• Tue. Mar 31st, 2026

24×7 Live News

Apdin News

उस शाही रसोई को कैसे वापस लाया जा रहा है जिसने कभी खाना परोसना बंद नहीं किया

Byadmin

Mar 31, 2026


शाही रसोई लगभग 200 सालों से खाना परोस रही है

इमेज स्रोत, Aman/BBC

इमेज कैप्शन, शाही रसोई लगभग 200 सालों से खाना परोस रही है

लखनऊ की सर्द रात में छोटे इमामबाड़े के भीतर चूल्हे सुलग रहे हैं, कई देग़ चढ़ी हैं. हवा में मसालों की ख़ुशबू है. यहां 48 साल के मुर्तज़ा हुसैन ‘राजू’ चिकनकारी का सफे़द कुर्ता और टोपी पहने कबाब सेंक रहे हैं.

ये छोटे इमामबाड़े का शाही बावर्चीख़ाना है, एक ऐसा बावर्चीख़ाना जहाँ 188 साल से खाना पकाया जा रहा है. इस शाही बावर्चीख़ाने की शुरुआत अवध के नवाब मोहम्मद अली शाह ने 1837 में की थी.

उनके दौर में ये इमामबाड़े का अहम हिस्सा था जहाँ तरह-तरह के पकवान बनते और ग़रीबों में बांटे जाते थे. आज क़रीब दो सदी बाद भी इस शाही बावर्चीख़ाने से उठता हुआ धुंआ थमा नहीं है.

मोहम्मद अली शाह की माँ की बरसी है. बरसी की मजलिस के लिए रात के दो बजे तंदूर में शीरमाल सिक रहा है, एक चूल्हे पर आलू गोश्त, एक में कोरमा पक रहा है तो एक में बिरयानी दम पर लगी है.

कम से कम 5 पकवान ज़रूरी

पिछले कुछ सालों में शाही रसोई का स्ट्रक्चर जर्जर हो गया है

इमेज स्रोत, ASI

इमेज कैप्शन, पिछले कुछ सालों में शाही रसोई का स्ट्रक्चर जर्जर हो गया है

शाही बावर्चीख़ाने के इंचार्ज मुर्तज़ा हुसैन राजू बताते हैं, “तबर्रुक (प्रसाद) में बांटने के लिए जो तोरा तैयार किया जा रहा है उसमें 8 से 10 किस्म के पकवान बन रहे हैं. इनमें रवे का हलवा, ज़रदा, खीर, मटन-आलू का सालन, कोरमा और बिरयानी शमिल हैं. ये सब पूरी रात पकेगा. सुबह इसमें मलाई, दही और दूसरी मिठाइयां भी शामिल की जाएंगी.”

By admin