इमेज स्रोत, ANI
उत्तराखंड में केदारनाथ, बद्रीनाथ समेत 47 मंदिरों में ग़ैर हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का प्रस्ताव लाने की चर्चा हो रही है. मंदिर समितियों ने ‘धार्मिक पवित्रता और परंपराओं को बनाए रखने’ का हवाला देकर यह प्रस्ताव लाने की बात की है.
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों, नागरिक अधिकार संगठनों और मुस्लिम संगठनों ने इस प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं.
उनका आरोप है कि यह राज्य की बीजेपी सरकार के अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान का हिस्सा है.
जबकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि धार्मिक और पौराणिक स्थलों का संचालन करने वाले धार्मिक संगठन, तीर्थ सभाएं और संत समाज जो भी राय देंगे, सरकार उसी के अनुसार आगे बढ़ेगी.
क्या है मामला?
इमेज स्रोत, Hemant Dwivedi/Facebook
बद्री-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का कहना है कि लंबे समय से यह मांग उठाई जा रही थी कि सभी धामों और विशेष स्थानों पर ग़ैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित हो.
हेमंत द्विवेदी के अनुसार, “तमाम तरह के असामाजिक तत्व जैसे लैंड जिहाद और अवैध मज़ार वाले लोगों ने यहां की फ़िज़ा और वातावरण को बिगाड़ने की कोशिश की है. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर श्री बद्री केदार मंदिर समिति ने यह निर्णय लिया है.”
उन्होंने बताया कि बद्री-केदार मंदिर समिति के अंतर्गत बद्रीनाथ, केदारनाथ समेत कुल 47 मंदिर हैं. समिति का प्रस्ताव है कि इन सभी स्थानों पर एक सीमा तय कर दी जाएगी, जहां तक ग़ैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित होगा. उनका कहना है कि इससे श्रद्धा और आस्था की परंपरा बनी रहेगी.
द्विवेदी के अनुसार, गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिर समिति ने यह व्यवस्था पहले ही लागू कर दी है.
इसी संदर्भ में गंगोत्री धाम मंदिर समिति के सचिव सुरेश सेमवाल ने बीबीसी हिन्दी को बताया, “गंगोत्री धाम को लेकर सभी पुरोहितों और मंदिर समिति ने आपस में बैठकर निर्णय लिया है. यह प्रतिबंध सिख धर्म के लोगों के लिए नहीं है.”
वहीं हेमंत द्विवेदी का कहना है कि इस मुद्दे पर फ़रवरी के पहले हफ्ते में होने वाली बोर्ड बैठक में औपचारिक प्रस्ताव लाया जाएगा, जिसके बाद इसे सरकार को भेजा जाएगा.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मुद्दे पर कहा है कि धार्मिक और पौराणिक स्थलों का संचालन करने वाले धार्मिक संगठन, तीर्थ सभाएं और संत समाज जो भी राय देंगे, सरकार उसी के अनुसार आगे बढ़ेगी.
मुख्यमंत्री के अनुसार, ये स्थल अत्यंत पौराणिक महत्व के हैं और पहले से ही इनके संचालन को लेकर कुछ क़ानून मौजूद हैं. सरकार उनका अध्ययन कर रही है और उसी आधार पर आगे का निर्णय लिया जाएगा.
आवागमन की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक प्रतिबंध
इमेज स्रोत, Asif Ali
उत्तराखंड हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील कार्तिकेय गुप्ता का कहना है कि इस तरह के किसी भी प्रतिबंध को संविधान का समर्थन हासिल नहीं है.
उन्होंने कहा, “अनुच्छेद 19 संविधान का इकलौता ऐसा प्रावधान है, जहां आवागमन की स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध लगाया जा सकता है. हालांकि अनुच्छेद 19 आवागमन की स्वतंत्रता देता है, लेकिन उसमें दो स्थितियां तय की गई हैं. पहली, जब सरकार ऐसा क़ानून बनाए जिससे सामान्य जनहित (जनरल पब्लिक इंटरेस्ट) की रक्षा होती हो. दूसरी, जब अनुसूचित जनजातियों (शेड्यूल ट्राइब) के हितों की रक्षा का सवाल हो. इन दोनों के अलावा भारत में कोई तीसरा आधार नहीं है, जिसके तहत आवागमन की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा सके.”
कार्तिकेय गुप्ता के अनुसार, “जो भी नियम इस समय बनाए जा रहे हैं, वे सभी असंवैधानिक हैं, क्योंकि इनमें किसी भी तरह से सामान्य जनहित की पूर्ति नहीं होती. उदाहरण के तौर पर, कोरोना महामारी के दौरान आवागमन की स्वतंत्रता पर रोक लगाई गई थी, क्योंकि वह अनुच्छेद 19 में दी गई परिस्थितियों के अंतर्गत आता था. लेकिन अगर सामान्य जनहित को कोई नुकसान नहीं हो रहा है, तो भारत का हर नागरिक देश की हर गली में जाने के लिए स्वतंत्र है, चाहे वह मंदिर हो या मस्जिद. अगर भविष्य में मस्जिदों को लेकर भी ऐसा कोई नियम बनाया जाता है, तो वह भी ग़लत होगा.”
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार क़ानून बना सकती है, लेकिन उसके लिए भी वही दो शर्तें लागू होती हैं, सामान्य जनहित या अनुसूचित जनजातियों का हित, “सरकार धार्मिक स्थलों में मनमाने ढंग से दखल नहीं दे सकती. यहां किसी भी तरह का सामान्य जनहित नहीं है. यह केवल एक विशेष समुदाय का हित है, और किसी एक समुदाय के हित के आधार पर अनुच्छेद 19 के तहत आवागमन की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का कोई प्रावधान संविधान में मौजूद नहीं है.”
चुनाव, ध्रुवीकरण और राजनीतिक आरोप
इमेज स्रोत, Mahavir Negi
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक एसएमए काज़मी का कहना है कि अगले ग्यारह महीनों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हरिद्वार और चारधाम से जुड़े ये मुद्दे सीधे तौर पर राजनीति से प्रेरित हैं. 2022 के विधानसभा चुनावों में यह डर पैदा किया गया था कि मुसलमान पहाड़ों की ओर जा रहे हैं. राष्ट्रीय नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं तक ने इस मुद्दे को उछाला और इसका राजनीतिक फ़ायदा भी उठाया गया.
उसी क्रम में अलग-अलग “जिहाद” से जुड़े नैरेटिव खड़े किए गए और अब हरिद्वार और चारधाम मंदिरों का मुद्दा सामने है.
वह कहते हैं कि कुछ मुसलमान घोड़े-खच्चर के ज़रिए तीर्थ यात्रियों को केदारनाथ जैसे दुर्गम स्थलों तक पहुंचाते हैं या फिर टैक्सी चालक के रूप में श्रद्धालुओं को इन तीर्थों तक लाते-ले जाते हैं. अगर प्रतिबंध लागू होता है तो यह केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रहकर आजीविका और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है.
मुस्लिम सेवा संगठन, उत्तराखंड, के अध्यक्ष नईम कुरैशी का कहना है कि मंदिरों में ग़ैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर उठी यह चर्चा सरकार की मुसलमानों के ख़िलाफ़ अपनाई जा रही नीति को ज़मीनी स्तर पर उजागर करती है. इस तरह के प्रस्ताव पूरी तरह असंवैधानिक हैं और समाज को धार्मिक आधार पर बांटने वाली मनुवादी सोच को आगे बढ़ाने का काम करते हैं.
सरकार पर ध्यान भटकाने का आरोप
इमेज स्रोत, Ganesh Godiyal/Facebook
उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस पूरी कवायद को प्रदेश के मूलभूत और ज्वलंत सवालों से जनता का ध्यान भटकाने का एक राजनीतिक हथकंडा बताया है.
उन्होंने सवाल उठाया कि जब उत्तराखंड में गांव के गांव खाली हो रहे हैं, बड़े पैमाने पर पलायन जारी है, बेरोज़गारी चरम पर है, महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं, जंगली जानवरों का आतंक बढ़ता जा रहा है और लगातार भर्ती घोटालों की खबरें सामने आ रही हैं, तो इन मुद्दों पर जवाब देने के बजाय सरकार हर बार की तरह इस बार भी समाज को बांटने की राजनीति का सहारा क्यों ले रही है.
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि उत्तराखंड में सत्ता के शीर्ष पर बैठे कई लोग, संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति और प्रशासनिक अधिकारियों में भी बड़ी संख्या में ग़ैर हिंदू शामिल हैं. ऐसे में क्या ये कथित निर्देश उन पर भी लागू होंगे?
भाकपा (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी का कहना है कि सैकड़ों वर्षों से इन धार्मिक स्थलों का अस्तित्व रहा है और इतिहास में कभी इस तरह की पाबंदी लगाने की जरूरत महसूस नहीं की गई. उन्होंने कहा कि आज भी समाज को ऐसी किसी पाबंदी की आवश्यकता नहीं है.
इंद्रेश मैखुरी ने आरोप लगाते हुए कहा, “इस फैसले के ज़रिये धार्मिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि समाज में वैमनस्य और फूट पैदा कर अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए उठाए जा रहे ऐसे कदमों पर तत्काल लगाम लगाए जाने की ज़रूरत है.”
‘भाईचारे को तोड़ने का काम होगा’
इमेज स्रोत, Getty Images
इश्तियाक़ अहमद उत्तरकाशी में जनरल स्टोर चलाते हैं. उन्हें हाल ही में अखबारों के माध्यम से इस बारे में जानकारी मिली है.
उनका कहना है कि मंदिरों में ग़ैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित करने जैसा कोई भी निर्णय इस आपसी भाईचारे को तोड़ने का काम करेगा.
इश्तियाक़ बताते हैं, “उत्तरकाशी और चारधाम यात्रा मार्ग पर मुस्लिम वाहन चालक भी हैं. ऐसे में अगर किसी तीर्थ यात्री के मन में यह धारणा बनती है कि मुसलमानों का मंदिर में प्रवेश प्रतिबंधित है, तो वह शायद किसी मुस्लिम गाड़ी चालक की गाड़ी में बैठने से भी हिचके.”
“चारधाम यात्रा के दौरान तीर्थ यात्रियों को खच्चरों के माध्यम से भी धामों तक ले जाया जाता है और इनमें कई खच्चर संचालक मुसलमान हैं. ऐसे में यात्रियों के मन में यह सवाल भी आ सकता है कि जब धाम में मुस्लिम का प्रवेश वर्जित है, तो वे किसी मुस्लिम खच्चर संचालक की सेवा क्यों लें?”
इसके अलावा, यात्रा मार्ग पर मुसलमानों की कई दुकानें भी हैं.
उन्होंने कहा, “हमारी गंगोत्री धाम में गहरी आस्था है और हम वहां जा चुके हैं. हमारा पूरा बचपन मंदिरों के आसपास ही बीता है. हम अपने हिंदू मित्रों के साथ उत्तरकाशी में स्थित विश्वनाथ मंदिर भी जाते थे और कभी मन में किसी तरह का भेदभाव या दूरी का भाव नहीं आया.”
इश्तियाक़ कहते हैं, “कुछ लोगों द्वारा फैलाए जा रहे ऐसे संदेश समाज में दूरी बढ़ाने का प्रयास हैं. ऐसे लोग यह नहीं समझते कि भगवान एक ही है, बस उसके रूप अलग-अलग हैं.”
क्या कहती हैं दो अहम रिपोर्ट
इमेज स्रोत, Getty Images
अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित एक ग़ैर-सरकारी संस्थान ने भारत में नफ़रती भाषण या हेट स्पीच पर एक रिपोर्ट जारी की है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2025 में भारत में कुल 1318 प्रत्यक्ष नफ़रती भाषण दर्ज किए गए. वहीं, 2024 की तुलना में यह 13 फ़ीसदी और 2023 की तुलना में 97 फ़ीसदी की बढ़ोतरी है.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी नफ़रती भाषण देने के मामले में शीर्ष पर हैं और सबसे ज़्यादा किसी राज्य में नफ़रती भाषण दर्ज किए गए हैं तो वह उत्तर प्रदेश है. बीजेपी ने इस रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज किया है.
21 जनवरी 2026 को एसोसिएशन ऑफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स ने प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में अपनी फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जारी की.
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 के बाद से उत्तराखंड में दक्षिणपंथी हिंदुत्व समूहों ने मुसलमानों को निशाना बनाते हुए नफ़रत, हिंसा और आर्थिक बहिष्कार को बढ़ावा दिया है, जिससे डर और असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.