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छत्तीसगढ़ विधानसभा ने गुरुवार को ‘धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026’ को ध्वनि मत से पारित कर दिया है.
राज्य सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य “बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी के जरिए कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है”.
सरकार के मुताबिक़,नए कानून के लागू होने के बाद अवैध तरीकों से धर्मांतरण कराने वालों के लिए सख़्त सज़ा का प्रावधान किया गया है, जिसमें कुछ मामलों में आजीवन कारावास भी शामिल है.
छत्तीसगढ़ में धर्म स्वतंत्रता विधेयक को लेकर कांग्रेस ने आपत्ति जताई है. नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत ने कहा कि यह विधेयक “सिर्फ़ जबरन धर्मांतरण रोकने से कहीं आगे जाकर असर करेगा” और इससे “व्यक्तिगत आस्था पर डर और निगरानी का माहौल बनेगा”.
उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह का क़ानून पहले से मौजूद है, इसलिए “नए प्रावधानों की जरूरत और इसके प्रभाव पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए थी.”
पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से चर्चों पर हमलों, ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों के साथ हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और अंतिम संस्कार से जुड़े विवादों की खबरें सामने आती रही हैं.
इसी दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों की सक्रियता भी बढ़ी है, जो आदिवासियों की धार्मिक पहचान को लेकर अपना ख़ास दृष्टिकोण रखते हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ में लागू होने जा रहा यह नया क़ानून ज़मीनी स्तर पर क्या बदलाव ला सकता है.
छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता क़ानून में क्या नया है?
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सरकार के मुताबिक, “यह विधेयक छत्तीसगढ़ में लागू 1968 के क़ानून की जगह लेगा, जिसे राज्य गठन के बाद मध्य प्रदेश से अपनाया गया था. नए क़ानून में धर्मांतरण के दायरे को विस्तार देते हुए डिजिटल माध्यम और आर्थिक प्रलोभनों को भी शामिल किया गया है.”
विधेयक के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 का उद्देश्य बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी के जरिए कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना है.
प्रस्तावित प्रावधानों के मुताबिक़, धर्म परिवर्तन से पहले संबंधित व्यक्ति और प्रक्रिया से जुड़े धार्मिक प्रतिनिधि को प्रशासन को पूर्व सूचना देनी होगी, जिसके बाद इसे सार्वजनिक किया जाएगा और 30 दिन की अवधि में आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी.
नए क़ानून के तहत ना सिर्फ़ धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को बल्कि धर्म परिवर्तन कराने वाले पुजारी, मौलवी या अन्य धार्मिक व्यक्ति को भी प्रशासनिक अधिकारी को इसकी सूचना देनी होगी.
इस क़ानून के तहत दर्ज़ किए जाने वाले सभी अपराध ग़ैर-जमानती होंगे. साथ ही, एक अहम प्रावधान यह है कि धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति पर यह साबित करने की ज़िम्मेदारी होगी कि धर्म परिवर्तन में किसी तरह का दबाव, प्रलोभन या धोखाधड़ी शामिल नहीं थी.
विधेयक में सज़ा के प्रावधान भी कड़े किए गए हैं. अवैध धर्मांतरण के मामलों में सात से दस साल तक की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है.
महिलाओं, नाबालिगों और अनुसूचित जाति, जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों से जुड़े मामलों में सज़ा 10 से 20 साल तक हो सकती है.
सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में सज़ा और भी सख़्त है, जिसमें आजीवन कारावास तक का प्रावधान किया गया है.
सरकार का कहना है कि यह क़ानून जबरन या धोखे से होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया गया है. वहीं, विपक्ष का तर्क है कि ऐसे क़ानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्म चुनने के अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं.
दूसरे राज्यों में क्या है हाल?
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दरअसल, राज्य में धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही 1968 का कानून लागू था, जिसे साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद मध्य प्रदेश से अपनाया गया था.
सरकार का कहना है कि नया विधेयक उसी कानून को बदलते हुए नए प्रावधान जोड़ता है, जबकि आलोचकों का कहना है कि ऐसे कानूनों का इतिहास सवालों के घेरे में रहा है.
दूसरे राज्यों के अनुभव भी इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाते हैं. जनवरी 2020 में लागू हुए मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अध्यादेश 2020 और उसके बाद बने मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 के पाँच साल बाद अगस्त 2025 में विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत 283 मामले दर्ज हुए थे.
इनमें 197 मामले, यानी करीब 70 प्रतिशत, अदालतों में लंबित थे. बाकी 86 मामलों में से 50 में अभियुक्त बरी हो गए, जबकि सज़ा केवल सात मामलों में हुई.
उत्तर प्रदेश में भी इस तरह के कानून के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है.
अक्टूबर 2025 में शीर्ष अदालत ने फतेहपुर जिले में कथित सामूहिक धर्मांतरण के आरोप में दर्ज कई एफआईआर रद्द करते हुए कहा था कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल निर्दोष नागरिकों को परेशान करने के औजार के रूप में नहीं किया जा सकता.
धर्मांतरण से जुड़े कानून छत्तीसगढ़ में नए नहीं हैं. इतिहास में भी ऐसे प्रावधान मिलते हैं, जिनके जरिए आस्था परिवर्तन की प्रक्रिया को नियंत्रित करने की कोशिश की गई.
रायगढ़ रियासत का 1936 का कन्वर्ज़न एक्ट धर्म बदलने के इच्छुक व्यक्ति को पहले निर्धारित अदालत में आवेदन देने के लिए बाध्य करता था.
इसी तरह, सरगुजा रियासत में 1945 का अपोस्टेसी एक्ट और भी सख्त माना जाता है.
इसके तहत किसी भी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन की अपनी मंशा के बारे में सरकार को कम से कम तीन महीने पहले सूचना देना जरूरी था.
इतना ही नहीं, बिना राज्य की अनुमति के किसी भी तरह का धर्म परिवर्तन अवैध माना जाता था.
‘छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्मांतरण निशाने पर’

छत्तीसगढ़ के बस्तर में वकालत कर रहे डिग्री प्रसाद चौहान ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “यह एक टारगेटेड कानून है जिसकी जद में आने वाले समय में आप अल्पसंख्यकों खास तौर पर ईसाई और मुस्लिम समुदाय के लोगों को आते देखेंगे. दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा कोई भी कानून भारतीय नागरिकों की आज़ादी और संविधान में दिए उनके मौलिक अधिकारों से सीधा टकराव है.”
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने भी इस कानून के दुरुपयोग किए जाने की बात का समर्थन करते हुए कहा, “यह तो स्पष्ट है कि इस कानून से ईसाई धर्मांतरण को निशाना बनाया जा रहा है. आदिवासी प्रकृति पूजक हैं, हम न तो हिंदू हैं न ही क्रिश्चियन न ही मुस्लिम और न ही किसी अन्य धर्म के लोग हैं. लेकिन संविधान सबको अधिकार देता है कि वो अपनी मर्ज़ी से अपनी आस्था चुन सकते हैं. इस कानून से उस मर्ज़ी को दबाया जाने का प्रयास किया जा रहा है”.
छत्तीसगढ़ में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे विकास तिवारी कहते हैं, “छत्तीसगढ़ के लिए खास तौर पर बस्तर के लिए माओवाद के बाद सबसे बड़ी चुनौती धर्मांतरण और इस से उपज रहे टकराव हैं.”
सरकार का दावा और ईसाई संगठनों का डर
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छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 को लेकर कहा है कि यह कानून राज्य में बढ़ रहे समुदायिक तनाव और विवादों को ध्यान में रखते हुए लाया गया है.
विजय शर्मा ने कहा, “नए कानून में अवैध धर्मांतरण के मामलों में सख्त सज़ा का प्रावधान किया गया है. विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं, नाबालिगों और दिव्यांगों के धर्मांतरण के मामलों को गंभीर श्रेणी में रखा गया है. इसके अलावा, यदि किसी सरकारी कर्मचारी की भूमिका ऐसे मामलों में पाई जाती है या कोई व्यक्ति इसमें सहयोग करता है, तो उसके लिए भी कड़ी सज़ा तय की गई है.”
हालांकि इसी बीच ईसाई संगठनों का कहना है कि इस क़ानून का दुरुपयोग होने के अधिक आसार हैं और इसका असर जमीन पर भी दिखाई देगा.
ईसाइयों के अधिकारों के लिए काम कर रही संस्था यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, 2025 में जनवरी से नवंबर के बीच ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ देश भर में 700 से अधिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें से करीब 48 प्रतिशत मामले केवल दो राज्यों, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से सामने आए हैं.
फोरम के मुताबिक़, 2025 में छत्तीसगढ़ राज्य में ईसाई समुदाय के लोगों के अंतिम संस्कार से जुड़े 19 विवाद सामने आए, जबकि 2024 में ऐसे करीब 30 मामले दर्ज किए गए थे.
इनमें कांकेर जिले की एक घटना भी शामिल थी, जहां एक ईसाई धर्म को मानने वाले आदिवासी के अंतिम संस्कार के बाद हिंसा की घटना सामने आई थी.
एक अन्य मामले में छत्तीसगढ़ के बस्तर के धर्मांतरित आदिवासी ईसाई सुभाष बघेल को अंतिम संस्कार से वंचित किए जाने का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था.
इन घटनाओं का हवाला देते हुए यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के राष्ट्रीय समन्वयक ए.सी. माइकल ने बीबीसी से कहा, “मौजूदा सरकार वोट बैंक की राजनीति और हिंदुओं के तुष्टिकरण की मंशा से छत्तीसगढ़ में यह कानून लेकर आई है. हम लोग इतने वर्षों से मांग कर रहे हैं कि राज्य में जबरदस्ती धर्मांतरण जिनका हुआ है उनकी कोई संख्या, कोई लिस्ट सरकार जारी करे, लेकिन आजतक सरकार नहीं कर पाई है”.
उन्होंने आगे कहा, “अगर सरकार आज तक यह साबित नहीं कर पाई है कि कितने लोगों का जबरन धर्मांतरण कराया गया है तो फिर इस धर्म स्वतंत्रता कानून का क्या मतलब है? एक तरफ़ इस सरकार और इनकी पार्टी के लोग आदिवासियों के हिंदू होने की बात थोपते हैं, दूसरी ओर स्वेच्छा से अपना धर्म चुनने वालों पर कानूनी बंदिशें लगा रहे हैं, इस से भारतीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है”.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित