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विपक्ष ने 10 फ़रवरी, मंगलवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है.
विपक्ष ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान नेता उसके नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को सदन में बोलने से रोका गया.
इसके साथ ही इसमें आठ सांसदों के निलंबन का मुद्दा भी उठाया गया है. बजट सत्र के दौरान हंगामा मचाने के आरोप में लोकसभा के आठ सांसदों को निलंबित कर दिया गया था.
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “पूरे सत्र में जो काम हो रहा है वो संविधान के मुताबिक़ नहीं है. आप जानते हैं लोकतंत्र में सबसे बड़ी जगह संसद है. अगर वहां विपक्ष के नेता को ही बात करने से रोका जाएगा तो फिर बाकी क्या बात की जाए? जनतंत्र के मूल पर ही चोट पहुंचाई जा रही है.”
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इस नोटिस पर विपक्ष के 118 सांसदों ने साइन किए.
ताज़ा विवाद जो अविश्वास प्रस्ताव तक पहुंचा
विवाद शुरू हुआ 4 फ़रवरी से जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सदन में भाषण होना था, लेकिन विपक्ष के लगातार विरोध प्रदर्शन के बाद उनका भाषण नहीं हुआ.
अगले दिन यानी पांच फ़रवरी को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने दावा किया उनके आग्रह पर प्रधानमंत्री मोदी सदन में उपस्थित नहीं हुए.
ओम बिरला ने कहा, “मेरे पास ऐसी पुख़्ता जानकारी आई कि कांग्रेस पार्टी के कई सदस्य प्रधानमंत्री के आसन पर पहुंचकर कोई भी अप्रत्याशित घटना कर सकते थे. अगर यह घटना हो जाती तो यह अत्यंत अप्रिय होता, जो देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को तार-तार कर देती.”
ओम बिरला के इस दावे पर विपक्ष की ओर से तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा कि ‘यह पूरी तरह झूठ है, पीएम को चोट पहुंचाने का सवाल ही नहीं था.’
उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री अब स्पीकर के पीछे छिप रहे हैं, उनमें कल सदन में आने की हिम्मत नहीं हुई.”
“आप सरकार से क्यों नहीं पूछते कि सदन में नेता प्रतिपक्ष को क्यों नहीं बोलने दिया जाता. क्या उनके पास कोई भी आधार है कि वे एक सोर्स का उद्धरण देने से रोक दें, उनके पास ये अधिकार नहीं है. तथ्य यह है कि चर्चा इसलिए नहीं हुई, क्योंकि सरकार चर्चा के लिए तैयार नहीं थी.”
हंगामे की शुरुआत लोकसभा में 2 और 3 फ़रवरी (सोमवार और मंगलवार) को हुई जब कांग्रेस के सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ‘कारवां’ मैगज़ीन में एक अप्रकाशित किताब (फ़ॉर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी) पर छपे लेख के अंश पढ़ने की कोशिश की थी. यह किताब पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद (एमएम) नरवणे ने लिखी है.
राहुल ने जैसे ही इस किताब के बारे में बोलना शुरू किया तो स्पीकर ओम बिरला ने किताब के ‘अप्रकाशित’ होने का हवाला देकर उन्हें बोलने से रोका.
राहुल गांधी जिस अप्रकाशित किताब के कुछ अंश पढ़ रहे थे, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ वह किताब जनवरी 2024 में बाज़ार में आने वाली थी लेकिन भारतीय सेना इस किताब की जांच कर रही है.
विपक्ष के कई नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी को बोलने से रोका जा रहा है तो वहीं भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी के रवैये पर आपत्ति जताई और कहा कि अप्रकाशित किताब के अंश कैसे पढ़े जा सकते हैं.
पहले भी लग चुके हैं आरोप
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ये पहला मौक़ा नहीं है जब विपक्ष और ओम बिरला के बीच तनातनी देखी गई.
इससे पहले भी ओम बिरला विवादों में रह चुके हैं और उन पर विपक्ष सत्ता पक्ष की तरफ़ झुके रहने का आरोप लगा चुका है.
जून 2024 में दूसरी बार लोकसभा स्पीकर चुने जाने के बाद भी ओम बिरला पर आरोप लगा था कि वो विपक्षी सांसदों को बोलने का मौक़ा नहीं दे रहे हैं.
तब राहुल गांधी ने भी कहा था, ”सवाल यह नहीं है कि संसद कितनी शांति से चल रही है. सवाल यह है कि भारत के लोगों की आवाज़ उठाने के लिए कितनी अनुमति मिलती है.”
तब भी ओम बिरला पर ये आरोप विपक्षी दल लगाते रहे हैं कि वो सत्ता के इशारे पर काम करते हैं जबकि स्पीकर का पद संवैधानिक पद है.
एक जुलाई 2024 को राहुल गांधी ने अपने भाषण में ओम बिरला के दोबारा स्पीकर चुने जाने वाले दिन से जुड़े एक वाक़ये का ज़िक्र किया.
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उस दिन स्पीकर चुनाव के बाद राहुल गांधी और पीएम नरेंद्र मोदी ओम बिरला को स्पीकर की कुर्सी तक बैठाकर आए थे.
राहुल गांधी ने कहा, ”स्पीकर सर, आपकी कुर्सी में दो व्यक्ति बैठे हैं. एक लोकसभा स्पीकर, जो भारतीय संघ के स्पीकर हैं. दूसरे ओम बिरला हैं. जब मोदी जी गए और आपसे हाथ मिलाया और जब मैंने हाथ मिलाया तो मैंने एक चीज़ पर ग़ौर किया.”
राहुल बोले, ”जब मैंने आपसे हाथ मिलाया तो आप सीधे खड़े रहे. जब मोदी जी ने हाथ मिलाया तो आप झुक गए और उनसे हाथ मिलाया.”
एनडीए से जुड़े सांसदों ने भी राहुल के बयान पर विरोध जताया था.
इसके बाद स्पीकर ओम बिरला ने कहा, ”माननीय प्रतिपक्ष के नेता, माननीय प्रधानमंत्री सदन के नेता हैं. मुझे मेरी संस्कृति, संस्कार कहते हैं… निजी जीवन में भी, सार्वजनिक जीवन में भी और इस आसन पर भी. जो हमसे बड़े हैं, उनको झुककर नमस्कार करो. मुझे यही सिखाया है. बराबर वालों से बराबर का व्यवहार करो. ”
माइक बंद करने का आरोप
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जून 2024 में ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जब नीट परीक्षाओं के मुद्दे पर बोलने को खड़े हुए तो वो स्पीकर ओम बिरला से माइक देने (ऑन करने) की बात कहते सुनाई दिए.
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ज़रूरी मुद्दों पर माइक छीनकर युवाओं की आवाज़ को दबाया जा रहा है.
हालांकि ओम बिरला राहुल गांधी से लोकसभा में ”माइक बंद नहीं करता हूं, यहां कोई बटन नहीं होता है” कहते हुए भी सुने गए.
18वीं लोकसभा में ओम बिरला के नाम पर एनडीए सरकार ने विपक्ष से सहमति बनाने की कोशिश की थी लेकिन बात नहीं बनी.
इतिहास में इससे पहले ऐसे तीन ही मौके आए हैं जब लोकसभा स्पीकर पद के लिए मतदान हुआ था.
1952, 1967 और 1976 के बाद 2024 में यानी 18वीं लोकसभा में विपक्ष ने कहा कि वह अपना उम्मीदवार उतारेगा.
दीपेंद्र हुड्डा से ख़राब बर्ताव का आरोप
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इस वाकये का वीडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर किया गया और विपक्ष के नेताओं ने भी ओम बिरला के इस व्यवहार पर आपत्ति जताई.
दरअसल, तब चुनाव के बाद संसद में सदस्यता की शपथ लेने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ‘जय हिंद, जय संविधान’ का नारा लगाया था.
उनकी बात सुनकर विपक्ष के सांसदों ने भी ‘जय संविधान’ का नारा लगाया.
इसके बाद जब शशि थरूर स्पीकर से हाथ मिलाकर नीचे उतरने लगे तो सदन को संबोधित करते हुए ओम बिरला ने कहा, “संविधान की शपथ तो ले ही रहे हैं. ये संविधान की शपथ है.”
उनकी इस टिप्पणी का कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने विरोध किया और कहा, “सर इस पर आपको आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी.”
इसके जवाब में ओम बिरला ने कहा, “किस पर आपत्ति और किस पर आपत्ति नहीं, इस पर सलाह मत दिया करो. चलो बैठो.”
स्पीकर की इस टिप्पणी पर दीपेंद्र हुड्डा ने नाराजगी जाहिर की है.
प्रियंका गांधी, संजय सिंह, और अखिलेश सिंह यादव जैसे नेताओं ने भी ओम बिरला के व्यवहार पर आपत्ति जताई थी.
पिछली सरकार में किन कारणों से चर्चा में रहे
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17 वीं लोकसभा में भी स्पीकर ओम बिरला काफी चर्चाओं में रहे थे.
संसद के शीतकालीन सत्र 2023 के दौरान 141 सांसदों को निलंबित किया गया था. इनमें 95 लोकसभा और 46 राज्यसभा सांसद शामिल थे.
इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का निलंबन नहीं हुआ था. इस निलंबन को अभूतपूर्व कहा गया था.
निलंबित किए गए सांसदों में मनोज झा, जयराम रमेश, रणदीप सिंह सुरजेवाला, प्रमोद तिवारी, फ़ारूक़ अब्दुल्लाह, शशि थरूर, मनीष तिवारी, डिंपल यादव जैसे पुराने और दिग्गज शामिल थे.
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संसद में ‘सुरक्षा चूक’ को लेकर सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे, जिसके बाद निलंबन की कार्रवाई की गई थी.
इससे पहले 15 मार्च, 1989 को लोकसभा से 63 सांसदों को निकाला गया था.
ये सांसद इंदिरा गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले आयोग की रिपोर्ट सदन में पेश करने की मांग को लेकर हंगामा कर रहे थे.
ओम बिरला की यात्रा
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ओम बिरला ने कभी राजस्थान के कोटा में स्कूली संसद से अपना सफ़र शुरू किया और फिर यह यात्रा उन्हें भारत की संसद के स्पीकर पद तक ले गई.
शुरू में वे कोटा में गुमानपुरा सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्र संसद के प्रमुख बने थे.
फिर बिरला ने अपनी सक्रियता जारी रखी और एक स्थानीय कॉलेज में छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए दांव लगाया. मगर एक वोट से शिकस्त खा गए.
बिरला ने इस पराजय को भूला दिया और अपने काम में लग गए. वे कोटा में सहकारी उपभोक्ता भंडार संघ के अध्यक्ष चुने गए और यह सार्वजनिक क्षेत्र में उनकी पहली हाजिरी थी.
जानकर कहते हैं, ”वे अवसर हासिल करने और उस मौक़े को अपने हक़ में ढालने की काबिलियत रखते हैं. बिरला ने कॉमर्स विषय में स्नातकोत्तर तक की तालीम हासिल की है. लेकिन इस पढ़ाई के बावजूद वे सियासत के अच्छे विद्यार्थियों में गिने जाते हैं. वे एक ऐसा नेता हैं जो बीजेपी में ज़िला स्तर तक सक्रिय रह कर विधानसभा होते हुए लोकसभा तक पहुंचे है.”
वे तीन बार कोटा से विधायक रहे हैं. उनके विरुद्ध चुनाव लड़ चुके एक नेता ने कहा, ”वे प्रबंध कौशल में निपुण हैं. यह उनकी बड़ी खूबी है.”
पार्टी के भीतर चुनाव प्रबंधन और बूथ स्तर तक कुशल तालमेल के लिए ओम बिरला की बानगी दी जाती है.
वे बीजेपी में युवा मोर्चा के राजस्थान के अध्यक्ष और बाद में मोर्चे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.