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‘एक्सप्रेसवे प्रदेश’ कहे जाने वाले यूपी के एक्सप्रेसवे की कई सड़कें क्यों दम तोड़ रही हैं?

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Sep 16, 2026


बीजेपी दावा करती है कि उत्तर प्रदेश अब 'एक्सप्रेसवे प्रदेश' बन गया है. प्रदेश में साल 2017 तक जहां दो एक्सप्रेसवे थे, वहीं 2026 आते-आते यानी पिछले क़रीब दस वर्षों में प्रदेश में कुल एक्सप्रेसवे की संख्या दस हो गई है.

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इमेज कैप्शन, बीजेपी दावा करती है कि उत्तर प्रदेश अब ‘एक्सप्रेसवे प्रदेश’ बन गया है. प्रदेश में साल 2017 तक जहां दो एक्सप्रेसवे थे, वहीं 2026 आते-आते यानी पिछले क़रीब दस वर्षों में प्रदेश में कुल एक्सप्रेसवे की संख्या दस हो गई है

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कों पर बीजेपी के कई होर्डिंग्स लगे हैं. चुनाव नज़दीक है इसलिए ये होर्डिंग्स इन दिनों प्रदेश में ‘डबल इंजन की सरकार’ के कामकाज और उपलब्धियों का ‘बखान’ कर रहे हैं.

ऐसा ही एक होर्डिंग है, जिसमें मुस्कुराते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर है. लिखा है, ”उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे प्रदेश बन गया है.”

इसी होर्डिंंग में यह भी दावा किया गया है कि प्रदेश में साल 2017 तक जहां दो एक्सप्रेसवे थे, वहीं 2026 आते-आते यानी पिछले क़रीब दस वर्षों में प्रदेश में कुल एक्सप्रेसवे की संख्या दस हो गई है.

लेकिन अंग्रेज़ी में एक कहावत है – ‘क्वालिटी मैटर्स मोर दैन क्वांटिटी.’ यानी किसी चीज़ की संख्या या तादाद से ज़्यादा ज़रूरी है उस चीज़ की गुणवत्ता का अच्छा होना.

प्रदेश का मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी, यही कहकर सत्ता पक्ष पर सवाल उठा रहा है.

वीडियो कैप्शन, उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे पर पीएम मोदी, योगी आदित्यनाथ के दावे और ये ज़मीनी हक़ीक़त

गंगा एक्सप्रेसवे पर 66 किलोमीटर की पड़ताल

गंगा एक्सप्रेसवे की तस्वीर

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हमने इसका सूरत-ए-हाल समझने और ख़ुद इसे देखने के लिए इस पर क़रीब 66 किलोमीटर (उन्नाव से रायबरेली) तक का सफ़र तय किया और हमें ऐसे 75 से ज़्यादा स्पॉट्स मिले, जहां या तो मरम्मत का काम चल रहा था या फिर मरम्मत के ताज़ा निशान दिखाई दे रहे थे.

इस पूरे सफ़र के दौरान गाड़ी रोकना, नीचे उतरना, डैमेज और रिपेयर वर्क को कैमरे में दर्ज करना और फिर किलोमीटर मार्कर नोट करना, ये सिलसिला कहीं कुछ मीटर पर, तो कहीं कुछ किलोमीटर पर चलता रहा.

गंगा एक्सप्रेसवे की एक सड़क जहां मरम्मत का कार्य चल रहा था

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इमेज कैप्शन, गंगा एक्सप्रेसवे की एक सड़क जहां मरम्मत का कार्य चल रहा था

हमने उन तमाम जगहों को अपने कैमरे और डायरी में दर्ज करने की कोशिश की.

इस दरमियान निर्माण एजेंसी की गाड़ियां भी लगातार हमारे आसपास रहीं. वह हमें फॉलो करतीं, रुकतीं और हमारी गतिविधियों पर नज़र रखतीं.

निर्माण एजेंसी अडानी ग्रुप और उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज़ औद्योगिक विकास प्राधिकरण, दोनों की तरफ से बारिश को ही एक्सप्रेसवे में आ रही समस्याओं का कारण बताया गया.

किशोर गड्डा

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इमेज कैप्शन, हरदोई-उन्नाव रोड लिमिटेड के प्रतिनिधि किशोर गड्डा ने एक्सप्रेसवे में आ रही गड़बड़ियों के लिए बारिश को ज़िम्मेदार ठहराया

ऐसे में सफ़र के अगले दिन अपने सवालों के साथ हमने निर्माण एजेंसी हरदोई-उन्नाव रोड लिमिटेड के प्रतिनिधि किशोर गड्डा से मुलाक़ात की. यह कंपनी अडानी एंटरप्राइज़ेज़ की ही सहायक कंपनी है.

किशोर गड्डा ने एक्सप्रेसवे में आ रही गड़बड़ी के पीछे की मुख्य वजह बारिश को बताया. उन्होंने कहा, ”ये गड़बड़ियां उन्नाव वाले पैच में ही मिलेंगी क्योंकि इस बार इलाके में बारिश की तीव्रता असामान्य थी और ऐसी बारिश शायद क़रीब 100 साल बाद हुई थी. यह पैच सबसे आख़िर में बना था और इसने अब तक बारिश का मौसम नहीं देखा था इसलिए ऐसे थोड़े बहुत डैमेज सामान्य हैं. हम उनकी मरम्मत भी उतनी ही तीव्रता से कर रहे हैं. और वैसे भी एक्सप्रेसवे की कुल लंबाई के मुकाबले प्रभावित हिस्से बेहद कम हैं, एक प्रतिशत से भी कम.”

जब हमने एक्सप्रेसवे पर दर्ज की गई अपनी तस्वीरों को उन्हें दिखाया और बताया कि प्रभावित हिस्सों की संख्या सीमित नहीं है और गड़बड़ियां केवल उन्नाव पैच में नहीं है, उसके आगे भी है. तब कंपनी के प्रतिनिधि ने कहा, ”जहां-जहां गड़बड़ियां होंगी उस हिस्से की लंबाई 30 से 40 मीटर से ज़्यादा नहीं होगी और यह भारी बारिश के कारण हुई हैं.”

यूपीडा ने मानी कमी

गंगा एक्सप्रेसवे पर मरम्मत का काम

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इमेज कैप्शन, गंगा एक्सप्रेसवे पर मरम्मत का काम

गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज़ औद्योगिक विकास प्राधिकरण यानी यूपीडा की देखरेख में विकसित की गई परियोजना है. इस परियोजना को चार हिस्सों में बांटा गया था. इनमें तीन हिस्सों का काम अडानी समूह और एक हिस्से का काम आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर के पास था. अडानी समूह ने आख़िरी हिस्से का ठेका पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर को दिया था.

इसी हिस्से में सबसे ज़्यादा गड़बड़ियां सामने आई हैं.

गंगा एक्सप्रेसवे के कई साइड स्लोप हमें धंसे हुए नज़र आए. इस स्लोप पर मरम्मत का काम जारी था

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इमेज कैप्शन, गंगा एक्सप्रेसवे के कई साइड स्लोप हमें धंसे हुए नज़र आए. इस स्लोप पर मरम्मत का काम जारी था

हमने इन गड़बड़ियों पर यूपीडा के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीहरि साही से बात की. उन्होंने कैमरे पर आने से तो मना कर दिया, पर कैमरे के बाहर हुई बातचीत में वह कहते हैं, ”शिकायतें खास तौर पर उस हिस्से में ज्यादा सामने आई हैं, जिसका काम अडानी समूह ने ठेके के तहत पटेल इंफ्रास्ट्रक्चर को दिया था. इसलिए वहां काम की गुणवत्ता और उसकी निगरानी, दोनों को देखा जा रहा है.”

”शुरुआती जांच में कुछ जगहों पर सड़क बनाने से पहले मिट्टी को ठीक से दबाने की प्रक्रिया पर्याप्त नहीं दिखाई दी. अलग-अलग जगहों पर मिट्टी की गुणवत्ता भी अलग होती है और अगर उसकी मजबूती का सही आकलन न हो तो सड़क बैठने की समस्या पैदा हो सकती है.”

पर जैसा कि हमने शुरुआत में ही बताया, ऐसी समस्याओं से केवल गंगा एक्सप्रेसवे नहीं जूझ रहा.

क्यों धंसी लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की सड़कें?

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की एक सड़क

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इमेज कैप्शन, लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की एक सड़क

63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की सड़कें उद्घाटन के दो हफ़्ते के भीतर ही कई जगह धंस गईं. सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में मरम्मत किए जा रहे सड़क के हिस्से को पंखों की मदद से सुखाते हुए दिखाया गया. जिससे निर्माण कंपनी और एनएचएआई की बहुत किरकिरी हुई.

हमने मौके पर जाकर उसी हिस्से को देखना चाहा लेकिन अब यहां मरम्मत का काम पूरा हो चुका था. एक्सप्रेसवे के दूसरे हिस्सों में भी जहां नुकसान की खबरें सामने आई थीं, वहां मरम्मत की जा चुकी है.

इतनी लागत से बनी इन सड़कों ने उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद दम क्यों तोड़ दिया?

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इमेज कैप्शन, इतनी लागत से बनी इन सड़कों ने उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद दम क्यों तोड़ दिया?

ऐसे में सवाल है कि इतनी लागत से बनी इन सड़कों ने उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद दम क्यों तोड़ दिया?

निर्माण कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक ने इन समस्याओं के पीछे भी भारी बारिश को एक अहम वजह बताया है.

‘लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को निशाना बनाया गया’

पीएनसी इंफ्राटेक

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कंपनी के नए प्रोजेक्ट मैनेजर विनोद चौहान ने कहते हैं, ”प्रोजेक्ट क़रीब दो साल से बनकर तैयार था, लेकिन उस पर ट्रैफिक नहीं चल रहा था. इस दौरान बारिश होती रही और पानी अंदर जाता रहा. जब अचानक बारिश के समय ट्रैफिक शुरू किया गया तो कुछ जगहों पर समस्या सामने आई. पानी अंदर जाने और उसके रुकने की वजह से सड़क की नीचे की परत भी प्रभावित हुई.”

उन्होंने कहा कि जिन जगहों पर समस्या आई थी, वहां मरम्मत का काम करीब एक हफ्ते से दस दिन में पूरा कर लिया गया था. इसके अलावा क़रीब 34 जगहों पर छोटी-मोटी समस्याएं आई थीं, उन्हें भी ठीक कर दिया गया है.”

विनोद चौहान ने यह भी आरोप लगाया कि लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे से जुड़ी समस्याओं को मीडिया में ज़रूरत से ज्यादा प्रमुखता दी गई और कुछ दूसरे प्रोजेक्ट्स के नुकसान की तस्वीरों को भी इस एक्सप्रेसवे से जोड़कर दिखाया गया.

उन्होंने कहा, ”हमारे प्रोजेक्ट की छोटी-सी समस्या को बहुत बड़ा बनाकर दिखाया गया. दूसरे प्रोजेक्ट्स में इससे ज़्यादा नुकसान हुआ, लेकिन उसकी ख़बर नहीं हुई. कुछ जगह दूसरे प्रोजेक्ट की तस्वीरें भी हमारे नाम से दिखाई गईं. हमारे साइन बोर्ड नीले हैं, जबकि दूसरे प्रोजेक्ट में हरे साइन बोर्ड हैं. इन्हीं चीज़ों से पता चलता है कि तस्वीर हमारे प्रोजेक्ट की नहीं थी. ऐसा लगा कि लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को जानबूझकर निशाना बनाया गया.”

एक्सपर्ट की राय

ज़्यादातर विशेषज्ञ कैमरे पर अपनी राय देने के लिए तैयार नहीं हुए.

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इमेज कैप्शन, ज़्यादातर विशेषज्ञ कैमरे पर अपनी राय देने के लिए तैयार नहीं हुए.

हमने नए एक्सप्रेसवे में आ रही इन समस्याओं के पीछे की तकनीकी वजहों को समझने के लिए सिविल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञों से बात करने की कोशिश की. ज़्यादातर विशेषज्ञ कैमरे पर अपनी राय देने के लिए तैयार नहीं हुए.

आईआईटी-बीएचयू के एक रिटायर्ड प्रोफ़ेसर बात करने को राज़ी हुए, लेकिन पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर.

उन्होंने कहा, ”सड़क धंसने के पीछे की वजह अगर केवल बारिश होती तो पुरानी सड़कें क्यों नहीं धंसतीं? एक्सप्रेसवे में जो गड़बड़ियां आ रही हैं, उसके पीछे की सबसे बड़ी वजह मिट्टी को सही तरह से परत-दर-परत दबाया न जाना हो सकता है. सड़क निर्माण से पहले अगर मिट्टी को सही परत में डालकर, सही नमी के साथ दबाया नहीं गया, तो बारिश का पानी उसके अंदर जा सकता है. इसमें मिट्टी बैठती है और उसके ऊपर बनी सड़क भी बैठ सकती है.”

उनके मुताबिक किसी बड़े प्रोजेक्ट को जल्दी पूरा करने का दबाव भी निर्माण की गुणवत्ता पर असर डाल सकता है. उनका कहना था कि जल्दबाज़ी में मिट्टी की गुणवत्ता, उसे दबाने की प्रक्रिया और पानी की निकासी जैसे बुनियादी इंजीनियरिंग मानकों की पर्याप्त जांच न हो तो उनकी कमियां बारिश के दौरान सामने आ सकती हैं.

पीएनसी इंफ्राटेक पर कार्रवाई

एनएचएआई

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इमेज कैप्शन, प्रोजेक्ट में आई गड़बड़ी के कारण पीएनसी इंफ्राटेक के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई है

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में आई तकनीकी ख़ामियों की जांच के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई ने आईआईटी खड़गपुर की टीम को ज़िम्मेदारी सौंपी है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ शुरुआती जांच रिपोर्ट में कमज़ोर मिट्टी और पानी के फंसने जैसी समस्याओं की तरफ़ इशारा किया गया है. पानी की निकासी और सड़क की बनावट से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा रही है.

प्रोजेक्ट में आई गड़बड़ी के कारण पीएनसी इंफ्राटेक के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई है. एक्सप्रेसवे पर टोल कलेक्शन को मरम्मत पूरी हो जाने तक रोक दिया गया है, पूर्व प्रोजेक्ट मैनेजर और इंडिपेंडेंट इंजीनियर की टीम के मुख्य अधिकारियों को सस्पेंड कर के दो साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है और मामले में कंपनी के ख़िलाफ़ नॉन पर्फॉर्मर नोटिस भी जारी कर दिया गया है.

लेकिन, सिर्फ़ नोटिस जारी होने से कोई कंपनी नॉन-पर्फॉर्मर घोषित नहीं हो जाती. क़ानून के जानकार बताते हैं कि इस प्रक्रिया में वक़्त लगता है, कंपनी को जवाब देने का मौका दिया जाता है और फिर जाकर सक्षम प्राधिकारी के फ़ैसले का इंतज़ार होता है. यानी फ़िलहाल पीएनसी पर फ्यूचर प्रोजेक्ट्स की बिडिंग में हिस्सा लेने पर कोई फ़ाइनल बैन नहीं है. कंपनी के यूपी में दूसरे अन्य प्रोजेक्ट्स भी चल रहे हैं और प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स की बिडिंग में भी वह हिस्सा ले रही है.

उत्तर प्रदेश से बीजेपी के राज्यसभा सांसद नवीन जैन इस कंपनी के पूर्व डायरेक्टर और प्रमोटर हैं.

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इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश से बीजेपी के राज्यसभा सांसद नवीन जैन पीएनसी इंफ्राटेक के पूर्व डायरेक्टर और प्रमोटर हैं

उत्तर प्रदेश से बीजेपी के राज्यसभा सांसद नवीन जैन इस कंपनी के पूर्व डायरेक्टर और प्रमोटर हैं. कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रदीप जैन, नवीन जैन के बड़े भाई हैं. यही कारण है कि विपक्षी दल कंपनी को राजनीतिक संरक्षण मिलने का भी आरोप लगाती हैं.

इन आरोपों पर हमने नवीन जैन से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

प्रयागराज को चित्रकूट से जोड़ने वाले राम वन गमन पथ के एक निर्माणाधीन हिस्से में आई गड़बड़ी के बाद भी पीएनसी इंफ्राटेक का नाम उछाला गया.

हालांकि इस प्रोजेक्ट में अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग कंपनियां काम कर रही थीं. शृंगवेरपुर के पास जिस हिस्से में दरारें और सड़क धंसने की तस्वीरें सामने आईं, वह हिस्सा एस एंड पी इंफ्रा से जुड़ा बताया जा रहा है, न कि पीएनसी के हिस्से का. मामले में संबंधित कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू की गई है.

नए बने एक्सप्रेसवे में सड़क धंसने या स्लोप ढहने जैसी समस्याएं अब बहुत आम हो गई है

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इमेज कैप्शन, नए बने एक्सप्रेसवे में सड़क धंसने या स्लोप ढहने जैसी समस्याएं अब बहुत आम हो गई है

लेकिन पुराने रिकॉर्ड्स देखें तो नए बने एक्सप्रेसवे में सड़क धंसने या स्लोप ढहने जैसी समस्याएं अब बहुत आम हो गई है और यह केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. देश के सबसे महंगे एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट्स जैसे दिल्ली-मुबंई एक्सप्रेसवे, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे में भी ऐसी ही मिलती-जुलती गड़बड़ियां सामने आईं हैं.

बात यूपी की करें तो 2022 में जब बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ, तो उद्घाटन के महज़ एक हफ्ते के भीतर कई जगहों पर सड़कें धंस गईं. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे में भी सड़क का एक हिस्सा धंसने और करीब 15 फीट गहरा गड्ढा बनने की बात सामने आई थी. गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे से भी जुड़ी ऐसी ही ख़बरें और तस्वीरें सामने आ रही हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि जिस उत्तर प्रदेश को यहां की सरकार एक्सप्रेसवे प्रदेश के नाम से प्रचारित कर रही है, वहां के एक्सप्रेसवेस की गुणवत्ता बार-बार सवालों के घेरे में क्यों आ रही है और क्या इन सवालों को केवल ये कहके नज़रअंदाज़ किया जा सकता है, जैसा कि उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने किया – ”कि बारिश में सड़कें धंसना कोई बड़ी बात नहीं. जब सड़क बनेगी तो धंसेंगी भी, धंसेगी तो बनेगी भी.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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