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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में दखल देने की अपनी चेतावनी को दोहराया है. उन्होंने कहा है कि ईरानी अधिकारियों के साथ मीटिंग से पहले उन्हें ईरान में कार्रवाई करनी पड़ सकती है.
ट्रंप का कहना है कि ईरानी अधिकारियों ने उन्हें “बातचीत के लिए” बुलाया था.
उन्होंने इस बारे में विस्तार से नहीं बताया कि वे किस तरह की कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़, उन्हें मंगलवार को ख़ास विकल्पों के बारे में जानकारी दी जाएगी.
इस बीच एक अमेरिकी ऑब्ज़र्वर ग्रुप का कहना है कि 28 दिसंबर से ईरान में हो रहे प्रदर्शनों में 500 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है.
ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के मारे जाने पर ईरान में दखल देने की धमकी दी थी. इस पर जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ईरान ने ‘रेड लाइन’ पार कर दी है, तो उन्होंने कहा, “लग रहा है कि वे ऐसा कर रहे हैं.”
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ट्रंप ने कहा, “हम इसे बहुत गंभीरता से देख रहे हैं. सेना भी इसे देख रही है और हम कुछ असरदार विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. हम कोई फैसला लेंगे.”
इस बीच राजधानी तेहरान के बाहरी इलाक़े में एक अस्थायी मुर्दाघर का वीडियो सामने आया है, जहाँ लोग अपने प्रियजनों को ढूंढने आए थे. बीबीसी की टीम यहाँ कम से कम 180 सफेद कफ़न गिन पाई.
ईरान में फैली इस हिंसा के बीच सरकार अपने लोगों को भी दफना रही है. ईरानी सरकारी टीवी के मुताबिक़ देश में कम से कम 10 प्रांतों में भीड़ ने सुरक्षा बलों और आम लोगों के ताबूतों को कंधा दिया.
ईरान इन मौतों के लिए अमेरिका और इसराइल को दोषी ठहरा रहा है. सरकार ने ईरान के लोगों से आज सड़कों पर आकर अपना समर्थन दिखाने के लिए कहा है.
कई जानकारों और चश्मदीदों के मुताबिक़, ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन इतने व्यापक हो गए हैं, जो क्रांति के बाद 47 साल के इतिहास में पहले कभी नहीं देखे गए.
जैसे ही देश भर के शहरों में लोग सड़कों पर उतरे, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर प्रदर्शनकारियों को मारा जाता है, तो वह ‘ज़ोरदार हमला करेंगे’.
ट्रंप ने कहा कि वह ‘वहीं चोट देंगे, जहाँ सबसे ज़्यादा दर्द होगा’.”
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरानी शासन का विरोध करने वालों की मदद के लिए तैयार है.
ईरानी अधिकारियों ने इसके जवाब में कहा है कि अगर ऐसा होगा, तो वो क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों और उसके हितों पर हमला करेंगे.
तो ईरान के ये विरोध प्रदर्शन कैसे अलग हैं और इन विद्रोहों पर ईरान सरकार की प्रतिक्रिया देश में हुए पिछले प्रदर्शनों से कितनी अलग है.
पूरे देश में प्रदर्शन

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में हो रहे मौजूदा विरोध प्रदर्शनों का आकार और इसका विस्तार ऐतिहासिक है.
समाजशास्त्र की शोधकर्ता एली खोरसंदफ़र कहती हैं कि जहाँ एक ओर ईरान के बड़े शहरों में रैलियाँ हुई हैं, वहीं ये उन छोटे क़स्बों में भी फैल गई हैं, “जिनके नाम बहुत से लोगों ने शायद कभी सुने भी नहीं होंगे.”
ईरान में पहले भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं. साल 2009 का तथाकथित ‘ग्रीन मूवमेंट’ कथित चुनावी धांधली के ख़िलाफ़ मध्यम वर्ग का विरोध प्रदर्शन था.
हालाँकि यह आकार में बड़ा था, लेकिन ये केवल बड़े शहरों तक ही सीमित था. जबकि साल 2017 और 2019 के अन्य बड़े विरोध प्रदर्शन देश के ग़रीब इलाक़ों तक ही सीमित थे.
देश में हाल के वर्षों में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों से सबसे ज़्यादा मिलते-जुलते विरोध प्रदर्शन साल 2022 में हुए थे, जब 22 साल की महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद लोग भड़क उठे थे.
इस युवती को ईरान की मोरैलिटी पुलिस ने हिजाब पहनने के तरीक़े के लिए गिरफ़्तार किया था.
कई रिपोर्टों के अनुसार, अमीनी की मौत के बाद ये विरोध प्रदर्शन तेज़ी से बढ़े, लेकिन छह दिनों के बाद ये चरम पर पहुँचे.
इसके विपरीत, मौजूदा विरोध प्रदर्शन ज़्यादा व्यापक दिखते हैं और 28 दिसंबर को शुरू होने के बाद से ये लगातार बढ़ते दिख रहे हैं.
‘तानाशाह का अंत हो’
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साल 2022 के विरोध प्रदर्शनों की तरह, मौजूदा विरोध की जड़ें भी एक ख़ास शिकायत से जुड़ी हैं जो शासन व्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांगों में बदल गईं.
खोरसंदफ़र कहती हैं, “साल 2022 का आंदोलन महिलाओं के मुद्दे से शुरू हुआ था. लेकिन इसमें दूसरी शिकायतें भी सामने आईं. दिसंबर 2025 के विरोध प्रदर्शन आर्थिक मुद्दों से शुरू हुए और बहुत ही कम समय में, उन्हीं प्रदर्शनों जैसी मांगें शामिल हो गईं.”
दिसंबर के अंतिम दिनों में, तेहरान के केंद्र में मौजूद बाज़ार के व्यापारियों ने अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले ईरानी रियाल की एक्सचेंज रेट में तेज़ी से उतार-चढ़ाव के विरोध में हड़ताल कर दी.
ये विरोध प्रदर्शन देश के पश्चिम में सबसे ग़रीब इलाक़ों में फैल गए. साल 2022 की तरह, इलम और लोरिस्तान प्रांत इसके मुख्य केंद्र थे.
दिसंबर के अंत में, हज़ारों लोगों ने मार्च निकाले, क्योंकि देश के मध्यम वर्ग सहित लाखों ईरानी गंभीर आर्थिक संकट और तेज़ी से बढ़ती महंगाई से परेशान हो रहे थे.
उसी समय से सड़कों पर मार्च कर रहे लोग ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे हैं. वे ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और उनके शासन को हटाने की मांग कर रहे हैं.
क्या रज़ा पहलवी को शासक बनाना चाहते हैं प्रदर्शनकारी?
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ईरान में साल 2022 के विरोध प्रदर्शन बिना किसी नेता के हो रहे थे और इसलिए जल्द ही ख़त्म हो गए.
इसके विपरीत, मौजूदा प्रदर्शनों में कुछ जाने-माने लोग भी सक्रिय हैं, मसलन रज़ा पहलवी.
उनके पिता रज़ा शाह पहलवी को साल 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद सत्ता से हटा दिया गया था.
अब रज़ा पहलवी निर्वासन में रहकर दूर से ही आंदोलन को आकार देने या नेतृत्व करने की कोशिश कर रहे हैं. शायद इसी वजह से ये प्रदर्शन ज़्यादा समय तक चल रहे हैं.
मौजूदा विरोध प्रदर्शनों में, पहलवी परिवार की वापसी की मांग वाले नारे पहले से कहीं ज़्यादा सुने गए हैं.
पहलवी ने अमेरिका में निर्वासन के दौरान ख़ुद को ईरान का शाह घोषित कर दिया था.
सड़कों पर उतरकर नारे लगाने की उनकी अपील को कई लोगों ने बड़े पैमाने पर शेयर किया है.
ईरान के अंदर सोशल मीडिया पर युवा एक-दूसरे को परोक्ष रूप से प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.
तेहरान जैसे शहरों में हाल के विरोध प्रदर्शनों का प्रसार पैमाना पहलवी की अपील के असर को साबित करता है.
विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह से शासन का विरोध करने वाले एक जाने-माने नेता की मौजूदगी ने कुछ प्रदर्शनकारियों को यह भरोसा दिलाया है कि अगर मौजूदा सरकार गिरती है, तो एक संभावित विकल्प मौजूद है.
हालाँकि कई लोगों का मानना है कि पहलवी के लिए किसी भी तरह के समर्थन का मतलब यह नहीं है कि लोगों में राजशाही की वापसी की इच्छा हो. बल्कि, यह मौलवी शासन के लिए निराशा दिखाती है, ख़ासकर देश के अंदर धर्मनिरपेक्ष विपक्षी नेताओं की ग़ैरमौजूदगी की वजह से ऐसा हो रहा है.
ईरान में दखल देने की ट्रंप की धमकी
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एक और फैक्टर जो साल 2025 के विरोध प्रदर्शनों को साल 2022 के विरोध प्रदर्शनों से भी अलग करता है, वह है अमेरिका.
पिछले विरोध प्रदर्शनों के विपरीत, इस साल के प्रदर्शनों को व्हाइट हाउस का समर्थन मिलता दिख रहा है.
ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सरकारी ठिकानों पर हमला करने की धमकी दी है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.
साल 2009 में राष्ट्रपति चुनाव में कथित धोखाधड़ी के ख़िलाफ़ हो रहे आंदोलन के दौरान, प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, ‘ओबामा, ओबामा, या तो उनके साथ या हमारे साथ.’
बराक ओबामा ही साल 2009 में अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर थे.
उन्होंने बाद में इस बात पर पछतावा जताया कि उस समय सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का और ज़्यादा खुलकर समर्थन नहीं किया.
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने कहा है कि इन प्रदर्शनों को “ईरान के दुश्मन” मैनिपुलेट कर रहे हैं.
हालाँकि, उनके लिए मुद्दा यह है कि ईरान के पास हाल के वर्षों की तुलना में काफ़ी कम मित्र हैं.
ईरानी अधिकारियों ने अपने प्रमुख सहयोगियों को खो दिया है.
सीरिया में बशर अल-असद को राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया है और लेबनान में हिज़बुल्लाह भी इसराइली सैन्य कार्रवाई से काफी कमज़ोर हो गया है.
‘युद्ध का फ़ायदा नहीं उठा सका शासन’
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साल 2022 के विरोध प्रदर्शनों के विपरीत इस साल के विरोध प्रदर्शन इसराइल के साथ 12 दिन की लड़ाई और फिर ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों के तुरंत बाद हो रहे हैं.
पत्रकार अब्बास अब्दी का मानना है कि इन घटनाओं ने ईरानी अधिकारियों को लोगों के बीच किसी तरह की एकजुटता और तालमेल बनाने का मौक़ा दिया, लेकिन सरकार इसका फ़ायदा उठाने में नाकाम रही.
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पिछले साल सेना को लगे भारी झटके ने ईरानियों की नज़र में देश की मुख्य सैन्य संस्था के तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) की छवि और प्रतिष्ठा को ख़त्म कर दिया है.
साल 2022 के प्रदर्शनों की भावना को आगे बढ़ाते हुए, खोरसंदफ़र मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में एक स्थायी बदलाव देखती हैं.
तीन साल पहले सड़कों पर उतरी महिलाओं के साथ इंटरव्यू में, कई महिलाओं ने उन्हें बताया था कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि एक दमनकारी शासन के डर को ख़त्म करना था.
बीबीसी फ़ारसी सेवा, बीबीसी ग्लोबल जर्नलिज़्म और मध्य-पूर्व के पत्रकार नेदा सानीज के रिपोर्टिंग और विश्लेषण के साथ.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.