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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भारत में शिया समुदाय का केंद्र माना जाता है. ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के मारे जाने के बाद यहां शोक और आक्रोश का माहौल है.
यहां रहने वाले शिया समुदाय ने तीन दिन के शोक का एलान किया है. ख़ामेनेई के मारे जाने के बाद भारत के कई इलाक़ों में अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं.
लखनऊ में रोज़ाना लोग सड़कों पर निकलकर शोक संवेदना प्रकट कर रहे हैं. इस प्रदर्शन में शामिल कई लोगों के ख़िलाफ़ सहारनपुर में एफ़आईआर भी दर्ज की गई है.
इस बीच ईरान में रहने वाले भारतीय लोगों के परिवार में ताज़ा हालात को लेकर काफ़ी चिंता है.
ईरान और भारत का काफ़ी पुराना रिश्ता है. ईरान मुसलमानों के शिया समुदाय का धार्मिक केंद्र भी है.
ईरान में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रहते हैं. ये लोग कारोबार, मेडिकल की पढ़ाई और धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं.
भारत में उत्तर प्रदेश का लखनऊ शहर शिया समुदाय का प्रमुख केंद्र है.
परिवार वाले चिंतित
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पुराने लखनऊ के रहने वाले रवीश तक़रीबन 16 साल से ईरान में रह रहे हैं. दो हफ्ते पहले रवीश की ईरान में ओपन-हार्ट सर्जरी हुई है.
उनके पिता आमिर अब्बास ज़ैदी अब अपने बेटे की सलामती के लिए चिंतित हैं. वह अपने कमरे में बैठकर दुआ कर रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में ज़ैदी ने कहा, ”बेटे की हालत ऐसी है कि मुझे वहां होना चाहिए था या वह मेरे पास होता. क्योंकि बेटे की पत्नी भी नहीं है. इस जंग से पहले मेरा जाने का प्लान था, लेकिन पासपोर्ट की अवधि समाप्त होने की वजह से नहीं जा पाया.”
उन्होंने बताया कि उनका बेटा अमेरिकी-इसराइली के हमले में मारे गए ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के कॉम्प्लेक्स से कुछ दूरी पर रहता है.

ज़ैदी बताते हैं कि शनिवार को अमेरिका और इसराइल के ईरान पर किए गए सैन्य हमलों के बाद वहां नेटवर्क सेवाएं बाधित हो गई थीं, जिसकी वजह से वह अपने बेटे से संपर्क नहीं कर पा रहे थे.
उन्होंने कहा, “बाद में फ़ोन आया था, लेकिन मैं अभी भी परेशान हूँ. पहला हमला मेरे बेटे के घर से कुछ दूर पर ही हुआ था, उसने वीडियो भी भेजा था लेकिन मैं समझ नहीं पाया.”
भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, तक़रीबन नौ हज़ार भारतीय ईरान में रहते हैं. इनमें क़रीब दो हज़ार मेडिकल के छात्र हैं.
क़ुम में हालात ठीक, राहत में लखनऊ में परिवार
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पूरे भारत से ईरान के शहर क़ुम में छात्र धार्मिक शिक्षा के लिए जाते हैं.
इससे पहले तेहरान में भारतीय दूतावास ने भी सुरक्षा स्थिति को देखते हुए सभी भारतीय नागरिकों को तुरंत ईरान छोड़ने की सलाह दी थी.
इस एडवाइज़री में छात्रों, तीर्थयात्रियों, व्यापारियों और पर्यटकों से कहा गया कि वे उपलब्ध वाणिज्यिक उड़ानों या अन्य सुरक्षित माध्यमों से देश से बाहर निकल जाएं. लेकिन बहुत से लोग वहीं रहे.
दूतावास ने यह भी कहा है कि भारतीय नागरिक स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें और दूतावास के संपर्क में बने रहें.
मोहम्मद शब्बर लखनऊ में रहते हैं. उनकी बहन और बहनोई कई साल से ईरान के क़ुम शहर में परिवार समेत रह रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ”हम लोग तो फ़िक्रमंद हैं. लेकिन बहन से बात हुई थी तो अभी क़ुम शहर में हालात ठीक हैं. बहन ने बताया है कि लोग रात में पार्कों या सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा होते हैं और रहबर के समर्थन में जुलूस निकालते हैं.”
मोहम्मद शब्बर कहते हैं, ”अमेरिका और इसराइल ने जो किया है, वह सही नहीं है. इसलिए भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की अवाम में रोष है.”
कुछ लोगों को सुकून है कि उनकी रिश्तेदारों से बातचीत हो पा रही है. लेकिन कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि उनका कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है.

लखनऊ की रहने वाली तूबा ज़ैनब के कई रिश्तेदार ईरान में हैं. कई धार्मिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. उनके दो रिश्तेदार मेडिकल की पढ़ाई भी कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, ”हमारी सरकार को चाहिए कि जो लोग भारतीय नागरिक हैं, उन्हें सही-सलामत देश में वापस लाया जाए. उन्हें इस तरह नहीं छोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि जब सरकार ने चेतावनी जारी की थी, तब हालात ऐसे नहीं थे. लेकिन अब कोई कार्रवाई होनी चाहिए.”
गज़ाला रिज़वी की बहन ईरान के क़ुम शहर में रहती हैं. वह कहती हैं, ”मेरी बहन तो दस साल से वहां रह रही हैं, लेकिन बहनोई उससे पहले से रह रहे हैं. उनसे जंग शुरू होने के दो दिन पहले बात हुई थी. लेकिन बाद में कोई संपर्क नहीं हो पाया है.”
उन्होंने कहा, ”हम लोग फ़िक्रमंद भी हैं और नहीं भी हैं, क्योंकि बहुत सारे और भी रिश्तेदार ईरान में हैं.”
भारत सरकार के मुताबिक, तकरीबन एक करोड़ भारतीय नागरिक पूरे खाड़ी क्षेत्र में रहते हैं.
लेकिन बाकी देशों में रहने वाले नागरिक उतने परेशान नहीं हैं.
पहला कारण यह है कि उन देशों में नागरिक आबादी पर हमले नहीं हो रहे हैं. दूसरा, बाकी देशों में लोगों का अपने परिवार वालों से संपर्क हो पा रहा है.
शिया समुदाय में रोष
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ईरान के सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई के मारे जाने के बाद पूरे देश में लोग सड़कों पर निकले. उत्तर प्रदेश के कई शहरों में बड़े प्रदर्शन हुए.
भारत में शिया समुदाय ने तीन दिन के शोक का ऐलान किया था. तीन दिन का शोक मंगलवार को समाप्त हो गया है.
लेकिन शिया समुदाय के लोग अभी भी मस्जिदों और इमामबाड़ों में जलसों के ज़रिए इस घटना की निंदा कर रहे हैं.
लखनऊ में शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा, ”उन्होंने ख़ामेनेई साहब को हमसे छीन लिया है, लेकिन ख़ामेनेई साहब का मक़सद आज भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा.”
लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान जहां लोग इसराइल और अमेरिका के हमले की निंदा कर रहे थे, वहीं शोक भी मना रहे थे.
लखनऊ के शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ़ अब्बास ने ईद की नमाज़ के दौरान काली पट्टी बांधने की अपील की है.
हालांकि प्रदर्शन के कारण सहारनपुर में पुलिस ने कई धाराओं में 13 लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है.
यह एफ़आईआर ननौता थाने में पुलिस के सब-इंस्पेक्टर की तहरीर पर दर्ज की गई है.
सहारनपुर के कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद ने ख़ामेनेई के भारत में प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही से दिल्ली में मंगलवार मुलाकात की है.
इस मुलाकात के बाद उन्होंने कहा, ”हम लोग शांति के लिए हैं, लेकिन सरकार को कोई बयान जारी करना चाहिए था, क्योंकि हमला ईरान पर हुआ है, ईरान ने हमला नहीं किया है.”
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में भी शिया समुदाय के संगठनों ने सरकार से शोक की घोषणा की मांग की है.
बड़ा इमामबाड़ा कमेटी के आगा मीर सैय्यद अब्बास हुसैन खोरास्सानी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की मांग की है.
इसके लिए प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भेजा गया है.
इसमें कहा गया है, ”आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई साहब के सम्मान में भारत में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया जाए, जैसा कि पूर्व में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के निधन पर किया गया था.”
इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यकता होने पर उनकी सुरक्षित निकासी की भी मांग की गई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.