इमेज कैप्शन, शाही रसोई लगभग 200 सालों से खाना परोस रही है ….में
लखनऊ की सर्द रात में छोटे इमामबाड़े के भीतर चूल्हे सुलग रहे हैं, कई देग़ चढ़ी हैं. हवा में मसालों की ख़ुशबू है. यहां 48 साल के मुर्तज़ा हुसैन ‘राजू’ चिकनकारी का सफे़द कुर्ता और टोपी पहने कबाब सेंक रहे हैं.
ये छोटे इमामबाड़े का शाही बावर्चीख़ाना है, एक ऐसा बावर्चीख़ाना जहाँ 188 साल से खाना पकाया जा रहा है. इस शाही बावर्चीख़ाने की शुरुआत अवध के नवाब मोहम्मद अली शाह ने 1837 में की थी.
उनके दौर में ये इमामबाड़े का अहम हिस्सा था जहाँ तरह-तरह के पकवान बनते और ग़रीबों में बांटे जाते थे. आज क़रीब दो सदी बाद भी इस शाही बावर्चीख़ाने से उठता हुआ धुंआ थमा नहीं है.
मोहम्मद अली शाह की माँ की बरसी है. बरसी की मजलिस के लिए रात के दो बजे तंदूर में शीरमाल सिक रहा है, एक चूल्हे पर आलू गोश्त, एक में कोरमा पक रहा है तो एक में बिरयानी दम पर लगी है.
कम से कम 5 पकवान ज़रूरी
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इमेज कैप्शन, पिछले कुछ सालों में शाही रसोई का स्ट्रक्चर जर्जर हो गया है
शाही बावर्चीख़ाने के इंचार्ज मुर्तज़ा हुसैन राजू बताते हैं, “तबर्रुक (प्रसाद) में बांटने के लिए जो तोरा तैयार किया जा रहा है उसमें 8 से 10 किस्म के पकवान बन रहे हैं. इनमें रवे का हलवा, ज़रदा, खीर, मटन-आलू का सालन, कोरमा और बिरयानी शमिल हैं. ये सब पूरी रात पकेगा. सुबह इसमें मलाई, दही और दूसरी मिठाइयां भी शामिल की जाएंगी.”
इतिहासकार डॉ रोशन तक़ी बताते हैं कि तोरा एक टेक्निकल लफ़्ज़ है, “कुछ ख़ास डिशेज़ के बिना तोरा पूरा नहीं माना जाता. कम से कम 5 पकवान ज़रूरी होते हैं. कई जगह 7, 9 या 11 पकवान भी इसमें शामिल किए जाते हैं.”
शाही बावर्चीख़ाने में खाना पकते-पकते सुबह हो गई है, चूल्हे की आग धीमी पड़ गई है. घुटवा कबाब को मिट्टी के छोटे छोटे दियों में भरा गया है. इन दियों को बावर्चीख़ाने में सिकोरिया कहते हैं. रातभर पकी खीर मिट्टी की हांडी में रखी है. बावर्चीख़ाने में पके सभी पकवानों को लकड़ी की बड़ी ट्रे, जिसे खान कहा जाता है, उसमें सजाया गया है, ताकि मजलिस में आएं लोगों को और शाही ख़ानदान के घरों में बांटा जाए.
मोहम्मद अली शाह ने सन 1837 में छोटा इमामबाड़ा बनवाया था, इमामबाड़े के दोनों तरफ़ शाही बावर्चीख़ाने बनाये गए थे, जहाँ मोहर्रम के चालीस दिन, रमज़ान के पूरे महीने और कुछ ख़ास मौक़ों पर खाना पकाकर बांटा जाता था.
डॉ रोशन तक़ी बताते हैं, “किंग मोहम्मद अली शाह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ 36 लाख रुपये का एक एग्रीमेंट किया था, जिसके मुताबिक कम्पनी के ख़ज़ाने में जमा इस रक़म के ब्याज से कम्पनी बहादुर को शाही बावर्चीख़ाना उसी तरह चलाना था जैसे नवाबों के वक्त में चलता था, अब हुसैनाबाद ट्रस्ट इस बावर्चीख़ाना को चला रहा है.”
मोहर्रम में बनता है सिर्फ़ वेज खाना
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इमेज कैप्शन, हेड शेफ़ और उनकी टीम जर्जर रसोईघर परिसर में कबाब पकाते हुए
एग्रीमेंट में यह भी था कि कितनी तरह के खाने, कितनी कुज़ीन यहां तबर्रुक के लिए पकाई जाएंगी और किस वज़न की होगी, किस क्वालिटी की होगी. आज भी इस पर सख़्ती से अमल होता है.
मुर्तज़ा हुसैन राजू हाथ से शीरमाल तौलते हुये कहते हैं, “बादशाह के ज़माने में जिस हिसाब से यहां खाना बनता था वैसे ही आज भी बनाया जा रहा है. एक शीरमाल क़रीब 200 ग्राम की और बाकरख़ानी क़रीब 750 ग्राम की बनाई जाती है.”
रोशन तक़ी इस सिलसिले में एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं, “2-3 साल पहले तोरे की शीरमाल का वज़न ग़लती से कम हो गया था. अवध के शाही ख़ानदान ने इस पर नाराज़गी जताई और कहा कि ये मोहम्मद अली शाह की वसीयत और एग्रीमेंट के ख़िलाफ़ है.”
शाही बावर्चीख़ाने की असली रौनक रमज़ान और मोहर्रम में दिखाई देती है. मुर्तज़ा हुसैन राजू बताते हैं, “इन दिनों यहां 20-25 लोग बावर्चीख़ाने में काम करते हैं. पूरी रात 8-10 चूल्हे सुलगते रहते हैं. रातभर खाना पककर सुबह बांटा जाता है. रोटियों के लिए क़रीब आठ तंदूर लगाए जाते हैं जिनमें रातभर रोटी और शीरमाल पकता है.”
मोहर्रम में यहां सिर्फ़ वेज खाना बनता है जिससे सभी धर्मों के लोग तबर्रुक ले पाएं. खाने में चने की दाल, आलू का सालन, रोटी और शीरमाल शामिल होता है.
80 साल के सैय्यद हैदर रज़ा छोटे इमामबाड़े में बचपन से आ रहे हैं. वो कहते हैं, “छुटपन में हम देखते थे कि बड़े बड़े बर्तनों में खाने पक रहे हैं. ये सब इंतज़ाम मोहम्मद अली शाह की तरफ़ से होता है. सभी पेट भरके खाना खाते हैं और कभी कम नही पड़ता.”
सीमेंट का नहीं होता था इस्तेमाल
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इमेज कैप्शन, मुग़ल काल में निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें सीमेंट से भी पुरानी हैं
शाही बावर्चीख़ाना में 188 साल से खाना तो पक रहा है लेकिन यहां की दीवारों और फ़र्श पर वक़्त का असर साफ़ दिखता है. जगह-जगह फ़र्श टूट गया है, प्लास्टर झड़ गया है और लखौरी ईंटें नज़र आ रही हैं.
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की टीम ने सर्वे के बाद यहाँ कंज़रवेशन का काम शुरू किया. आज से 188 साल पहले बादशाह मोहम्मद अली शाह ने जैसे ये बावर्चीख़ाना बनवाया था आज उसी तकनीक से इसका कंज़र्वेशन किया जा रहा है.
सीमेंट का इस्तेमाल भारत में तब शुरू नहीं हुआ था. अवध के नवाबों ने जो भी इमारतें बनवाईं उसमें चूना सुर्ख़ी का इस्तेमाल किया.
एएसआई लखनऊ के सुप्रीटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट आफ़ताब हुसैन ने बीबीसी को बताया, “हेरिटेज बिल्डिंग के कंज़र्वेशन से पहले हम पूरी एनालिसिस और प्रायर स्टडी करते हैं. देखना होता है कि दीवारों के भीतर कोई दरार या ऐसी चीज़ तो नहीं है जो स्ट्रक्चर को डैमेज कर सकती है तो हम उसे भी ट्रेस करके ट्रीट करते हैं. हमारा जो मेन मक़सद होता है मैक्सिमम कंज़र्वेशन मिनिमम इंटरवेंशन.”
शाही बावर्चीख़ाने में लखौरी ईंटों पर मज़दूर प्लास्टर कर रहे हैं. बाहर एक तरफ़ चूना भीगा है और बगल में बेल, उड़द की दाल, गोंद, गुड़ रखा है.
प्लास्टर के लिए चूना एक महीने भिगोया जाता है फिर उसे छानकर उड़द की दाल, बेल का शीरा, गुड़, सुर्ख़ी, गोंद डालकर पैर से मसल-मसल कर मसाला तैयार किया जाता है.
हुनर का काम
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इमेज कैप्शन, मज़दूर एक विशेष प्रकार के गारे का इस्तेमाल करके रसोई को पुरानी तरह से वापस बनाने की कोशिश कर रहे हैं
आर्किटेक्ट आशीष श्रीवास्तव, जो पिछले कई अरसे से पुरानी इमारतों के कंज़र्वेशन का काम कर रहे हैं, इन मैटीरियल की ख़ासियत बताते हैं, “चूने की ख़ास बात यह होती है कि चूने सुर्ख़ी के मसाले की लाइफ़ धीरे-धीरे बढ़ती रहती है और 200 साल तक उसकी स्ट्रेंथ में कमी नहीं आती है क्योंकि उसकी ब्रीथेबिलिटी बढ़ जाती है. जबकि सीमेंट 70 साल से ज़्यादा नहीं चल पाता.”
“वहीं गुड़, शीरा और उड़द की दाल मसाले में लस पैदा करते हैं, एडहेसिवनेस पैदा करते हैं, वर्केबिलिटी को बढ़ाते हैं जिससे कि मसाला लगाने में आसानी होती है.”
इमारत को पुरानी तरह से बनाना, वही शक्ल देना काफ़ी हुनर का काम है. यहां काम करने वाले मिस्त्री और मज़दूर भी ख़ास हैं.
आफ़ताब हुसैन कहते हैं, “अवधी आर्किटेक्चर के जितने भी निशान आप लखनऊ में देखते हैं इनकी अलग पहचान है यह बनाने वाले आर्किटेक्ट अलग थे, इनके ट्रेडिशनल मेसन्स थे. आप देखेंगे कि बड़ा इमामबाड़ा हो या छोटा इमामबाड़ा उसमें बिना पिलर और बीम के लंबे लंबे हॉल बनाए गए हैं. इतने स्पेसिफिक आर्किटेक्चर के मेन फीचर्स जो इसको ज़िंदा रखे हैं वो ट्रेडिशनल मेसन्स हैं. इसलिए हम उन्हीं से काम कराते हैं.”
आशीष श्रीवास्तव के मुताबिक, “ट्रेडिशनल तरीके से कंज़रवेशन महंगा होता है क्योंकि इसमें लेबर बहुत ज़्यादा लगते हैं,उनका मेहनताना भी ज़्यादा होता है लेकिन इसकी अच्छी बात ये भी है कि कार्बन फुटप्रिंट कम हो जाता है.”
शाही बावर्चीख़ाने की पुरानी शक़्ल आने में अभी कुछ महीने और लगेंगे. इसके बाद एएसआई इमामबाड़े के दूसरी तरफ़ बने बावर्चीख़ाने में कंज़रवेशन का काम शुरू करेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.