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सन 1986 के जाड़े के दिन थे. भारत के हज़ारों सैनिक पाकिस्तान से लगी भारत की पश्चिमी सीमा की तरफ़ बढ़ रहे थे.
राजस्थान की तरफ़ जाने वाली हर सड़क पर सैनिक वाहनों की लंबी कतारें लगी हुई थीं. रेलवे के वैगन हथियारों, टैंकों और वाहनों को सीमा की तरफ़ ले जा रहे थे.
ऑपरेशन ब्रासटैक्स शुरू हो चुका था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस स्तर का सैनिक अभ्यास पहले कभी नहीं देखा गया था.
प्रोबल दासगुप्ता अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘जनरल ब्रासटैक्स, द सुंदरजी स्टोरी’ में लिखते हैं, “उसी समय पाकिस्तान भी दो तरह के सैनिक अभ्यास कर रहा था, ‘सफ़-शिकन’ और ‘फ़्लाइंग हॉर्स.’ ‘सफ़-शिकन’ में पाकिस्तानी सेना के दक्षिणी इलाके के रिज़र्व सैनिक भाग ले रहे थे और यह राजस्थान सीमा पर बहावलपुर-मारोट इलाके में केंद्रित था. ‘फ़्लाइंग हॉर्स’ में पाकिस्तान में उत्तरी क्षेत्र के पाकिस्तानी रिज़र्व सैनिक भाग ले रहे थे.”
“पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सैनिकों के मूवमेंट पर नज़र रखे हुए थे. इतनी बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों के सीमा की तरफ़ बढ़ने ने उन्हें चिंतित कर दिया था.”
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सुंदरजी ने बनाई थी योजना
आपरेशन ब्रासटैक्स उस समय के सेनाध्यक्ष जनरल सुंदरजी के दिमाग़ की उपज थी. सुंदरजी अमेरिकी सेना की एफ़एम 100-5 यानी वायु और भूमि युद्ध की अवधारणा से प्रभावित थे. उन्होंने उसी को ध्यान में रखते हुए मेकानाइज़्ड इंफ़ेंट्री रेजिमेंट बनाई थी. उन्होंने सेना की कुछ इंफ़ेंट्री डिवीजनों को रीऑर्गनाइज़्ड आर्मी प्लेंस इंफ़ेंट्री डिवीजन (रेपिड) में परिवर्तित कर दिया था.
सुंदरजी चाहते थे कि ये सैनिक अभ्यास नेटो के सैनिक अभ्यास ‘ऑटम फोर्स’ से बड़ा हो. यूरोप में हुए इस अभ्यास में करीब साढ़े बारह हज़ार नेटो सैनिकों ने भाग लिया था. वह इस से चार गुना सैनिकों को इस अभ्यास में शामिल करना चाहते थे.
सैनिक इतिहासकार एयर वाइस मार्शल अर्जुन सुब्रमणियम अपनी किताब ‘इंडियाज़ व़ार्स 2 (1972- 2020)’ में लिखते हैं, “सुंदरजी ने बड़े स्तर पर वायु-भूमि अभ्यास की योजना बनाई थी जिसे तीन चरणों में पूरा किया जाना था और जिसका अंत राजस्थान सेक्टर में सेना के भव्य जमावड़े से होना था. इस अभ्यास में सेना की 1 और 2 कोर को शामिल किया गया था. इसका केंद्र-बिंदु राजस्थान और गुजरात सेक्टर था. अभ्यास का मुख्य उद्देश्य था यह पता लगाना कि रात के अंधेरे में मामूली विरोध के बीच भारतीय सेना कितना और किस तेज़ी से आगे बढ़ सकती है.”
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टी-72 टैंकों का सफल परीक्षण
लेफ़्टिनेंट जनरल प्रवीन बख़्शी उस ज़माने में टी–72 टैकों की रेजिमेंट ‘स्किनर हॉर्स’ में मेजर हुआ करते थे.
उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था, “हमारे टैंकों ने रात में आसानी से 60 किलोमीटर की दूरी तय की. सड़कों पर तो वह दिन में 800 किलोमीटर तक चले. टी-72 टैंको की क्षमता का अधिकतम इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें किसी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा. सिर्फ़ नाइट विजन उपकरण की कमी पाई गई. हमने टैंकों में असली हथियार नहीं भरे इसलिए युद्ध पर जाने का तो सवाल नहीं था. इसका उद्देश्य सिर्फ़ विरोधियों को यह दिखाना था कि हम भविष्य की संभावित लड़ाई के लिए किस हद तक तैयार हैं. भारत के इस कदम ने रावलपिंडी और वॉशिंगटन में ख़तरे की घंटी बजा दी थी और पाकिस्तानी सेना ने जवाब में पंजाब और जम्मू की सीमा की तरफ़ अपने सैनिक बढ़ा दिए थे.”
भारतीय ख़ुफ़िया सूत्रों तक ख़बरें पहुंचने लगी थीं कि पाकिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र के रिज़र्व सैनिक बहावलपुर में अपना अभ्यास करने के बाद अपने बैरकों में नहीं लौटे थे और युद्ध के लिए तैयार स्थिति में बरकरार थे.
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लड़ाकू विमानों ने सीमारेखा पार की
इस अभ्यास में 1986 में भारतीय वायुसेना की एकमात्र इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर की स्कवार्डन 35 ने भी भाग लिया था. इसमें कैनबेरा और मिग-21 लड़ाकू विमान शामिल थे जिनमें थोड़ा बदलाव करके उन्हें स्वीडन में बने ईडब्लू पॉड्स ले जाने लायक बनाया गया था.
सन 1986 के शुरू में पूरी स्कवार्डन को हरियाणा में अंबाला और राजस्थान में बीकानेर के पास नाल ले जाया गया था. ऑपरेशन ब्रासटैक्स के दौरान इन विमानों ने जगुआर और मिग-27 विमानों के अभियानों को एस्कॉर्ट करने में दो महीने बिताए थे.
एयर वाइस मार्शल अर्जुन सुब्रमणियम लिखते हैं, “कई बार इन विमानों ने जान-बूझकर पाकिस्तान एयर डिफ़ेंस की तैयारी का जायज़ा लेने के लिए सीमा रेखा तक पार की थी. जैसे ही रडार चेतावनी रिसीवर्स पर बीप की आवाज़ सुनाई देती या रेडियो पर चेतावनी सुनाई देती वे अपना रुख़ वापस भारतीय सीमा की तरफ़ मोड़ लेते. चूहे और बिल्ली का यह खेल करीब दो महीनों तक चला. जगुआर युद्धक विमानों के इस तरह के कई मिशनों का नेतृत्व फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट आरके भदौरिया ने किया था जो बाद में भारत के वायुसेना के अध्यक्ष बने. वह उस ज़माने में ‘छोटू’ के नाम से मशहूर थे और इस तरह के अभियान में भाग लेने वाले सबसे युवा अफ़सर थे. पाकिस्तान को शक था कि भारत उस पर हमला करने वाला है.”
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कांति बाजपेई अपनी किताब ‘ब्रासटैक्स एंड बियॉन्ड’ में लिखते हैं, “सन 1983-84 में पाकिस्तान के तत्कालीन उप-सेनाध्यक्ष जनरल केएम आरिफ़ और भारत के सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य के बीच इस बात पर सहमति हुई थी कि अगर भारत या पाकिस्तान सीमा के निकट कोई बड़ा सैनिक अभ्यास करते हैं तो वे इसकी सूचना एक दूसरे को देंगे. जनरल सुंदरजी को इस सहमति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इस दौरान दोनों देशों के मिलिट्री ऑपरेशन के निदेशकों के बीच हमेशा चालू रहने वाली हॉट लाइन ने काम करना बंद कर दिया था. दोनों तरफ़ से कई सवाल उठ रहे थे जिनका निवारण करने वाला कोई नहीं था. “
प्रोबल सेनगुप्ता लिखते हैं, “एक बार जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मंत्रिमंडल की बैठक के लिए अपने मंत्रियों को बुलाने के लिए विमान भेजा तो राष्ट्रपति ज़िया ने अनुमान लगाया कि पाकिस्तान पर हमले पर विचार करने के लिए मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई गई है, क्योंकि उस समय भारतीय सैनिक पाकिस्तान की सीमा पर पहले से ही मौजूद थे.”
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पाकिस्तान ने भी अपने सैनिक सीमा पर रवाना किए
पाकिस्तान ने भी इसका जवाब देते हुए अपने सैनिकों को भारतीय पंजाब की तरफ़ रवाना कर दिया. कुछ ही दिनों में दोनों पक्ष लड़ाई की तैयारी करते हुए दिखाई देने लगे.
शुज़ा नवाज़ ने अपनी किताब ‘क्रॉस्ड सौर्ड्स, पाकिस्तान इट्स आर्मी एंड द वॉर विदिन’ में लिखते हैं, “रावलपिंडी में पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय में सोच यह थी कि ब्रासटैक्स के ज़़रिए भारत पाकिस्तान के उत्तर में बहावलपुर और दक्षिण में ख़ैरपुर नगरों को अलग-थलग करने की योजना बना रहा है. इस बात का भी डर था कि भारत सिंध में घुसकर पाकिस्तान को दो हिस्सों में बाँटने और कहूटा में उसके परमाणु रिएक्टर को बरबाद करने पर आमादा है.”
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अभ्यास के लिए रेड और ब्लू टीमें बनाई गईं
इस सैनिक अभ्यास के लिए सैनिक प्रशिक्षण के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल रॉड्रिग्स और उनकी टीम को अंपायर बनाया गया था. प्रोबल दासगुप्ता लिखते हैं, “रेड और ब्लू नाम की दो सेनाएं बनाई गई थीं. रेड टीम पाकिस्तानी सेना का रोल निभा रही थी. इसका कमांडर महू के आर्मी कॉलेज ऑफ़ कॉम्बैट के कमांडेंट लेफ़्टिनेंट जनरल वीएन शर्मा को बनाया गया था. रेड आर्मी ने परमाणु हथियारों का विकल्प इस्तेमाल करने की इजाज़त मांगी थी जिसे अंपायरों ने नामंज़ूर कर दिया था. इस अभ्यास में भारत के कुल 4 लाख सैनिकों, कई विमानों और पोतों ने हिस्सा लिया था.”
1971 की लड़ाई के 15 वर्ष बाद ये पहला मौका था जब दोनों देशों के सैनिक एक दूसरे के इतने करीब पहुंच चुके थे. पूरी दुनिया में तनाव और डर का माहौल था. पश्चिमी विश्लेषकों का मानना था कि सुंदरजी पाकिस्तान को भारत के इस कदम का जवाब देने के लिए उकसा रहे थे ताकि पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई से भारत को पाकिस्तान पर हमला करने का बहाना मिल जाए.
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रेल और सड़क विभाग की भूमिका
जब सुंदरजी ने ब्रासटैक्स की योजना बनाई थी तो इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी कि इस अभ्यास में रेलवे और सड़कों के अत्यधिक इस्तेमाल से ये सेवाएं करीब-करीब ठप्प हो जाएंगी क्योंकि सैनिकों को अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचाने के लिए इनके नेटवर्क को डायवर्ट करना पड़ेगा.
कांति बाजपेई लिखते हैं, “रेल मंत्री माधवराव सिंधिया और सड़क यातायात मंत्री जगदीश टाइटलर ने इस बात पर विरोध प्रकट किया कि सैन्य सामग्री और सैनिकों को पहुंचाने के कारण उनके मंत्रालय को बड़े राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा. उनके विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सैनिक लामबंदी के पैमाने को थोड़ा कम कर दिया था. लेकिन ब्रासटैक्स के सैनिक और राजनीतिक उद्देश्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था.”
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इस अभ्यास पर नज़र रखने के लिए जनरल सुंदरजी ने रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह के साथ बीकानेर के पास सरदारशहर में कई हफ़्ते बिताए थे. लेफ़्टिनेंट जनरल फ़िलिप कम्पोज़ उस ज़माने में वहां मेजर के पद पर तैनात थे.
कम्पोज़ बताते हैं, “एक दिन सुंदरजी एक भूमिगत ऑपरेशन रूम में बिना बताए पहुंच गए. मैंने करीब 30 मिनट तक चीफ़ को ऑपरेशन के बारे में ब्रीफ़ किया. अचानक उन्होंने अपना सिर हिलाया और बाहर खड़े हेलिकॉप्टर पर सवार होने कमरे से बाहर निकल गए. मेरी समझ में नहीं आया कि चीफ़ को मेरी ब्रीफ़िंग पसंद भी आई या नहीं. जब वह हेलिकॉप्टर में चढ़ रहे थे तो उन्होंने मेजर जनरल हरवंत सिंह से पूछा, ‘क्या मैंने तुम्हारे मेजर को ब्रीफ़िंग के लिए शाबाश कहा?”
“हरवंत ने जवाब दिया ‘नहीं सर’, सुंदरजी ने कहा, ‘मेरे लिए उस युवा अफ़सर की पीठ थपथपाए बग़ैर जाना उचित नहीं होगा.’ ऑपरेशन रूम में मैं और मेरे साथी ब्रीफ़िंग के बारे में बात कर रहे थे. मैं अपने साथियों से पूछ रहा था, ‘क्या मेरी ब्रीफ़िंग ठीक-ठाक रही?’ तभी पीछे से आवाज़ आई ‘बिल्कुल ठीक.’ मेरे पीछे का दरवाज़ा खुला और सबने जनरल सुंदरजी को देखा जो ख़ास तौर से हेलिकॉप्टर से वापस ऑपरेशन रूम आए और उन्होंने हम सबको ‘शाबाश’ कहा.”
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जनरल सुंदरजी और जनरल हून में मतभेद
उस समय पश्चिमी कमान के प्रमुख और आपरेशन ब्रासटैक्स का अहम हिस्सा रहे लेफ़्टिनेंट जनरल पीएन हून का मानना है कि ब्रासस्टैक्स का उद्देश्य पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ना था.
सुंदरजी के आलोचक रहे हून अपनी किताब ‘अनमास्किंग सीक्रेट्स ऑफ़ टरब्यूलेंस’ में लिखते हैं, “देश की यातायात व्यवस्था को जिस तरह से मोबलाइज़ किया गया था, वह सिर्फ़ युद्ध की तैयारी में ही होता है. जब मैंने सुंदरजी से पूछा कि क्या प्रधानमंत्री और भारत सरकार को सैनिक अभ्यास के विवरण और प्रगति के बारे में सूचित किया गया है तो उन्होंने तुनक कर जवाब दिया था, ‘पश्चिमी कमान के कमांडर के तौर पर आपका यह काम नहीं हैं कि आप मुझसे पूछें कि सरकार या प्रधानमंत्री को इसके बारे में सूचित किया गया है या नहीं. यह मेरा काम है. इस बारे में जो कुछ ज़रूरी था वह कर दिया गया है.”
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प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को विश्वास में नहीं लिया गया
हून अपनी किताब में दावा करते हैं कि उन्हें पता चल गया था कि प्रधानमंत्री को इस बात की जानकारी नहीं थी कि यह अभ्यास युद्ध जैसी स्थिति में बदल चुका है.
हून लिखते हैं, “मैं 15 जनवरी को सेना दिवस परेड में दिल्ली में मौजूद था. तब राजीव गांधी ने मेरे पास आकर पूछा था , पश्चिमी कमान कैसा कर रही है? मैंने जवाब दिया था ‘सब कुछ योजना के मुताबिक़ चल रहा है और सैनिक ‘बैटल लोकेशन’ की तरफ़ बढ़ रहे हैं. राजीव ने तब मुझसे पूछा, ‘बैटल लोकेशन’ से आपका क्या मतलब है? हम लड़ाई पर कैसे जा सकते हैं ?’ मेरा मानना है कि कहीं तो कुछ गड़बड़ हुई थी. प्रधानमंत्री को इस अभ्यास के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी.”
“जब मैं रेगिस्तान पहुंचा तो मेरे पास परेशान डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन लेफ़्टिनेंट जनरल रवि महाजन का फ़ोन आया. उन्होंने मुझसे कहा कि सुंदरजी दिल्ली में मुझसे तुरंत मिलना चाहते हैं. जब मैं दिल्ली पहुंचा तो सुंदरजी ने मुझसे कहा कि अभ्यास का रुख पूर्व से पश्चिम की बजाए उत्तर से दक्षिण की तरफ़ कर दिया जाए. इसके बाद सैनिकों को बीकानेर वापस बुला लिया गया था.”
कांति बाजपेई लिखते हैं, “जब ऑपरेशन ब्रासटैक्स के जवाब में पाकिस्तान ने अपना सैनिक अभ्यास जारी रखा तो सेना प्रमुखों और रक्षा राज्य मंत्री ने संयुक्त रूप से ये तय किया कि राजीव गांधी को इसकी सूचना न दी जाए. इसके पीछे कारण यह था कि राजीव गांधी अंडमान में छुट्टियां मनाने गए हुए थे. अगर प्रधानमंत्री को इस बारे में सूचित किया जाता और वह अपनी यात्रा बीच में छोड़कर दिल्ली लौट आते और बिना वजह हालात और बिगड़ जाते. प्रधानमंत्री को इस बारे में न बताना शायद निर्णय की ग़लती थी.”
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अरुण सिंह को चुकानी पड़ी कीमत
उस समय राजीव गांधी के मंत्रिमंडल के सदस्य रहे नटवर सिंह अपनी आत्मकथा ‘वन लाइफ़ इज़ नॉट एनफ़’ में लिखते हैं, “एक बार एक बैठक में प्रधानमंत्री, मैं , विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी, एमएल फ़ोतेदार और लेफ़्टिनेंट जनरल हज़ारी मौजूद थे. बैठक के बाद राजीव गांधी ने तिवारी और मुझको रुकने का इशारा किया. फिर तिवारी जी की तरफ़ मुड़ते हुए राजीव ने कहा, ‘मैं अपने रक्षा राज्य मंत्री का क्या करूँ?’ विदेश मंत्री ने मेरी तरफ़ देखा और चुप रहे.”
“फिर राजीव मेरी तरफ़ मुड़े. मैंने कहा, ‘आपको मंत्री को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए.’ राजीव गाँधी का जवाब था, ‘अरुण सिंह दोस्त हैं.’ तब मैंने थोड़ी सख़्ती से कहा, ‘सर, आप दून स्कूल की ओल्ड ब्वॉएज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष नहीं हैं. आप भारत के प्रधानमंत्री हैं और प्रधानमंत्री का कोई दोस्त नहीं होता. कुछ दिनों बाद अरुण सिंह का वित्त मंत्रालय में तबादला कर दिया गया. थोड़े दिनों बाद राजीव गाँधी ने न सिर्फ़ उनका इस्तीफ़ा ले लिया बल्कि उनसे कहा कि वह राज्यसभा की सदस्यता से भी इस्तीफ़ा दे दें.”
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दोनों देश सीमा से सैनिक हटाने के लिए हुए तैयार
दूसरी तरफ़, पाकिस्तान में आधी रात को भारत के उच्चायुक्त एसके सिंह के घर के टेलीफ़ोन की घंटी बजी. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने उन्हें विदेश राज्य मंत्री ज़ैन नूरानी से मिलने को तलब कर लिया था.
इस बैठक में नूरानी ने एसके सिंह को राष्ट्रपति ज़िया का संदेश दिया कि अगर पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया गया तो वह भारत को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है.
माइकल क्रिपॉन और नेट कॉन अपनी किताब ‘क्राइसिस इन साउथ एशिया’ में लिखते हैं, “पाकिस्तान के अपने सैनिक भारतीय सीमा पर बढ़ाने के जवाब में सुंदरजी ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारतीय सैनिकों को रक्षात्मक मुद्रा में खड़ा कर दिया था. यहां तक कि भारत ने अपने रिज़र्व सैनिक भी बुला लिए थे. भारत के इस क़दम से हालात और बिगड़ गए और दोनों देशों के सैनिक जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सीमा पर लगभग आमने-सामने खड़े हो गए.”
“प्रधानमंत्री कार्यालय ने सुंदरजी को निर्देश दिए कि वह संवाददाता सम्मेलन कर भारत के इस कदम के औचित्य के बारे में दुनिया की प्रेस को बताएं. 18 जनवरी, 1987 को रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह और जनरल सुंदरजी ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर कहा कि भारत अग्रिम सीमा से अपने सैनिक हटा लेने के लिए तैयार है बशर्ते पाकिस्तान भी ऐसा ही करे.”
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जनरल ज़िया की भारत यात्रा
इसके तुरंत बाद भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन के बीच हॉटलाइन फिर से बहाल कर दी गई. ब्रासटैक्स के दौरान पूरे 45 दिनों तक इस हॉटलाइन का इस्तेमाल नहीं किया गया था.
कांति बाजपेई लिखते हैं, “इस संवादहीनता ने इन अटकलों को बढ़ावा दिया कि भारत पाकिस्तान पर हमला करना चाहता है. पूरे घटनाक्रम के यथार्थवादी आकलन के बाद ये कहा जा सकता है कि भारत ने जान-बूझकर इस बारे में साफ़गोई नहीं बरती और अपनी ताकत का प्रदर्शन कर पाकिस्तान को हमेशा अनिश्चितता और बेचैनी की स्थिति में रखा.”
21 फ़रवरी, 1987 को पाकिस्तानी वायुसेना के एक विमान ने दिल्ली में लैंड किया. उस पर सवार थे पाकिस्तान के जनरल ज़िया जो जयपुर में हो रहे भारत पाकिस्तान मैच को देखने आए थे. उन्होंने राजीव गांधी से शांति का प्रस्ताव दिया जिसे राजीव गांधी ने स्वीकार कर लिया.
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मीडिया ने इसे क्रिकेट कूटनीति की संज्ञा दी. ऑपरेशन ब्रासटैक्स नवंबर, 1986 में शुरू हुआ और मार्च, 1987 में समाप्त हुआ.
सैनिक विश्लेषकों का मानना है कि ऑपरेशन ब्रासटैक्स ने भारत की सैन्य क्षमता का इतना सटीक प्रदर्शन किया कि उसने पाकिस्तान को अपने परमाणु कार्यक्रम में तेज़ी लाने के लिए मजबूर कर दिया.
उस समय भारत की सेना में 11 लाख सैनिक थे और उसने अपने रक्षा बजट पर करीब आठ अरब डॉलर ख़र्च किए थे जो उनके कुल बजट का 20 फ़ीसदी था. इस सैनिक अभ्यास के मिश्रित परिणाम निकले.
इसने कुछ हद तक पाकिस्तान को तो परेशान किया लेकिन साथ ही साथ इसकी वजह से तिब्बत में चीन भी अपनी सैनिक क्षमता को बढ़ाने के लिए मजबूर हो गया.
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