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ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से चीन के राजनयिक बहुत सावधानी से कदम रख रहे हैं.
चीन ने ईरान और खाड़ी देशों, दोनों के साथ अपने अहम आर्थिक रिश्तों को संतुलित रखने की कोशिश की है, साथ ही अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंधों को संभालना भी उसके सामने चुनौतीपूर्ण रहा है.
तो फिर चीन की इस कूटनीतिक भागदौड़ और चीन के मीडिया कवरेज से हमें क्या समझ में आता है?
चीन ने किस-किस से बात की?
चीन ने मध्य-पूर्व के देशों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य रूस, फ़्रांस और ब्रिटेन से संपर्क किया है, लेकिन अब तक अमेरिका से बातचीत नहीं हुई है, कम से कम सार्वजनिक बयानों के मुताबिक तो नहीं.
यह बात भी गौर करने लायक है कि तीन हफ़्ते की लड़ाई के दौरान ‘समग्र रणनीतिक साझेदार‘ ईरान को सिर्फ़ एक फोन कॉल किया गया. जबकि युद्ध शुरू होने के बाद चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने सबसे पहले फ़ोन किया- रूस को.
चीन ने अपनी मध्यस्थता को किस तरह पेश किया है?
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मोटे तौर पर चीन अपने कूटनीतिक प्रयासों को उच्च नैतिक आधार वाली गैर हस्तक्षेप की नीति पर आधारित कोशिशों की तरह पेश करता है.
19 मार्च को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, “चीन एक ज़िम्मेदार बड़ी ताक़त है और मध्य पूर्व के देशों का सच्चा दोस्त है.”
उन्होंने कहा, “इलाक़े में सुलह और शांति के लिए काम करना चीन की मध्य पूर्व नीति की बुनियाद है. जब तक यह संघर्ष जारी रहेगा, हमारे मध्यस्थता के प्रयास भी जारी रहेंगे.”
लिन जियान के अनुसार ‘सभी पक्षों’ ने ‘चीन के न्यायपूर्ण रुख़’ की सराहना की है.
मीडिया में हालांकि इस आत्म प्रशंसा के साथ कुछ हद तक रक्षात्मक रुख़ भी दिखाई देता है.
चीन के सरकारी और राष्ट्रवादी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने ‘पश्चिमी मीडिया’ के उन बयानों का जवाब दिया जिनमें कहा जा रहा था कि चीन ईरान से दूरी बना रहा है.
18 मार्च के एक संपादकीय में कहा गया कि यह नज़रिया चीन के ‘शांतिपूर्ण सह अस्तित्व और आपसी लाभ’ के मूल्यों को समझने में नाकाम रहा है. अख़बार ने लिखा कि चीन ‘सैन्य गठबंधनों, गुटीय टकराव या प्रॉक्सी युद्धों’ में शामिल नहीं होता.
लेख में यह तर्क दिया गया कि मध्य पूर्व में चीन का प्रभाव ‘गहरे और व्यापक सहयोग’ पर आधारित है, जो उसे ‘संघर्ष के बीच भी मज़बूती’ देता है. इसी के साथ सवाल उठाया गया: “तो फिर तथाकथित ‘रणनीतिक विफलता’ आखिर है कहां?”
इससे पहले, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स डेली की एक टिप्पणी में उन ‘बेतुके तर्कों’ पर तीखा हमला किया गया था जिनमें कहा जा रहा था कि बीजिंग ईरान के मामले में निष्क्रिय रहा या इस संघर्ष से उसे फ़ायदा हुआ. इसे पश्चिमी देशों की ओर से ‘दोष पूर्व की ओर धकेलने’ की कोशिश बताते हुए बदनाम करने का अभियान कहा गया.
16 मार्च की उस टिप्पणी में कहा गया, “यह बिल्कुल साफ़ है कि आग में घी कौन डाल रहा है और कौन शांति बनाए हुए है.”
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चीन के समग्र रुख़ पर बात करते हुए वांग यी कह चुके हैं कि यह युद्ध ‘होना ही नहीं चाहिए था’. उन्होंने अमेरिका और इसराइल के ‘ग़ैरक़ानूनी’ हमलों की खुलकर आलोचना की है, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बल प्रयोग का विरोध किया है, आम नागरिकों और नागरिक ठिकानों पर हमलों की निंदा की है और युद्धविराम की मांग की है.
क्या अलग-अलग देशों को संदेशों में फ़र्क रहा है?
अमेरिका और इसराइल की सबसे कड़ी आलोचना वांग यी ने 1 मार्च को मॉस्को से हुई बातचीत के दौरान की जब उन्होंने उनके हमलों को ‘अस्वीकार्य’ कहा.
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जहां चीनी राजनयिकों ने मध्य-पूर्व के देशों के साथ बातचीत में अमेरिका और इसराइल का नाम लेकर आलोचना की, वहीं यूएई, सऊदी अरब और बहरीन के साथ संवाद में न तो वांग यी और ना ही झाई जुन ने ऐसा किया.
चीन ने ब्रिटेन और फ़्रांस के साथ हुई बातचीत के सार्वजनिक बयानों में भी अमेरिका और इसराइल की खुली निंदा से परहेज़ किया.
यूएई के साथ बातचीत में, जहां होटलों और दुबई एयरपोर्ट पर हमले हुए हैं, चीन ने यह कहते हुए सहानुभूति जताई कि आम नागरिकों पर हमले की ‘लक्ष्मण रेखा’ पार नहीं की जानी चाहिए.
ओमान के साथ बातचीत में चीन ने अमेरिका-ईरान वार्ता की मेज़बानी करने पर उसकी सराहना की और मध्य पूर्व के देशों से मिलकर ‘अपनी तक़दीर अपने हाथ में लेने’ का आग्रह किया.
2 मार्च को तेहरान के साथ हुई फोन बातचीत का बयान काफ़ी संक्षिप्त था. इसमें वांग यी ने यह ‘विश्वास’ जताया कि ईरान ‘राष्ट्रीय और सामाजिक स्थिरता बनाए रखेगा और ‘अपने पड़ोसियों की जायज़ चिंताओं पर ध्यान देगा.’
वांग ने कहा कि चीन ईरान का ‘अपनी संप्रभुता, सुरक्षा, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा’ के लिए समर्थन करता है.
होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर होने वाली शिपिंग का ज़िक्र उस बयान में नहीं था. वास्तव में यह मुद्दा सिर्फ़ कुछ ही अन्य बयानों में सामने आया, जिनमें कुवैत और ब्रिटेन के साथ हुई बातचीत से जुड़े बयान शामिल हैं.
यूएई सबसे महत्वपूर्ण क्यों?
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दिलचस्प बात यह है कि ईरान युद्ध के संदर्भ में 28 फ़रवरी के बाद से यूएई के साथ चीन की बातचीत किसी भी दूसरे देश की तुलना में ज़्यादा रही है.
वांग यी से फोन पर बातचीत और झाई जुन से मुलाक़ात के अलावा, यूएई ने अपने चीन के लिए विशेष दूत ख़लदून ख़लीफ़ा अल मुबारक को भी बीजिंग भेजा. 28 फ़रवरी के बाद से इस क्षेत्र से आने वाले वे चीन के इकलौते कूटनीतिक मेहमान हैं.
18 मार्च को वांग यी ने ख़लदून से कहा कि मौजूदा हालात में द्विपक्षीय रिश्तों का ‘रणनीतिक महत्व’ ‘और भी ज़्यादा उभरकर’ सामने आया है.
ख़लदून के हवाले से कहा गया कि दोनों देशों के रिश्ते ‘अभूतपूर्व रूप से ऊंचे स्तर’ पर हैं- यह वही जुमला है जिसे रूस-चीन संबंधों के बारे में बताने के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी अक्सर इस्तेमाल करते रहे हैं.
गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के देशों में चीन की नज़र में सिर्फ़ आर्थिक रूप से मज़बूत सऊदी अरब और यूएई ही ‘प्राथमिक कूटनीति’ वाले देश माने जाते हैं.
इन दोनों में भी चीन यूएई की तारीफ़ करता है. यूएई एक अहम री एक्सपोर्ट हब है और जीसीसी की इकलौती बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां से चीन जितना ख़रीदता है, उससे ज़्यादा बेचता है.
दिसंबर 2025 में वांग यी ने कहा था कि चीन और यूएई ‘स्वाभाविक दोस्त और साझेदार‘ हैं, जिसकी वजह उनके ‘आपस में मेल खाते विकास लक्ष्य, मिलते-जुलते एडमिनिस्ट्रेटिव फिलॉसफ़ी और एक-दूसरे की पूरक अर्थव्यवस्थाएं’ हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.