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“भारत को अपनी रीढ़ और मज़बूत करनी चाहिए ताकि हमारे (ईरान) ऊपर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर सके.”
यह बयान नवंबर 2019 में ईरान के तत्कालीन विदेश मंत्री जावेद ज़ारिफ़ ने दिया था. लेकिन वर्तमान स्थिति में भी यह बयान उतना ही प्रासंगिक है, जितना 6 साल पहले था.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वालों पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है.
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, “तत्काल प्रभाव से, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश को अमेरिका के साथ किए जाने वाले सभी प्रकार के व्यापार पर 25% का टैरिफ़ देना होगा. यह आदेश अंतिम और निर्णायक है. इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद.”
इससे पहले ही भारत 50 फ़ीसदी टैरिफ़ का भार झेल रहा है.
शुरुआत में अमेरिका ने भारत पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया, फिर रूस से तेल ख़रीद रोकने के लिए दबाव बनाते हुए 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाया. अब अगर भारत और ईरान के बीच व्यापार जारी रहता है, तो कुल टैरिफ़ 75 फ़ीसदी हो जाएगा.
बहरहाल, ऐसी स्थिति सिर्फ़ भारत के सामने ही नहीं है, जिन भी देशों के साथ ईरान का व्यापार है, वे सब मुश्किल में पड़ गए हैं.
ईरान और भारत के बीच व्यापार
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ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत से ईरान को होने वाले मुख्य निर्यातों में 512.92 मिलियन डॉलर के जैविक रसायन शामिल हैं. इसके बाद फल, मेवे, खट्टे फलों के छिलके और खरबूजे़ आते हैं, जिनका मूल्य 311.60 मिलियन डॉलर है.
खनिज ईंधन, तेल और डिस्टिलिशन प्रॉडक्टस (जिनसे पेट्रोलियम उत्पाद, शराब और इत्र बनते हैं) का आयात 86.48 मिलियन डॉलर का है.
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत पहले से ही ईरान से अपना व्यापार काफ़ी कम कर चुका है. 2018-19 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार 17.03 अरब डॉलर था.
इससे अगले ही वित्तीय वर्ष 2019-20 में यह घटकर 4.77 अरब डॉलर रह गया.
यह सीधे 72 प्रतिशत की गिरावट थी. 2025 आते-आते तो आंकड़ा 1.68 अरब डॉलर तक आ गया.
यही कारण है कि 2019 में ईरान के विदेश मंत्री ने भारत को ‘मज़बूत रीढ़ रखने’ और ‘अमेरिकी दबाव के सामने नहीं झुकने’ के लिए कहा था.
भारत पर असर

भारत ईरान से ट्रेड बंद करता है तो 1.68 अरब डॉलर के व्यापार को ही झटका नहीं लगेगा, बल्कि रूस, मध्य एशिया और यूरोप से होने वाले व्यापार पर भी असर पड़ेगा. दरअसल, भारत इन देशों तक ईरान के रूट से ही पहुंचता है.
ईरान में चाबहार बंदरगाह है, जो दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है. इस बंदरगाह के होने से भारत अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के देशों से सीधा व्यापार कर सकता है.
इससे एक फ़ायदा यह भी है कि भारत को पाकिस्तान से गुज़रने वाले रूट का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता.
ईरान से होते हुए ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) भी है. इसके ज़रिये भारत रूस और यूरोप के देशों से जुड़ता है. भारत को लंबे और ख़र्चीले समुद्री मार्गों पर निर्भर नहीं होना पड़ता.
मध्य पूर्व मामलों के जानकार कमर आग़ा ने कहा, “अगर भारत ट्रंप के दबाव में आकर ईरान से व्यापार बंद कर देता है तो ज़ाहिर तौर पर ईरान भी भारत पर सख़्त हो सकता है. ईरान को मजबूरन दूसरे विकल्पों पर विचार करना ही होगा. ईरान चीन से अपनी नज़दीकियाँ बढ़ा सकता है और व्यापार के मार्ग चीन को दे सकता है. चीन इस बात से ख़ुश भी होगा कि भारत बड़े व्यापारिक मार्गों से कट गया.”
पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत ने मनीकंट्रोल को बताया, “हमारे लिए ईरान की स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण है. भारत में शिया आबादी भी बहुत बड़ी है. चाबहार बंदरगाह और आईएनएसटीसी दोनों ही भारत के लिए काफ़ी अहम हैं. अगर ईरान में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका भारत के हितों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.”
“भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क सुचारू रूप से चलते रहें. ईरान में किसी भी प्रकार की बाधा आती है, विशेषकर बुनियादी ढांचे या बंदरगाह प्रभावित होते हैं, तो भारत की क्षेत्रीय रसद और आर्थिक भागीदारी पर सीधा असर पड़ेगा.”
समाचार एजेंसी आईएएनएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, “भारत और ईरान ने 2015 में चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्ती बंदरगाह के विकास में संयुक्त सहयोग के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे.”
“भारत और ईरान का मक़सद चाबहार पोर्ट को एक बड़ा क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय केंद्र बनाना है. यह पोर्ट मानवीय मदद (जैसे भोजन, दवाइयाँ आदि) और कमर्शियल गुड्स को आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में ज़रूरी भूमिका निभाएगा.”
“पहले अमेरिका इस पर सख़्त था, लेकिन हाल ही में भारत को चाबहार बंदरगाह पर परिचालन जारी रखने के लिए छह महीने छूट दी गई. यह प्रतिबंध छूट 29 अक्तूबर से प्रभावी है.”
इस छूट को भारत के लिए एक कूटनीतिक जीत के रूप में देखा गया. लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप के 25% टैरिफ़ के ऐलान ने भारत को इस दिशा में बड़ा झटका दिया है.
भारत के लिए कौन सा रास्ता मुफ़ीद?
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अब सवाल यह उठता है कि भारत के लिए कौन-सी स्थिति मुफ़ीद रहेगी, ट्रंप की बात मानकर ईरान से व्यापार बंद कर देना या अमेरिका के 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ को झेलना?
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, “भारत पहले ही ईरान से तेल लेना बंद कर चुका. अब बाकी व्यापार भी घटा सकता है. पहले से ही भारत और ईरान के बीच व्यापार लगभग न्यूनतम है.”
“भारत ईरान से व्यापार नहीं करने का फ़ैसला करता है, तो यूएई को वैकल्पिक देश के तौर पर देख सकता है. जो चीज़ें ईरान भारत को भेज रहा है, वही यूएई भी भेज सकता है. ट्रंप की 25% टैरिफ़ वाली बात को गंभीरता से लेते हुए भारत को क़दम उठाने चाहिए.”
एके पाशा आगे कहते हैं, “भारत अगर आत्मनिर्भर होना चाहता है तो अमेरिका के दबाव में आकर उसे डरना नहीं चाहिए. भारत ने पहले ही ईरान से सस्ता तेल लेना बंद कर दिया, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबहार पोर्ट पर भी भारत के लाखों डॉलर बर्बाद हुए.”
“रूस से तेल ख़रीदने पर भी अमेरिका मनाही कर चुका है. ट्रंप चाहते हैं कि भारत केवल अमेरिका से ही तेल ख़रीदे जो ईरान और रूस की तुलना में महंगा है. अमेरिका धीरे-धीरे भारत को कमज़ोर कर रहा है.”
“हमें यह निर्णय लेना होगा कि हम स्वतंत्र तौर पर फ़ैसले लेते हैं या अमेरिका के दबाव से प्रभावित होते हैं. अगर भारत अमेरिका को चुनौती देना चाहता है, तो चीन की राह पकड़ते हुए ब्रिक्स के साथ मिलकर कड़े क़दम उठाने चाहिए.”
प्रोफे़सर क़मर आग़ा कहते हैं, “हमारे लिए अमेरिका और ईरान दोनों ही ज़रूरी हैं. भारत के लिए ईरान सिर्फ़ व्यापारिक दृष्टि से ही अहम नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंध भी मज़बूत रहे हैं.”
“दोनों देशों के संबंध सैकड़ों सालों से अच्छे हैं. ईरान से भारत की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है, इसलिए सिर्फ़ ट्रंप के दबाव में आकर एक अच्छे मित्र देश के साथ भारत को अपने संबंध नहीं बिगाड़ने चाहिए.”
किस देश को सबसे ज़्यादा नुक़सान?
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ईरान से व्यापार बंद होने का नुक़सान चीन, यूएई और तुर्की को भी होगा.
वर्ल्ड बैंक के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि ईरान ने सबसे ज़्यादा चीन, यूएई, तुर्की और भारत से व्यापार किया.
2022 में ईरान का कुल व्यापार क़रीब 140 अरब डॉलर था. इसमें ईरान का निर्यात 80.9 अरब डॉलर और आयात 58.7 अरब डॉलर था.
चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
चीन के साथ 2022 में ईरान का 22.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. चीन ट्रंप के दबाव में आता है तो सबसे अधिक नुक़सान उसे ही उठाना पड़ेगा.
इसके बाद यूएई, तुर्की और भारत का नंबर आता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.