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रूस के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि तेल की क़ीमतों में बढ़ोतरी और अमेरिका द्वारा रूसी ऊर्जा निर्यातकों पर लगाए गए प्रतिबंधों में अस्थायी ढील से रूस को ज़्यादा कमाई करने का मौक़ा मिलेगा. इसका सीधा मतलब यह है कि देश के बजट की आमदनी बढ़ेगी.
पिछले कुछ महीनों से रूस आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका और इसराइल का ईरान के साथ युद्ध रूस की इन समस्याओं को हल कर सकता है? इस सवाल का जवाब काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि मध्य पूर्व में यह युद्ध किस दिशा में जाता है और तेल की ऊंची क़ीमतों का दौर कितने समय तक बना रहता है.
युद्ध के पहले हफ़्ते में बाज़ार काफ़ी हद तक शांत नज़र आया. क़ीमतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं, लेकिन न तो बाज़ार में घबराहट दिखी और न ही क़ीमतों में कोई अचानक उछाल आया. ज़्यादातर विश्लेषकों को उम्मीद थी कि यह युद्ध जल्दी ख़त्म हो जाएगा.
लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता गया, इस टकराव के लंबे समय तक चलने की आशंका भी बढ़ती गई. इसी बीच दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापारिक रास्तों में से एक, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संभावित रुकावट की चिंता ने हालात को और गंभीर बना दिया.
विश्लेषण एजेंसी ‘आर्गस’ ने बीबीसी से बातचीत में बताया है कि रूसी तेल ‘यूराल्स’ की क़ीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है. युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक इसकी क़ीमत 70 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ चुकी है.
रूस से भारत भेजे जाने वाले तेल की खेपों की क़ीमतों में सबसे ज़्यादा उछाल देखा गया है. भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने वाले रूसी कच्चे तेल ‘यूराल्स’ की क़ीमत अब 98 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई है.
इतिहास में कच्चे तेल की सबसे बड़ी रुकावट
ईरान के तेल वैश्विक आपूर्ति में लगभग 3.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है और इसकी सप्लाई में रुकावट से दुनिया के तेल बाज़ार के संतुलन पर बहुत बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है.
फ़िलहाल बाज़ार की स्थिति को प्रभावित करने वाला सबसे अहम कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही का रुकना है.
साल 2025 में दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का क़रीब एक-चौथाई हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुज़रता था और वैकल्पिक रास्तों से तेल भेजने की गुंजाइश बहुत सीमित है.
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28 फ़रवरी को युद्ध शुरू होते ही होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही लगभग ठप हो गई. बीमा कंपनियों ने या तो बीमा प्रीमियम बढ़ा दिए, या फिर इस रास्ते से गुज़रने वाले जहाज़ों का बीमा करने से ही इनकार कर दिया. युद्ध के जोखिम से जुड़ा बीमा शुल्क भी तेज़ी से बढ़ गया है.
विश्लेषकों का कहना है कि अब सिर्फ़ गिने-चुने तेल टैंकर ही इस जलडमरूमध्य से गुज़र रहे हैं, जिनमें से कुछ पहले से ही प्रतिबंधों के दायरे में हैं.
वैश्विक व्यापार बाज़ार पर नज़र रखने वाली विश्लेषण कंपनी ‘कैपलर’ के मुताबिक़, होर्मुज़ जलडमरूमध्य का बंद होना आधुनिक इतिहास में कच्चे तेल की आपूर्ति में आने वाली सबसे बड़ी रुकावटों में से एक माना जा सकता है.
ईरान सालों से अपने प्रतिद्वंद्वियों को होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद करने की धमकी देकर दबाव में रखता रहा है, लेकिन कभी इस धमकी को अमल में नहीं लाया. इस बार भी यह जलडमरूमध्य आधिकारिक तौर पर बंद नहीं किया गया है.
कैपलर का मानना है कि जलडमरूमध्य के औपचारिक रूप से बंद होने की संभावना बहुत कम है. कंपनी के आकलन के अनुसार, अगर ऐसा होता भी है तो अमेरिका संभवतः कुछ ही घंटों के भीतर सैन्य कार्रवाई कर ईरान की उस क्षमता को ख़त्म कर देगा, जिससे वह इस रास्ते को ख़तरे में डाल सकता है.
इसके अलावा, जलडमरूमध्य के बंद होने से चीन भी ईरान के सामने खड़ा हो सकता है, क्योंकि चीन के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल आयात का क़रीब 38 प्रतिशत हिस्सा फ़ारस की खाड़ी से आता है.
एशियाई देश होर्मुज़ जलडमरूमध्य के ज़रिए होने वाले तेल परिवहन पर सबसे ज़्यादा निर्भर हैं. साल 2025 में इस जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला लगभग 80 प्रतिशत तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इसी क्षेत्र के लिए भेजा गया था.
तेल बाज़ार के लिए दूसरा बड़ा ख़तरा ईरान के निर्यात ढांचे पर किए जाने वाले लक्षित हमले हो सकते हैं. इनमें खार्ग द्वीप भी शामिल है, जहां ईरान का सबसे बड़ा तेल टर्मिनल स्थित है, या फिर समुद्री लोडिंग सिस्टम. विश्लेषण कंपनी ‘वोर्टेक्सा’ के मुताबिक़, ऐसे हमलों से तेल की आपूर्ति का एक हिस्सा बहुत तेज़ी से बाज़ार से बाहर हो सकता है.
तेल बाज़ार में आगे क्या हो सकता है?
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तेल बाज़ार की स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य कितने समय तक बंद रहता है. विशेषज्ञों के आकलन अलग अलग हैं और इनमें से ज़्यादातर अनुमान मध्य पूर्व में जारी टकराव की दिशा पर टिका हुआ है.
विश्लेषण कंपनी ‘कैपलर’ के विशेषज्ञों का सबसे संभावित अनुमान यह है कि यह युद्ध ईरान के पड़ोसी देशों तक नहीं फैलेगा और मार्च के अंत या अप्रैल के मध्य तक ख़त्म हो सकता है. उनके मुताबिक़, इस साल ब्रेंट कच्चे तेल की औसत क़ीमत क़रीब 66.8 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है.
युद्ध के पहले हफ़्ते में क़ीमतों में जो बढ़ोतरी देखने को मिली, वह विश्लेषकों की उम्मीदों के अनुरूप ही थी. यह बढ़ोतरी सीमित रही और ज़्यादातर उन जोखिमों को दर्शाती थी जो जनवरी और फ़रवरी में बाज़ार में बन चुके थे और जिनका असर क़रीब 20 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था.
कैपलर के विश्लेषकों का कहना है कि अल्पकाल में, ख़ासकर मार्च के महीने में, तेल बाज़ार में उतार-चढ़ाव और क़ीमतों में तेज़ उछाल देखने को मिल सकता है. उनके अनुसार, सबसे ख़राब स्थिति में अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में चार हफ़्तों से ज़्यादा समय तक जहाज़रानी पूरी तरह रुकी रहती है, तो तेल की क़ीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.
कंपनी के विश्लेषक यह भी याद दिलाते हैं कि इस साल अमेरिका में नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप देश के भीतर पेट्रोल की क़ीमतें बढ़ने से रोकने को लेकर बेहद संवेदनशील हैं. इसी वजह से संभावना है कि अमेरिका हालात को और ज़्यादा बिगड़ने से रोकने की कोशिश करेगा.
वहीं, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ‘फ़िच’ का अनुमान है कि यह युद्ध संभवतः एक महीने से कम समय तक ही चलेगा.
पत्रिका ‘ब्लूमबर्ग’ का अनुमान है कि अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है, तो तेल की क़ीमतें बढ़कर क़रीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. सबसे ख़राब स्थिति में यह ऊंचा स्तर इस साल की चौथी तिमाही तक बना रह सकता है.
अगर हालात अपेक्षाकृत कम तनावपूर्ण रहते हैं, तो तेल की क़ीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास घूमती रहेंगी. और अगर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव रोकने को लेकर कोई समझौता हो जाता है, तो क़ीमतें घटकर क़रीब 65 डॉलर तक आ सकती हैं.
फ़िलहाल बाज़ार में तेल की आपूर्ति मांग से ज़्यादा है और यही बुनियादी कारक लंबे समय में, अगर संघर्ष थम जाता है, तो तेल की क़ीमतों में गिरावट की वजह बन सकते हैं. इसके अलावा, तेल उत्पादक देशों का समूह ओपेक प्लस अप्रैल से उत्पादन बढ़ाने जा रहा है, हालांकि इस गठबंधन के दो सदस्य- संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत ने युद्ध की वजह से अपने उत्पादन में कटौती करने की बात कही है.
साल 2025 तक वैश्विक तेल भंडार 2021 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुके हैं. ये भंडार होर्मुज़ जलडमरूमध्य के ज़रिए तेल की आवाजाही पूरी तरह रुकने की स्थिति में भी 400 दिनों से ज़्यादा तक इसकी भरपाई कर सकते हैं.
विश्लेषण कंपनी ‘वोर्टेक्सा’ के मुताबिक़, अगर तेल की आपूर्ति में गंभीर रुकावट आती है, तो अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी अफ्रीका से भेजा जाने वाला तेल बाज़ार में आई कमी को पूरा कर सकता है.
इस समय सबसे ज़्यादा मुश्किल में भारत के फंसने की आशंका दिख रही है, क्योंकि देश के पास मौजूद तेल भंडार केवल क़रीब 20 दिनों के लिए ही काफ़ी हैं.
निवेश बैंक ‘सिटीग्रुप’ के विश्लेषकों ने 3 मार्च को अनुमान जताया था कि क़ीमतों में उछाल के बाद, ब्रेंट कच्चे तेल की क़ीमत दूसरी तिमाही में घटकर 70 डॉलर रह सकती है और 2026 के दूसरे हिस्से में यह और गिरकर 62 डॉलर तक पहुंच सकती है.
वहीं, 2 मार्च को पत्रिका ‘आरबीके’ से बातचीत करने वाले विश्लेषकों का मानना है कि 2026 की दूसरी तिमाही में रूसी तेल ‘यूराल्स’ की क़ीमत कम से कम 40 डॉलर प्रति बैरल रहेगी.
बाज़ार कारोबारी रोमान आंद्रियेव के मुताबिक़, पिछले दस सालों में ईरान से जुड़े संघर्षों पर बाज़ार की प्रतिक्रिया हर बार सीमित होती गई है. औसतन देखा जाए तो क़रीब दो हफ़्तों के भीतर तेल की क़ीमतें फिर अपने पुराने स्तर पर लौट आती हैं और औसत बढ़ोतरी लगभग 12 प्रतिशत के आसपास रहती है.

इस हालात का रूस के बजट पर क्या असर पड़ेगा?
रूसी सरकार का अनुमान है कि साल 2026 में देश का बजट घाटे में जाएगा और यह घाटा 3,700 अरब रूबल से भी ज़्यादा हो सकता है. सरकार पहले ही आय बढ़ाने के लिए एक अहम टैक्स- वैट (मूल्य वर्धित कर)- को बढ़ा चुकी है और इसके अलावा भी कमाई बढ़ाने के लिए कई क़दम उठाए जा रहे हैं.
28 फ़रवरी तक के आंकड़ों के मुताबिक, साल की शुरुआत से अब तक बजट खर्च 8,200 अरब रूबल तक पहुंच चुका है, जबकि इसी अवधि में सरकार की आमदनी सिर्फ़ 2,500 अरब रूबल रही है.
जनवरी 2026 में रूस को तेल और गैस से होने वाली अनुमानित आय का 31.7 प्रतिशत हिस्सा नहीं मिल पाया. फरवरी में भी यह कमी 2.2 प्रतिशत रही.
इस स्थिति की एक बड़ी वजह प्रतिबंध हैं. पिछले साल शरद ऋतु में अमेरिका ने रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों- रोसनेफ़्ट और लुकोइल- पर प्रतिबंध लगाए थे. इसके चलते रूसी तेल पर दी जाने वाली छूट बढ़ गई और सप्लाई में भी रुकावटें पैदा हुईं. इसके अलावा, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल की शुरुआत में घोषणा की थी कि भारत- जो रूस के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है- ने रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया है.
विश्लेषण कंपनी ‘क्लैपर’ के मुताबिक, ईरान के साथ युद्ध के बाद कच्चे तेल के बाज़ार में रूस की प्रतिस्पर्धी स्थिति काफ़ी मज़बूत हुई है. विश्लेषण कंपनी ‘वोर्टेक्सा’ भी इस आकलन से सहमत है.
उदाहरण के तौर पर, 6 मार्च को अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारतीय कंपनियों को यह इजाज़त दी कि वे 4 अप्रैल तक उस रूसी तेल को ख़रीद सकें, जो 5 मार्च तक पहले ही तेल टैंकरों पर लादा जा चुका था.
इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा, “यह कदम जानबूझकर अल्पकालिक रखा गया है और इससे रूसी अधिकारियों को कोई बड़ा आर्थिक फ़ायदा नहीं होगा, क्योंकि इसमें सिर्फ़ उसी तेल की ख़रीद फरोख़्त की अनुमति दी गई है जो पहले से टैंकरों पर लदा हुआ है और इस समय समुद्र में मौजूद है.”
स्कॉट बेसेंट के बयान से पहले ही रूसी तेल की बड़ी खेप लेकर जा रहे दो तेल टैंकर भारत के बंदरगाहों पर पहुंच चुके थे.
ऐसा लगता है कि रूस मौजूदा हालात से फ़ायदा उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है. हाल ही में व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में वैश्विक तेल और गैस बाज़ार की स्थिति पर एक बैठक हुई. इसमें उन्होंने कहा कि रूस अपने ‘भरोसेमंद साझेदारों’ को निर्यात बढ़ाने के लिए तैयार है. उनके इशारे सिर्फ़ एशियाई देशों की ओर नहीं थे, बल्कि पूर्वी यूरोप के कुछ देश, जैसे हंगरी और स्लोवाकिया भी इसमें शामिल थे.

अर्थशास्त्री येवगेनी नादोर्शिन ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि तेल की कीमतें असल आपूर्ति से ज़्यादा गणनात्मक सूचकों के आधार पर तय होती हैं. उनका मतलब यह है कि तेल लोड करते समय ही सप्लायर टैक्स चुका देते हैं, न कि बिक्री के बाद. ऐसे में तेल की मौजूदा ऊंची कीमतों का बजट पर असर शायद उतना बड़ा न हो, जितना पहली नज़र में लगता है.
नादोर्शिन के मुताबिक, “मेरी राय में इस वक्त जो तेल समुद्र में रूसी टैंकरों पर मौजूद है, उससे ज़्यादा फ़ायदा दलालों और बिचौलियों को होगा. अभी साफ़ नहीं है कि तेल कंपनियों को इसमें से कितना हिस्सा मिलेगा. अंततः उन्हें भी मुनाफ़ा होगा, लेकिन संभव है कि उनका हिस्सा सरकारी बजट से ज़्यादा हो, क्योंकि सरकार ने इस तेल पर टैक्स पहले ही वसूल कर लिया हो.”
ईरान के साथ युद्ध के बावजूद, प्रतिबंधों की वजह से रूसी ‘यूराल’ तेल अब भी ब्रेंट से सस्ता बिक रहा है. ‘रोसनेफ़्ट’ और ‘लुकोइल’ पर प्रतिबंध लगने के बाद दोनों के दामों के बीच का अंतर औसतन 57 प्रतिशत, यानी क़रीब 30 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया.
येवगेनी नादोर्शिन का कहना है कि मौजूदा क़ीमतें रूस के बजट घाटे को भरने के लिए अब भी काफ़ी नहीं हैं. उनके मुताबिक, सैद्धांतिक रूप से बजट में संतुलन तभी आ सकता है जब ब्रेंट तेल की कीमत लगभग 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाए.
हालांकि इस पूरी तस्वीर में रूबल की विनिमय दर भी बेहद अहम है. आम तौर पर तेल की कीमत बढ़ने पर रूबल मज़बूत होता है, और मज़बूत रूबल न तो तेल निर्यातकों के लिए और न ही रूसी बजट के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है. रूसी केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, महीने की शुरुआत में एक डॉलर की कीमत करीब 79 रूबल थी.
नादोर्शिन कहते हैं, “मेरे ख़याल से अगर ब्रेंट की कीमत 200 डॉलर तक भी पहुंच जाए, तब भी रूबल का मौजूदा स्तर पर टिके रहना मुश्किल है. संभव है कि हम फिर से 60 रूबल, या कुछ समय के लिए 50 रूबल प्रति डॉलर जैसी दरें देखें. दुर्भाग्य से मौजूदा विनिमय दर पर अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाते. जब तक रूबल की ज़रूरत से ज़्यादा मज़बूती की समस्या हल नहीं होती, तब तक यह उम्मीद करना कि संघीय बजट की आय की समस्या सुलझ जाएगी, एक तरह की भोली सोच है.”
उनका मानना है कि तेल की कीमतों में थोड़े समय की बढ़ोतरी से रूस की वित्तीय स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.