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पिछले कुछ दशकों में, जब लेबनान पर बम गिर रहे थे, इराक़ में आत्मघाती हमले हो रहे थे और सीरिया में इस्लामिक स्टेट विदेशियों को अग़वा उन्हें मौत के घाट उतार रहा था, तब दुबई में लगातार जश्न का माहौल बना हुआ था.
दुनिया के अमीर लोग दुबई के कृत्रिम द्वीपों पर हवेलियां ख़रीद रहे थे, अबू धाबी के लूव्र संग्रहालय में घूम रहे थे, या क़तर के रेगिस्तान में सफ़ारी का लुत्फ़ उठा रहे थे.
युद्ध, विरोध प्रदर्शनों और अस्थिरता से घिरे पड़ोस में, फ़ारस की खाड़ी के देशों ने सालों तक खुद को सुरक्षा और समृद्धि के गढ़ के तौर पर पेश किया है.
उनकी कोशिशों और फ़ायदेमंद टैक्स नीतियों ने अरबों डॉलर का विदेशी निवेश आकर्षित किया. इसी वजह से दुबई, अबू धाबी और दोहा जैसे शहर अरबपतियों, लग्ज़री पर्यटन, और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के लिए पसंदीदा ठिकाने बन गए.
लेकिन यह सब 28 फ़रवरी को बदल गया.
उस दिन अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमले ने एक ऐसे युद्ध को जन्म दिया, जिसमें ईरान ने न सिर्फ़ इसराइली शहरों और इलाके में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर बमबारी करके जवाब दिया, बल्कि खाड़ी में अमेरिका के सहयोगियों को भी निशाना बनाया.
राजशाही वाले इन देशों ने अचानक खुद को ऐसे संघर्ष में घिरा हुआ पाया, जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी.
ग़ुस्सा चरम पर है
यूरोपीय शांति संस्थान में खाड़ी मामलों की विशेषज्ञ विश्लेषक अन्ना जैकब्स ख़लीफ़ा ने बीबीसी मुंडो से कहा, “उन्होंने हर मुमकिन कोशिश की थी कि राष्ट्रपति ट्रंप को इससे दूर रखा जा सके.”
ईरानी मिसाइलें अचानक शॉपिंग मॉल, आलीशान गगनचुंबी इमारतों और नौकाओं से भरे बंदरगाहों के पास आकर गिरने लगीं.
यह सब क़तर, यूएई, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब और ओमान के लोगों की भयभीत निगाहों के सामने हुआ. ये मंज़र वहां मौजूद हज़ारों प्रवासी कामगारों और पर्यटकों ने भी देखा.
युद्ध अब दुनिया के कुछ सबसे आलीशान होटलों तक भी पहुंच चुका है. ईरान के एक ड्रोन को हवा में मार गिराए जाने के बाद उसके अवशेष दुबई के बुर्ज अल अरब पर गिरे, जबकि कृत्रिम द्वीप पाम जुमेराह पर स्थित फ़ेयरमोंट द पाम होटल पर सीधा हमला हुआ.
और इसी बुधवार को क़तर की सरकारी तेल कंपनी ने कहा कि रा लाफ़ान औद्योगिक परिसर पर मिसाइल हमलों के चलते उसे ‘भारी नुक़सान’ झेलना पड़ा है.
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रास लाफ़ान उन जगहों में शामिल था, जिनका ज़िक्र ईरान ने अपनी चेतावनी में किया था. ईरान ने यह चेतावनी तब दी थी, जब उसके साउथ पार्स गैस क्षेत्र की सुविधाओं पर इसराइली हमले हुए थे.
इसके नतीजे बेहद विनाशकारी साबित हो रहे हैं, और खाड़ी की देशों का ग़ुस्सा चरम पर है.
उड़ानों, होटल बुकिंग्स, सम्मेलनों और बहरीन व सऊदी अरब में फ़ॉर्मूला 1 जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के रद्द होने की लहर ने इन अमीर राजशाहियों को झकझोर कर रख दिया है.
इसमें होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने का असर भी जुड़ गया है, जिससे ईंधन के निर्यात पर ब्रेक लग गई है.
टूट गई मृगतृष्णा?
कुवैत विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बद्र अल सैफ़, कुवैत के प्रधानमंत्री के कार्यालय में उप प्रमुख रह चुके हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “खाड़ी के देशों ने मध्य पूर्व में खुद को सुरक्षित ठिकानों के तौर पर पेश करने के लिए काफ़ी मेहनत की है. लेकिन पिछले एक हफ़्ते की कार्रवाइयों और घटनाओं ने उस छवि को धुंधला कर दिया है.”
खाड़ी देशों के ये तानाशाह निगरानी तंत्र पर बड़े पैमाने में निवेश करते हैं. इससे वे काफ़ी हद तक आतंकवाद से सुरक्षित रहे हैं.
लेकिन साथ ही उन्होंने असहमति की आवाज़ों या ऐसी किसी भी चीज़ पर सख़्ती की है, जो उनकी छवि को नुक़सान पहुंचा सकती थी.
मसलन, इन जगहों पर युद्ध के इन तीन हफ्तों के दौरान दर्जनों लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इनमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैं. कुछ लोगों को तो सिर्फ़ इसलिए गिरफ़्तार किया गया क्योंकि उन्होंने ईरानी हमलों के वीडियो पोस्ट किए थे.
उदार टैक्स व्यवस्था के कारण इन देशों ने दुनिया भर से निवेशकों को अपनी ओर खींचा है लेकिन अब यह युद्ध इन देशों के लिए एक बड़ा इम्तिहान साबित हो रहा है.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने वर्ल्ड ट्रैवल एंड टूरिज़्म काउंसिल के हवाले से लिखा है कि सिर्फ़ पर्यटन उद्योग को ही इस क्षेत्र में रोज़ाना क़रीब 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक़सान हो रहा है.
दुबई के एयरबीएनबी और वीआरबीओ जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर 6 मार्च वाले हफ्ते में 80 हज़ार से ज़्यादा बुकिंग्स रद्द की गई हैं. उड़ानों के रद्द होने से भी लाखों यात्री फंसे हुए हैं.
पिछले कुछ दशकों में खाड़ी क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क का एक अहम केंद्र बन गया है, जहां से रोज़ाना पांच लाख से ज़्यादा यात्री गुज़रते हैं.
28 फ़रवरी के बाद से कम से कम तीन हवाई अड्डे- दुबई, कुवैत और अबू धाबी- ईरानी मिसाइलों या ड्रोन हमलों की चपेट में आ चुके हैं, जिसके चलते हज़ारों उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं.
हार्वर्ड के कैनेडी स्कूल के बेल्फ़र सेंटर की शोधकर्ता एल्हाम फ़ख़रो ने बीबीसी मुंडो से कहा, “सुरक्षा की यह छवि आंशिक रूप से कृत्रिम थी, लेकिन आंशिक रूप से वास्तविक भी थी. क्योंकि खाड़ी देशों ने दशकों तक खुद अपने आस-पास हो रही हिंसा से दूर रखा था.”
फ़ख़रो का मानना है कि निवेशकों और पर्यटकों का भरोसा फिर से हासिल करना ‘संभव है’, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष कितने लंबे समय तक चलता है.
निराशा और ग़ुस्सा
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ईरान के साथ युद्ध बेहद महंगा साबित हो रहा है और इससे वहां के नागरिकों और हुकमरानों- दोनों के बीच ग़ुस्से और हताशा की भावना गहराती जा रही है.
शायद सबसे खुलकर और तीखे शब्दों में ट्रंप के उस फ़ैसले की आलोचना करने वाली सार्वजनिक शख़्सियत अमीराती अरबपति कारोबारी ख़लफ़ अहमद अल हब्तूर रहे हैं, जिन्होंने खाड़ी देशों को इस युद्ध में घसीटने के फैसले पर सवाल उठाए.
अल हब्तूर ने अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखे एक हालिया और कड़े खुले पत्र में पूछा, “किसने उन्हें यह अधिकार दिया कि वे हमारे क्षेत्र को ईरान के साथ युद्ध में घसीट लें? और उन्होंने यह ख़तरनाक फैसला किस आधार पर लिया?”
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या ट्रंप ने “ट्रिगर दबाने से पहले संभावित नुक़सान का आकलन किया था.”
हार्वर्ड के कैनेडी स्कूल के बेल्फ़र सेंटर की शोधकर्ता एल्हाम फ़ख़रो ने बीबीसी मुंडो से कहा, “खाड़ी की राजधानियों में विश्वासघात की भावना काफ़ी गहरी है, हालांकि यह संभावना कम है कि यह भावना कुछ समय तक खुले तौर पर सामने आए.”
खाड़ी देशों ने अमेरिका के साथ अपने रिश्तों में भारी निवेश किया है, इसमें अमेरिकी सैन्य अड्डों को जगह देना, लॉजिस्टिक सहायता मुहैया कराना, अरबों डॉलर के निवेश का वादा करना और अमेरिका की क्षेत्रीय नीतियों के साथ खड़ा होने की घरेलू राजनीतिक क़ीमत चुकाना शामिल है.
फ़ख़रो कहती हैं, “इसके बदले में, कम से कम उन्हें यह उम्मीद थी कि ऐसे किसी युद्ध से पहले उनसे सलाह ली जाएगी, जिसका वो निशाना बन सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ईरानी मिसाइलें उनकी राजधानियों, हवाई अड्डों, तेल से जुड़े बुनियादी ढांचों और वित्तीय इलाक़ों पर गिरीं. और ये सब उनकी वजह से नहीं बल्कि वॉशिंगटन और तेल अवीव में लिए गए फ़ैसलों के कारण हुआ.”
लंदन स्थित थिंक टैंक चैटहम हाउस के शोधकर्ता नील क्विलियम भी इस बात से सहमत हैं कि इस समय खाड़ी की राजधानियों में ‘भारी ग़ुस्सा’ है, लेकिन फ़िलहाल “वे ज़्यादा कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं और न ही इसके किसी सार्वजनिक मंच पर ज़ाहिर होने की संभावना है.”
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया हो.
साल 2015 में जब ईरान के साथ परमाणु समझौता हुआ था, तब भी खाड़ी के देशों को बाहर ही रखा गया था.
सुरक्षा रणनीति
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फ़ारस की खाड़ी की राजशाहियों के अपने पड़ोसी ईरान के साथ रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं. यह स्थिति उस क्रांति के बाद से बनी हुई है, जिसने शाह रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाया और ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना की.
ईरान शिया बहुल देश है जबकि खाड़ी के देश ज़्यादातर सुन्नी हैं. इसके अलावा ईरान में 1979 की क्रांति के बाद से खुद को क्षेत्र में अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में पेश किया है, जबकि अरब राजशाहियाँ अमेरिका की सहयोगी रही हैं.
इसी वजह से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर जैसे खाड़ी देश अमेरिकी ख़ेमें में चले गए.
लंदन स्थित थिंक टैंक चैटहम हाउस के शोधकर्ता नील क्विलियम के मुताबिक़, “इन सभी देशों ने किसी न किसी तरह नेटो के अनुच्छेद 5 जैसी व्यवस्था चाही, जिसमें यह माना जाता है कि अगर एक सदस्य पर हमला होता है, तो बाकी उसके बचाव में आगे आएंगे.”
इस सोच का सबसे बड़ा उदाहरण 1990 का कुवैत था, जिस पर सद्दाम हुसैन के इराक़ ने हमला किया था और जिसे बाद में अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने कुवैत को आज़ाद कराया.
लेकिन जब 2019 में तेहरान ने सऊदी अरब की तेल से जुड़ी बुनियादी संरचनाओं पर हमला किया, या 2025 में इसराइल ने क़तर की राजधानी दोहा में हवाई हमले में हमास के नेताओं को मार गिराया, तब अमेरिका ने कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी.
इससे यह भावना और मज़बूत हुई कि संकट की घड़ी में अमेरिका उनके बचाव के लिए शायद आगे न आए. नतीजतन, इन देशों में से कुछ ने अपनी मिलिट्री पर ख़र्च बढ़ाना शुरू कर दिया.
एल्हाम फ़ख़रो के मुताबिक़, खाड़ी देशों की सुरक्षा नीति, तीन अनुमानों पर टिकी थी-
पहला ये कि अमेरिका बाहरी ख़तरों के ख़िलाफ़ उन्हें सुरक्षा की गारंटी देगा
दूसरा ये कि ईरान के साथ तनाव कम होने से, सीधे टकराव का जोखिम घटेगा
और तीसरा, कि कुछ देशों के लिए इसराइल के साथ सीमित रिश्ते बनाना रणनीतिक फ़ायदों वाला होगा.
बेल्फ़र सेंटर की इस शोधकर्ता के अनुसार, इन रणनीतियों का मक़सद यह था कि खाड़ी की सरकारें अमेरिका, ईरान और इसराइल तेल अवीव के बीच संतुलन बनाए रख सकें. और इनमें किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न हों.
लेकिन ईरान के साथ मौजूदा युद्ध ने इस पूरी व्यवस्था की सीमाओं को उजागर कर दिया है.
कुछ देश अब तुर्की या पाकिस्तान जैसे अन्य देशों के साथ अपने सैन्य सहयोग बढ़ाने का रास्ता चुन सकते हैं, लेकिन नील क्विलियम का कहना है कि “अमेरिका से दूर जाना उनके लिए आसान नहीं होगा.”, क्योंकि प्रशिक्षण, हथियार प्रणालियों और विमानन से जुड़े कई समझौते कम से कम 20 साल की अवधि के होते हैं.
गर्दन पर तलवार
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तो अब खाड़ी देशों के पास क्या विकल्प बचे हैं?
विशेषज्ञों की राय में, कोई भी विकल्प आसान नहीं है. लेकिन संघर्ष जितनी जल्दी ख़त्म होगा, नुक़सान उतना ही कम रहेगा.
एल्हाम फ़ख़रो का कहना है कि अगर जल्दी युद्धविराम हो जाता है, तो हालात में सुधार की कहानी शुरू की जा सकेगी. लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो हर बीतते महीने के साथ नुक़सान बढ़ता जाएगा.
इससे प्रवासी कामगारों का पलायन तेज़ होगा और पूंजी का बाहर जाना भी बढ़ेगा- जबकि दुबई जैसी अर्थव्यवस्थाएं इन्हीं पर निर्भर हैं.
इतना ही नहीं. नील क्विलियम के मुताबिक़, होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने से खाड़ी देशों को जो आर्थिक नुक़सान हो रहा है, उसे सिर्फ़ स्थाई युद्धविराम के ज़रिए ही रोका जा सकता है.
अगर आज ही युद्ध खत्म हो जाए, तब भी ईरान से इन देशों को होने वाला ख़तरे की तलवार हमेशा लटकती रहेगी.
चैटहम हाउस के शोधकर्ता कहते हैं, “दो महीने बाद इसराइल यह कह सकता है कि उसे ईरान के परमाणु या बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम में कोई गतिविधि नज़र आई है और वह फिर से हमला कर देगा. और तब ईरान जवाबी कार्रवाई करेगा.”
यूरोपीय शांति संस्थान की अन्ना जैकब्स ख़लीफ़ा के मुताबिक़, खाड़ी देश “अपना भूगोल नहीं बदल सकते”. वे 9 करोड़ आबादी वाले एक विशाल देश के पड़ोसी हैं और “उन्हें ईरान के नए नेतृत्व के साथ किसी तरह सह अस्तित्व का रास्ता निकालना ही होगा, ताकि वह उनके देशों और वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को धमकाता न रहे.”
बीबीसी मुंडो, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की स्पेनिश भाषा की सेवा है.
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