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- Author, मरीना दरास और स्टीफ़न हॉकेस
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
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पढ़ने का समय: 9 मिनट
जंग में शायद ही कभी कोई निर्णायक विजेता होता है. इसकी सबसे भारी क़ीमत अक्सर आम लोगों को चुकानी पड़ती है.
इसराइल-अमेरिका और ईरान की जंग की वजह से ग्लोबल एनर्जी मार्केट और सप्लाई चेन में उथल-पुथल मची हुई है. इससे लग रहे आर्थिक झटके से कई देश निपटने की तैयारी कर रहे हैं.
जबकि कुछ देशों को इस अव्यवस्था के बीच नए रणनीतिक अवसर भी मिल सकते हैं.
इसराइल-अमेरिका और ईरान की जंग मध्यपूर्व और पूरी दुनिया पर नाटकीय असर डाल रही है. खाड़ी देशों में अस्थिरता बढ़ गई है और मध्यपूर्व में लाखों लोगों को अपना घर छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
युद्ध क्षेत्र से दूर देशों में भी इसका असर दिखाई दे रहा है. तेल की कीमतों में तेज़ उछाल और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री ट्रैफ़िक, ख़ासकर होर्मुज़ स्ट्रेट के आसपास, बाधित होने से कंज्यूमर्स और उद्योग दोनों को महंगाई का सामना करना पड़ रहा है. उद्योगों के लिए लागत बढ़ गई है.
लेकिन इस उथल-पुथल के बीच सवाल यह है कि किन देशों को सबसे ज़्यादा नुकसान हो सकता है और किन्हें इससे सबसे ज़्यादा फ़ायदा मिल सकता है?
रूस
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ईरान रूस का एक अहम सहयोगी और सैन्य साझेदार है. लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का मारा जाना रूस के लिए एक कूटनीतिक झटका माना जा रहा है.
इससे पहले सीरिया में बशर अल-असद का सत्ता से हटना और वेनेज़ुएला के निकोलस मादुरो को गिरफ़्तार कर अमेरिका ले जाया जाना भी रूस को नुक़सान पहुंचाने वाली घटनाएं मानी जा रही हैं.
इसके बावजूद मध्य पूर्व का यह संघर्ष रूस को यूक्रेन में फ़ायदा दिला सकता है. दरअसल अब अमेरिका के सैन्य संसाधन यूक्रेन की ओर जाने के बजाय मध्य पूर्व की ओर जा रहे हैं.
पेरिस इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल स्टडीज़ के सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ की एसोसिएट प्रोफ़ेसर निकोल ग्रायेव्स्की ने बीबीसी न्यूज़ की रूसी सेवा से कहा, ”पैट्रियट मिसाइलों और इंटरसेप्टरों का कम होना रूस के लिए फ़ायदेमंद है क्योंकि इससे यूक्रेन मिलने वाले हथियारों की मात्रा सीमित हो जाती है.”
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के लिए शाहेद ड्रोन की जरूरत बढ़ गई है. फिर भी इससे यूक्रेन युद्ध में रूस की क्षमता पर बहुत बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है.
अमेरिका में सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज़ की यूरेशिया डायरेक्टर हैना नोट्टे ने बीबीसी से कहा, “यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में एक ख़ास दौर था जब रूस मिलिट्री सहयोग के लिए ईरान पर निर्भर था. उस समय ईरान ने शाहेद ड्रोन दिए और उनकी प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी और लाइसेंस भी मुहैया कराए. ख़ासकर 2022-2023 में रूस को ईरान से ये मदद मिली.”
उन्होंने कहा, “अब युद्ध ऐसे चरण में है जहां रूस को यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध जारी रखने के लिए ईरान की जरूरत नहीं है. रूस अब शाहेद ड्रोन खुद ही बना सकता है.”

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इस बीच, ईरान की ओर से होर्मुज स्ट्रेट में सख़्ती की वजह से तेल और गैस शिपमेंट पर काफ़ी बुरा असर पड़ा है. इससे तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं.
लेकिन इससे यूक्रेन युद्ध की वजह से आर्थिक दबाव झेल रहे रूस को कुछ वित्तीय राहत मिल सकती है.
रूस के संघीय बजट का बड़ा हिस्सा 59 डॉलर प्रति बैरल पर निर्यात किए जा रहे तेल पर निर्भर है. लेकिन इस वक़्त कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं.
इसके साथ ही खाड़ी के प्रमुख तेल उत्पादक देशों की ओर से उत्पादन कम करने से रूस को चीन और भारत जैसे अहम बाज़ारों में ज़्यादा तेल निर्यात का मौका मिल सकता है.
ग्लोबल एनर्जी और कमोडिटी मार्केट इंटेलिजेंस कंपनी आरगस मीडिया के चीफ़ इकोनॉमिस्ट डेविड फ़ाइफ़ कहते हैं, ” पहले भारत को रूसी तेल की ख़रीद कम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था. लेकिन अब अमेरिका ने उसे फिर से रूसी तेल खरीदने की एक तरह की अस्थायी छूट दे दी है. ये छूट कम से कम अगले एक महीने तक के लिए लागू है.”
उन्होंने कहा, “कुछ समस्याओं को घटाने के लिए रूसी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को नरम करने को लेकर भी बातचीत शुरू हो चुकी है.”
चीन
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ईरान में चल रहे युद्ध का चीन पर अभी तक कोई बहुत बड़ा या नाटकीय असर नहीं दिखा है. लेकिन उसे भी इसका कुछ दबाव महसूस होगा.
सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी के मुताबिक़ चीन के कच्चे तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी सिर्फ़ 12 फ़ीसदी है.
इसके अलावा चीन ने कई महीनों के लिए पर्याप्त तेल भंडार पहले से जमा कर रखा है.
जरूरत पड़ने पर वह रूस से भी आसानी से तेल ले सकता है.
हालांकि डेविड फ़ाइफ़ का कहना है कि चीन के निर्यात-आधारित उद्योगों पर इसका असर पड़ सकता है.
चीन की अर्थव्यवस्था में निर्यात की काफ़ी अहम भूमिका है. चीन की जीडीपी में निर्यात की हिस्सेदारी 20 फ़ीसदी है.
चीन में हाल में प्रॉपर्टी की कीमतों में गिरावट कमजोर घरेलू मांग की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है. इसलिए निर्यात की भूमिका उसके लिए और अहम हो गई है.
होर्मुज़ स्ट्रेट के आसपास समुद्री ट्रैफ़िक रुकावट चीन के लिए बहुत बड़ी समस्या नहीं है. लेकिन पश्चिमी देशों तक चीनी सामान पहुंचाने के लिए अटलांटिक महासागर तक पहुंचना बेहद अहम है.
अरब प्रायद्वीप के दूसरे छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट में भी ख़तरा बढ़ गया है.
ये एशिया, यूरोप और अफ़्रीका को जोड़ता है, इस इलाके में हूतियों के हमले हुए हैं. हूती एक हथियारबंद संगठन है. ईरान इसका समर्थन करता है.

डेविड फ़ाइफ़ ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, ”इस संकट से इसकी बहुत आशंका है कि रेड सी में जहाज़ों की आवाजाही फिर से बुरी तरह प्रभावित हो जाए. एशिया से अटलांटिक क्षेत्र की ओर जाने वाले लंबी दूरी के मालवाहक जहाज़ों को अब दक्षिणी अफ़्रीका और केप ऑफ गुड होप के रास्ते घूमकर जाना पड़ सकता है.”
लंदन स्थित थिंक-टैंक चैटहम हाउस के मध्यपूर्व विशेषज्ञ नील क्वलियम ने ने कहा, “इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. इससे यात्रा में लगभग 10 से 14 दिन अतिरिक्त लग जाते हैं. माल किस किस्म का है इस पर काफी कुछ निर्भर करता है. इस हिसाब से देखें तो औसत जहाज़ के लिए लगभग 20 लाख डॉलर का अतिरिक्त खर्च आता है.”
हालांकि ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध चीन के लिए कुछ कूटनीतिक अवसर भी पैदा कर सकता है.
ब्रिटेन के रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ फ़िलिप शेल्टर जोन्स ने बीबीसी से कहा कि चीन खुद को अमेरिका के मुकाबले एक “जिम्मेदार और संतुलन कायम करने वाली ताक़त” के तौर पर में पेश करने की कोशिश कर सकता है.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ख़ासकर डोनाल्ड ट्रंप के उलट खुद को एक स्थिर और भरोसेमंद वैश्विक नेता के तौर पर पेश करते रहेंगे.
इसके अलावा यह संघर्ष चीन के लिए यह समझने का मौका भी बन सकता है कि ट्रंप अन्य संभावित संकटों पर कैसी प्रतिक्रिया दे सकते हैं. इनमें ताइवान भी शामिल है, जिस पर चीन अपना दावा करता है.
पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत इन देशों पर कैसा असर
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मध्यपूर्व के तेल और गैस पर बहुत अधिक निर्भर होने के कारण दक्षिण पूर्वी एशिया के कई देशों पर इस युद्ध का भारी असर पड़ने की आशंका है.
आर्थिक झटके को कम करने के लिए कुछ देशों ने पहले से ही सख़्त बचत करने वाल वाले कदम उठाने शुरू कर दिए हैं.
वियतनाम में युद्ध शुरू होने के बाद से डीज़ल की कीमत लगभग 60 फ़ीसदी बढ़ चुकी है. सरकार लोगों से कह रही है कि जहाँ संभव हो वर्क फ्रॉम होम करें.
फिलीपीन्स अपना लगभग 95 फ़ीसदी कच्चा तेल मध्यपूर्व से आयात करता है. वहां सरकारी कर्मचारियों के लिए अब चार दिन का वर्किंग वीक लागू कर दिया गया है. सिर्फ़ इमरजेंसी सर्विस से जुड़े कर्मचारियों पर इसे लागू नहीं किया गया है.
इसी तरह की पाबंदियां पाकिस्तान में भी लागू की गई हैं.
हालांकि बैंकों को इससे बाहर रखा गया है. जहाँ संभव है वहाँ वर्क-फ्रॉम-होम के आदेश दिए गए हैं और विश्वविद्यालयों की क्लास ऑनलाइन कर दी गई हैं.
टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम संबोधन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि देश के ईंधन भंडार को बचाकर और सावधानी से इस्तेमाल करना बेहद ज़रूरी है.
उधर बांग्लादेश में सरकार घबराहट में की जा रही ख़रीदारी से जूझ रही है. पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं. इसलिए वहां राशनिंग लागू की गई है. कारों के लिए दिन में दस लीटर और मोटरसाइकिलों के लिए सिर्फ दो लीटर पेट्रोल देने की सीमा तय की गई है.
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युद्ध का असर सिर्फ़ ऊर्जा संकट तक सीमित नहीं रह सकता. इसका असर कहीं और ज्यादा व्यापक हो सकता है.
फर्टिलाइज़र का उत्पादन भी इससे प्रभावित हो सकता है. अगर उसके उत्पादन पर बुरा असर पड़ा तो ग्लोबल फूड सिक्योरिटी ख़तरे में पड़ सकती है.
नील क्विलियम ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, “दुनिया की लगभग 30 फ़ीसदी यूरिया होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है. ये फर्टिलाइजर बनाने में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख कच्चा माल है. यूरिया पेट्रोकेमिकल्स से बनता है. पेट्रोकेमिकल्स कच्चे तेल की प्रोसेसिंग से निकलते हैं. अगर ग्लोबल मार्केट से 30 फ़ीसदी यूरिया हट जाती है, तो इसका ग्लोबल फूड सिक्योरिटी पर गंभीर असर हो सकता है.
क्विलियम के मुताबिक़, “छह से नौ महीनों के भीतर इसका असर खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों पर दिख सकता है. अभी इसका असर पूरी तरह सामने नहीं आया है, लेकिन अगर किसानों को फर्टिलाइजर मिलने में मुश्किल होती है या फसलें प्रभावित होती हैं, तो इसका दीर्घकालिक असर जरूर देखने को मिलेगा.”
(बीबीसी की रूसी सेवा की एलिजावेता फॉख़्त की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ )
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.