जाता है.
इसी के साथ अधिकारियों ने विदेश स्थित असंतुष्ट समूहों के बयानों और नैरेटिव को चुनौती देने के लिए भी तेज़ी से कदम उठाए.
वरिष्ठ अधिकारियों ने यह फ़र्क साफ़ किया कि वे किन मांगों को सही मान रहे हैं किन गतिविधियों को ‘उप्रदव’.
एक मामले में तेहरान में एक अकेले प्रदर्शनकारी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने तुरंत उसका जवाबी वीडियो जारी किया और दावा किया कि वह घटना योजनाबद्ध थी.
शुरुआत में सुरक्षा बलों का रवैया थोड़ा संयमित दिखा, लेकिन 3 जनवरी के बाद उनकी कार्रवाई सख़्त होती गई.
इसी समय सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी आई.
इसमें कहा गया था “उपद्रवियों को उनकी जगह दिखानी चाहिए”.
इसके बाद न्यायपालिका ने भी तेज़ सज़ा की धमकी दी.
पहले के कई आंदोलनों के उलट इस बार अधिकारियों ने देशव्यापी इंटरनेट पाबंदी नहीं लगाई है.
अनुमान है कि इंटरनेट ट्रैफिक सामान्य स्तर से लगभग 35 फ़ीसदी कम रहा.
विरोध प्रदर्शनों में अब तक कितनी मौतें ?
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गिरफ़्तारियां लगातार जारी हैं और मौतों की भी खबरें सामने आई हैं, हालांकि हिंसा का स्तर पिछले बड़े विरोध प्रदर्शनों की तुलना में कम दिखाई देता है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, नवंबर 2019 में एक हफ्ते तक चले विरोध प्रदर्शनों के दौरान कम से कम 323 लोगों की मौत हुई थी.
वहीं, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों में 550 से अधिक लोग मारे गए थे.
इसके मुक़ाबले, मौजूदा विरोध प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 36 लोगों की मौत की बात कही जा रही है, जिनमें सुरक्षा बलों के दो सदस्य भी शामिल हैं. ये प्रदर्शन इस समय अपने 12वें दिन में हैं.
अधिकारियों ने अब तक मौतों का कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है. हालांकि, बीबीसी फ़ारसी ने 21 मौतों की पुष्टि की है, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं.
अंतरराष्ट्रीय पहलू
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ये विरोध प्रदर्शन ऐसे समय हो रहे हैं, जब अंतरराष्ट्रीय माहौल पहले से ही तनावपूर्ण है.
जून 2025 में इसराइल के साथ हुए युद्ध के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई थी, जिसमें अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी.
2 जनवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरानी सुरक्षा बल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारते हैं, तो अमेरिका दख़ल दे सकता है.
उन्होंने कहा कि अमेरिका ‘पूरी तरह तैयार’ है. ट्रंप ने 4 जनवरी को यह चेतावनी फिर दोहराई.
इसके जवाब में ईरानी अधिकारियों ने अमेरिका और इसराइल पर अशांति भड़काने का आरोप लगाया और कहा कि ईरान की सशस्त्र सेनाएं अलर्ट पर हैं.
विरोध प्रदर्शनों को अमेरिका और इसराइल के कई प्रमुख नेताओं का समर्थन भी मिला है.
अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने ‘सड़कों पर उतरे ईरानियों को बधाई दी. और यहां तक कहा कि उनके साथ ‘हर मोसाद एजेंट भी चल रहा है’.
अमेरिका और इसराइल की सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट्स, ख़ासकर फ़ारसी भाषा में, विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में काफ़ी सक्रिय रहे हैं.
इस तरह की विदेशी भागीदारी कुछ प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ा सकती है.
लेकिन साथ ही यह सरकार के उस दावे को भी मज़बूती देती है कि विरोध प्रदर्शन बाहरी ताक़तों के इशारे पर हो रहे हैं.
इसका असर यह हो सकता है कि आम लोगों का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल होने से हिचके.
आगे क्या
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सरकार का ध्यान अब आर्थिक समाधान की ओर जाता दिखाई दे रहा है.
3 जनवरी को राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की सरकार ने देशभर में एक इलेक्ट्रॉनिक कूपन योजना शुरू की.
इसका मक़सद बढ़ती कीमतों से परिवारों को कुछ राहत देना बताया गया.
हालांकि, सोशल मीडिया पर इस कदम की कड़ी आलोचना हुई है. कई लोगों ने इसे ‘अपमानजनक’ करार दिया.
ईरान में सेंट्रल बैंक की लीडरशिप में बदलाव के बावजूद देश की करेंसी अस्थिर बनी हुई है.
अगर आर्थिक हालात और बिगड़ते हैं और लोगों की शिकायतों का समाधान नहीं होता, तो विरोध प्रदर्शन जारी रह सकते हैं. भले ही वे किसी बड़े देशव्यापी जन आंदोलन का रूप न लें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.