डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में युवा इनोवेटर अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर कृषि और अंतरिक्ष जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की चुनौतियों के स्वदेशी समाधान तैयार कर रहे हैं।
कृषि क्षेत्र में जहां इलेक्ट्रिक मशीनों और प्लांट बायोटेक्नोलॉजी के जरिये लागत घटाने, श्रम की कमी दूर करने और उत्पादन बढ़ाने पर काम हो रहा है, वहीं स्टार्टअप और डीप-टेक कंपनियां अंतरिक्ष अभियानों को सस्ता और सुरक्षित बनाने के साथ कक्षीय कचरे की समस्या से निपटने की कोशिश कर रही हैं। इन पहलों में तकनीक के साथ आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास पर भी जोर दिखाई दे रहा है।
तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा भारत का कृषि क्षेत्र
भारत का कृषि क्षेत्र तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। युवा इनोवेटर मजदूरों की कमी, बढ़ती लागत और टिकाऊ उत्पादन जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए इलेक्ट्रिक खेती की मशीनों से लेकर उन्नत प्लांट बायोटेक्नोलाजी तक पर काम कर रहे हैं। इन पहलों में छोटे और मंझोले किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कम लागत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक विकसित करने पर जोर है।
पुणे की डीप-टेक स्टार्टअप शास्त्रत्व टेक्नोलाजीज ‘सक्षम ई1एस’ नाम का पूरी तरह इलेक्ट्रिक गन्ना कटाई प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है। भारत में लाखों किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं, लेकिन मजदूरों की कमी और कटाई की बढ़ती लागत बड़ी चुनौती है।
कंपनी के सह-संस्थापक अथर्व महेंद्र पाटकी के मुताबिक मौजूदा कई गन्ना हार्वेस्टर ट्रैक्टर से जुड़े होते हैं, जबकि सक्षम ई1एस को पूरी तरह इलेक्ट्रिक और खुद चलने वाला बनाया जा रहा है। इसका वजन और कीमत भी कम रखने की कोशिश है, ताकि छोटे और मंझोले किसान इसका इस्तेमाल कर सकें।
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मशीनों तक सीमित नहीं कृषि नवाचार का दायरा
कृषि नवाचार का दायरा मशीनों तक सीमित नहीं है। पुणे की राइस ‘एन शाइन बायोटेक दो दशक से अधिक समय से प्लांट बायोटेक्नोलाजी के क्षेत्र में काम कर रही है। कंपनी टिश्यू कल्चर और आधुनिक रिसर्च तकनीकों से फल, फूल और बागवानी फसलों के लिए रोपण सामग्री तैयार करती है।
कंपनी की चार व्यापारिक प्रयोगशालाओं में हर साल पांच करोड़ से अधिक पौधे तैयार होते हैं। इनमें करीब चार करोड़ केले के पौधे शामिल हैं। कंपनी अपने उत्पाद 42 देशों में निर्यात करती है और करीब 1,500 महिलाओं को रोजगार देती है।
अंतरिक्ष की चुनौतियों को टक्कर दे रहे युवा स्टार्टअप
भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल सरकारी संस्थाओं तक सीमित नहीं है। इसरो के साथ युवा स्टार्टअप भी नई तकनीकों के जरिये अंतरिक्ष अभियानों को किफायती बनाने और कक्षीय कचरे की चुनौती से निपटने में जुटे हैं। हैदराबाद में विकसित टी-वर्क्स जैसे इनोवेशन हब युवा इंजीनियरों और स्टार्टअप को प्रोटोटाइप तैयार करने, उनका परीक्षण करने और तकनीक को बाजार के लिए तैयार उत्पाद में बदलने की सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं।
टी-वर्क्स के स्टार्टअप वर्टिकल के प्रमुख सहज के अनुसार, यहां कंपनियों को उन्नत मशीनरी, प्रोटोटाइपिंग सुविधाओं और टेस्टिंग लैब का लाभ मिल रहा है। राज्य सरकार के सहयोग से कुछ स्टार्टअप को तकनीकी परीक्षण की सुविधाएं बिना अतिरिक्त खर्च के भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।
इसी इकोसिस्टम में काम कर रही स्पैंट्रिक कंपनी रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम विकसित कर रही है। इसका उद्देश्य उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने की लागत कम करना है। कंपनी रॉकेट इंजन, फ्लाइट कंप्यूटर, एवियोनिक्स और गाइडेंस सिस्टम जैसी तकनीक खुद विकसित करने पर काम कर रही है। को-फाउंडर हितेंद्र सिंह के मुताबिक, पहल का उद्देश्य अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाना है।
दूसरी ओर, कास्मोसर्व अंतरिक्ष कचरे की समस्या का समाधान तलाश रही है। निष्क्रिय उपग्रह और राकेट के हिस्से कक्षाओं में सक्रिय मिशनों के लिए खतरा बन सकते हैं। कंपनी ऐसा स्वचालित उपग्रह सिस्टम विकसित कर रही है, जो कचरे की निगरानी कर रोबोटिक आर्म की मदद से उसे पकड़ सके। टीम के अनुसार, आर्म को अलग-अलग वस्तुओं के आकार और स्थिति के मुताबिक अपनी पकड़ बदलने में सक्षम बनाया जा रहा है।
(समाचार एजेंसी एएनआई के इनपुट के साथ)