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भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साल 2020 की अपनी किताब ‘द इंडिया वे: स्ट्रैटेजीज़ फ़ॉर एन अनसर्टेन वर्ल्ड’ में लिखा था, “यह वह समय है जब हमें अमेरिका से जुड़ना है, चीन को संभालना है, यूरोप से रिश्ते बढ़ाने हैं, रूस को आश्वस्त करना है, जापान को साथ लाना है, पड़ोस का विस्तार करना है और पारंपरिक सहयोगियों का दायरा और बढ़ाना है.”
पिछले एक दशक से भारत ने ख़ुद को नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की एक अहम धुरी के तौर पर पेश किया है. एक क़दम अमेरिका में, तो दूसरा रूस में और चौकन्नी नज़र चीन पर.
लेकिन यह ढांचा अब हिलने लगा है. डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका अब भारत के चियरलीडर से आलोचक में तब्दील होता दिख रहा है.
वह भारत पर आरोप लगा रहा है कि रूस से सस्ता तेल ख़रीदकर भारत जंग में रूस की मदद कर रहा है.
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बहुध्रुवीय दुनिया का विचार बिखरता दिख रहा है. ऐसे में रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बीजिंग में तय मुलाक़ात, कई लोगों को कूटनीतिक जीत नहीं बल्कि व्यावहारिक मेल-मिलाप लग रही है.
दरअसल, भारत की विदेश नीति इस समय एक कठिन मोड़ पर है.
दो ख़ेमों में होने की दुविधा
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भारत एक साथ दो ख़ेमों में मौजूद है. वह जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिका के नेतृत्व वाले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के गठबंधन क्वाड का अहम स्तंभ है.
साथ ही वो चीन-रूस के नेतृत्व वाले शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) का भी सदस्य है. ये गठबंधन अक्सर अमेरिकी हितों के ख़िलाफ़ खड़ा दिखता है.
भारत, एक तरफ़ रूस से सस्ता तेल ख़रीदता है तो दूसरी ओर अमेरिकी निवेश और टेक्नोलॉजी को भी आकर्षित करता है. वो अगले हफ़्ते चीन के तियानजिन में होने वाले एससीओ के सम्मेलन में शामिल होने के लिए तैयार है.
इसके अलावा भारत आईटूयूटू (I2U2) यानी भारत, इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के समूह में भी है, जो तकनीक, खाद्य सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर काम करता है.
विश्लेषकों का कहना है कि संतुलन की कोशिश यूं ही नहीं है.
भारत रणनीतिक स्वायत्तता को अहमियत देता है और मानता है कि अलग-अलग ख़ेमों से जुड़ाव उसे कमज़ोर नहीं बल्कि ताक़तवर बनाता है.
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और पूर्व राजदूत जितेन्द्र नाथ मिश्रा कहते हैं, ”हेजिंग एक बुरा विकल्प है. लेकिन किसी एक खे़मे में शामिल होना उससे भी बुरा है. भारत के लिए सबसे बेहतर वही बुरा विकल्प है- हेजिंग.”
किसी अप्रत्याशित नुक़सान से बचने की रणनीति को हेजिंग कहते हैं.
जितेन्द्र नाथ मिश्रा का कहना है, “भारत शायद किसी महाशक्ति के साथ पूरी तरह खड़ा होने का आत्मविश्वास नहीं रखता. एक पुरानी सभ्यता वाला देश होने के नाते वह वही रास्ता अपनाना चाहता है जो इतिहास की अन्य बड़ी ताक़तों ने अपनाया, यानी अपनी शर्तों पर ताक़त बनना.”
लेकिन सच्चाई यह है कि भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं उसकी क्षमता से कहीं बड़ी हैं.
उसकी 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था दुनिया में पांचवें स्थान पर है. लेकिन यह चीन के 18 ट्रिलियन या अमेरिका के 30 ट्रिलियन डॉलर की तुलना में बहुत कम है.
भारत का रक्षा उद्योग भी कमज़ोर है. हथियारों के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है, लेकिन हथियार निर्यातकों की शीर्ष पांच की भी लिस्ट में नहीं है.
आत्मनिर्भरता के अभियानों के बावजूद भारत हाई-वैल्यू मिलिट्री टेक्नोलॉजी बाहर से ख़रीदता है.
चीन से बदल रहे रिश्ते
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विश्लेषकों के अनुसार इसी असमानता से भारत की कूटनीति तय होती है.
उनका मानना है कि यही वजह है कि मोदी इस समय चीन जा रहे हैं, जब रिश्तों पर जमी बर्फ़ थोड़ी पिघलती दिख रही है.
2020 के गलवान संघर्ष के बाद से दोनों के रिश्ते ठंडे रहे हैं.
दोनों देशों के बीच 99 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है, जो भारत के रक्षा बजट से भी ज़्यादा है. यह असंतुलन बहुत कुछ कहता है.
रिश्तों के इस बदले माहौल का संकेत चीन ने भी दिया है. भारत में चीन के राजदूत शू फ़ेहॉन्ग ने हाल ही में टैरिफ़ को लेकर अमेरिका की तुलना एक “बुली” (दबंग) से की थी.
पिछले हफ़्ते चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत आए. इस दौरान उन्होंने कहा कि दोनों पड़ोसियों को “साझेदार बनना चाहिए, प्रतिद्वंद्वी या एक दूसरे के लिए ख़तरा नहीं.”
लेकिन आलोचक ये सवाल कर रहे हैं कि आख़िर भारत अभी चीन से रणनीतिक बातचीत क्यों शुरू कर रहा है?
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैप्पीमॉन जैकब ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर सीधा सवाल किया, “और विकल्प ही क्या है?”
उनका मानना है कि आने वाले कई दशकों तक चीन को संभालना भारत की “मुख्य रणनीतिक चुनौती” रहेगी.
‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में अपने लेख में उन्होंने बताया कि भारत और चीन की बातचीत को भारत-चीन-रूस त्रिकोण के संदर्भ में भी देखना चाहिए.
उनका कहना है, ये बातचीत अमेरिकी नीतियों के जवाब में नए गठजोड़ों का संकेत है और दिखाती है कि अमेरिका के विकल्प मौजूद हैं.
लेकिन जैकब चेतावनी भी देते हैं, ”अगर भारत के साथ चीन के रिश्ते सामान्य नहीं होते तो वह ट्रंप को लेकर भारत की नाराज़गी का इस्तेमाल अपने भू-राजनीतिक फ़ायदे के लिए नहीं कर पाएगा.”
बड़ी तस्वीर यह है कि क्या बड़ी ताक़तें आपस में सचमुच तालमेल बिठा सकती हैं.
स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के हूवर इंस्टीट्यूशन के सुमित गांगुली कहते हैं, ”अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्द्धा बुनियादी तौर पर परस्पर विरोधी है. रूस चीन का ‘जूनियर पार्टनर’ बन चुका है.”
ऐसे में भारत के लिए क्या गुंजाइश है? गांगुली इस सवाल के जवाब में कहते हैं, “जहां तक मैं देख पा रहा हूं, भारत की मौजूदा रणनीति यही है कि चीन से किसी तरह कामचलाऊ रिश्ता बनाए रखे और समय ले.”
रिश्तों की पेचीदगियां
रूस के मामले में भारत ने अमेरिका के दबाव के आगे झुकने के बहुत कम संकेत दिए हैं. रूस से मिलने वाला सस्ता तेल उसकी ऊर्जा सुरक्षा का बुनियादी हिस्सा है.
हाल ही में विदेश मंत्री जयशंकर की रूस यात्रा ने साफ़ किया कि पश्चिम की पाबंदियों और रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ने के बावजूद, भारत इस रिश्ते को बेहतर बनाए रखना चाहता है.
यह उसकी एनर्जी लाइफ़लाइन भी है और विदेश नीति की स्वायत्तता का संकेत भी.
सुमित गांगुली कहते हैं, ”भारत, रूस से रिश्ते इसलिए भी बेहतर कर रहा है क्योंकि उसे डर है कि रूस कहीं चीन की तरफ़ और न खिसक जाए. साथ ही अब ये भी सामने आ गया है कि ट्रंप के साथ उसके रिश्ते बिगड़ रहे हैं.”
ट्रंप बार-बार पाकिस्तान के साथ भारत के युद्ध को ख़त्म कराने के लिए अपनी मध्यस्थता के दावे करते रहे हैं. इससे भी भारत नाराज़ है.
इसके साथ ही अमेरिका और भारत की ट्रेड डील भी अटकी हुई है.
रूसी तेल की ख़रीद को लेकर ट्रंप की नाराज़गी के कारण अमेरिका और भारत के रिश्ते में और तनाव आ गया है, जबकि चीन, भारत की तुलना में कहीं ज़्यादा तेल रूस से ख़रीद रहा है.
हालांकि इतिहास बताता है कि जब बड़े हित दांव पर हों तो बड़ी दरारें भी हमेशा आपसी रिश्तों को तोड़ नहीं पातीं.
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जितेन्द्र नाथ मिश्रा कहते हैं, “हम हमेशा सबसे कठिन चुनौती का सामना करते हैं. जब तक अगली चुनौती न आ जाए.”
वो याद दिलाते हैं, ”1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए. भारत अलग-थलग पड़ गया और रिश्ते टूटने लगे.”
वो कहते हैं, ”लेकिन एक दशक से भी कम समय में ही दोनों ने मिलकर ऐतिहासिक परमाणु समझौता किया. यानी रणनीतिक ज़रूरत पड़ने पर अविश्वास भी पिघल सकता है.”
विकल्प क्या हैं?
अब सवाल यह नहीं है कि रिश्ते सुधरेंगे या नहीं. सवाल यह है कि रिश्तों को किस दिशा में ले जाना चाहिए.
कार्नेगी एंडॉमेंट में सीनियर फेलो ऐशली टेलिस ‘फ़ॉरेन अफ़ेयर्स’ में लिखते हैं, “भारत की बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर जाने का रुझान उसकी सुरक्षा को कमज़ोर करता है.”
उनका कहना है कि अमेरिका की ताक़त थोड़ी घटी है लेकिन आज भी वो “दोनों एशियाई दिग्गजों” पर भारी है इसलिए भारत को चीन को रोकने के लिए अमेरिका के साथ “ख़ास साझेदारी” करनी चाहिए. अगर भारत किसी पाले में नहीं गया तो वो एक ‘दुश्मन सुपरपावर’ को अपने दरवाज़े पर पाएगा.
लेकिन चीन और अमेरिका में भारत की राजदूत रह चुकीं निरुपमा राव कहती हैं, ”भारत इतना बड़ा और महत्वाकांक्षी है कि किसी एक महाशक्ति से बंध नहीं सकता. उसकी परंपरा और हित लचीलेपन की मांग करते हैं. दुनिया अब दो ख़ेमों में नहीं बंट रही, बल्कि और जटिल तरीक़े से बंट रही है. ऐसे में रणनीतिक अस्पष्टता कमज़ोरी नहीं बल्कि स्वायत्तता है.”
लेकिन टकराते विचारों के बीच एक बात साफ़ है कि भारत अब रूस समर्थित, चीन के नेतृत्व वाले और गै़र अमेरिकी विश्व व्यवस्था में सहज नहीं है.
सुमित गांगुली कहते हैं, “सच तो ये है कि भारत के पास सीमित विकल्प हैं. चीन से सुलह की कोई संभावना नहीं है, उससे प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी. रूस पर ‘कुछ हद तक’ भरोसा किया जा सकता है.”
अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों पर उनका कहना है, “भले ही ट्रंप तीन साल और सत्ता में रहें लेकिन अमेरिका और भारत का रिश्ता टिका रहेगा.”
”दोनों देशों का इतना कुछ दांव पर है कि ट्रंप की सनक पर इस रिश्ते को टूटने नहीं दिया जाएगा.”
अन्य विश्लेषकों का भी यही मानना है कि भारत के पास फ़िलहाल बेहतर विकल्प नहीं हैं, सबसे बेहतर विकल्प यही है कि वो अमेरिका के दिए झटकों को बर्दाश्त करता रहे.
जितेन्द्र नाथ मिश्रा कहते हैं, “रणनीतिक धैर्य ही भारत की असली ताक़त है. भारत को आंधी को गुज़र जाने देना चाहिए. समय के साथ साझेदार लौट आते हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित