राज्य ब्यूरो, जागरण, कोलकाता। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआइ) ने बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने राज्य में मतदान की तिथियों की घोषणा और आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले ही केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है।
निर्वाचन आयोग द्वारा शनिवार को जारी इस अधिसूचना ने राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लिया गया यह निर्णय दर्शाता है कि आयोग इस बार बंगाल में कानून-व्यवस्था को लेकर बेहद गंभीर है।
होली के तत्काल बाद घोषित हो जाएगा चुनाव
आयोग की योजना के अनुसार, केंद्रीय बलों की यह तैनाती दो रणनीतिक चरणों में संपन्न की जाएगी। पहले चरण की शुरुआत आगामी एक मार्च से होगी। गौर करने वाली बात यह है कि इस अवधि तक न तो चुनाव की तिथि अधिसूचित होंगी और न ही आदर्श आचार संहिता प्रभावी होगी।
इसके बाद दूसरा चरण 10 मार्च से शुरू होगा, जिसके बारे में यह संभावना जताई जा रही है कि तब तक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो चुकी होगी और आचार संहिता लागू हो जाएगी। सूत्रों के अनुसार, निर्वाचन आयोग होली के तत्काल बाद मतदान के विभिन्न चरणों की घोषणा कर सकता है।
इन दो शुरुआती चरणों में कुल 480 कंपनियों को तैनात करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें प्रत्येक चरण में 240-240 कंपनियां भेजी जाएंगी।
एक मार्च को पहुंचने वाली पहली खेप में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआइरीएफ) की 110 कंपनियां, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की 55, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) की 21, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) की 27 और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की 27 कंपनियां शामिल होंगी। वहीं, 10 मार्च के दूसरे चरण में बलों की संख्या में फेरबदल करते हुए सीआरपीएफ की 120 और बीएसएफ की 65 कंपनियों सहित अन्य बलों का मिश्रण तैनात किया जाएगा।
आवाजाही और तैनाती के लिए सीआरीएफ होगी मुख्य समन्वयकारी एजेंसी
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस पूरी आवाजाही और तैनाती के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल मुख्य समन्वयकारी एजेंसी के रूप में कार्य करेगी। साथ ही, पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह संबंधित बलों के मुख्य समन्वयकों के साथ मिलकर तैनाती की विस्तृत कार्ययोजना तैयार करे।
इन बलों की वापसी के संबंध में निर्णय उचित समय पर लिया जाएगा। समय से पहले बलों की इस दस्तक को संवेदनशील इलाकों में मतदाताओं के बीच विश्वास पैदा करने और संभावित हिंसा को रोकने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।