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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रेप के एक केस में दिए गए फ़ैसले पर विवाद छिड़ गया है और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है.
अदालत ने फ़ैसले में कहा है, “बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन बलात्कार नहीं है.”
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2004 में हुई यौन हिंसा की घटना पर सुनवाई करते हुए कहा कि इसे रेप नहीं माना जाएगा.
यह मामला वासुदेव गोंड बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का है जो धमतरी ज़िले में हुई 21 मई 2004 की घटना पर आधारित है.
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल जज बेंच ने 16 फ़रवरी 2026 को धमतरी की अतिरिक्त सत्र अदालत के फैसले के ख़िलाफ़ दायर इस अपील पर फ़ैसला सुनाते हुए अभियुक्त को बलात्कार का दोषी न मानते हुए बलात्कार के प्रयास का दोषी माना और सज़ा कम कर दी.
हाईकोर्ट ने कहा है कि बिना पेनिट्रेशन के इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं माना जाएगा.
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह कृत्य बलात्कार का प्रयास माना जाएगा और धारा 376 सहपठित धारा 511 के तहत दंडनीय होगा.
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फ़ैसले की लोग निंदा कर रहे हैं.
भारतीय राजनेता और अभिनेता प्रकाश राज ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर इस फ़ैसले को ”घिनौना” कहते हुए लिखा, “हम ऐसे जजों और कोर्ट से न्याय की उम्मीद कैसे कर सकते हैं.”
इस फ़ैसले पर महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना ने बीबीसी से कहा, “इस तरह के फ़ैसले एक बड़ी आबादी की हिम्मत तोड़ देते हैं. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फ़ैसले से हम सब स्तब्ध भी हैं और परेशान भी. भारत को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने के प्रयासों पर यह गहरी चोट है. अगर सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान नहीं लेता है तो हम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे.”
सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह ने भी बीबीसी से कहा, “ऐसे निर्णयों में न्यायिक सोच में मौजूद स्त्री विरोधी दृष्टिकोण की झलक साफ़ दिखाई देती है.”
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में क्या कहा?
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अदालत ने अपने आदेश में कहा, “इंडिसेंट असाल्ट (अश्लील हमले) को अक्सर बलात्कार के प्रयास में बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर दिया जाता है बलात्कार के अपराध के लिए अनिवार्य तत्व पेनिट्रेशन है, न कि इजैक्युलेशन. पेनिट्रेशन के बिना इजैक्युलेशन, बलात्कार का प्रयास है, न कि वास्तविक बलात्कार.”
फ़ैसले में दर्ज़ घटना के विवरण के अनुसार अभियुक्त ने लड़की की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाए. इसके बाद उसे कमरे में बंद कर दिया, हाथ पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया.
निचली अदालत ने अभियुक्त को आईपीसी की धारा 376 (1) और 342 के तहत दोषी ठहराया था. हाईकोर्ट में अपील के दौरान लड़की के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों को रखा गया.
जस्टिस व्यास की ओर से सुनाए गए फ़ैसले में ज़िक्र किया गया कि लड़की के बयानों में विरोधाभास है.
फैसले में डॉक्टरों की रिपोर्ट का ज़िक्र किया गया और ये भी कहा गया कि सर्वाइवर के अंडरगारमेंट्स से मानव शुक्राणु भी मिलने की बात की पुष्टि हुई थी.
अदालत ने कहा, “बलात्कार के अपराध के लिए पेनिट्रेशन अनिवार्य तत्व है और इसके लिए स्पष्ट और ठोस साक्ष्य होना चाहिए. यह साबित होना धारा 376 के तहत अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है.”
हालांकि अदालत ने आगे अपने फैसले में कहा “…क्रॉस एग्ज़ामिनेशन (जिरह) के दौरान डॉक्टर ने दोहराया कि हल्के पेनिट्रेशन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि, यह साक्ष्य बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि इससे बलात्कार के प्रयास का अपराध बनता है.”
‘विरोधाभासी फ़ैसला’
फैसले में एक तरफ़ कोर्ट ने कहा कि “संदेह से परे यह स्पष्ट होता है कि पीड़िता को बलात्कार के अपराध का शिकार बनाया गया”
वहीं दूसरी तरफ आगे कहा गया कि “साक्ष्य बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि इससे बलात्कार के प्रयास का अपराध बनता है”.
फैसले में ऐसे विरोधाभासों पर बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट की वकील सोनम चांदवानी ने बीबीसी से कहा कि “भले ही फैसले की भाषा या तर्क में कुछ आंतरिक विरोधाभास दिखाई दें, लेकिन सज़ा में कमी का कानूनी आधार स्पष्ट है.”
उन्होंने कहा, “क्रिमिनल कोर्ट के लिए यह अनिवार्य है कि लगाए गए आरोपों के प्रत्येक आवश्यक तत्व को संदेह से परे स्थापित किया जाए. यदि हाईकोर्ट ने अपील में साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन के बाद यह पाया कि ‘पेनिट्रेशन’ यानी प्रवेश के तत्व पर संदेह बना हुआ है, जो उस समय लागू आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार की मूल शर्त है, तो इसी को आधार मानते हुए अभियुक्त को संदेह का लाभ दिया गया है”.
सोनम चांदवानी के अनुसार, “जजमेंट में मौजूद विरोधाभास तभी निर्णायक महत्व रखते हैं जब वे अपराध की जड़ को प्रभावित करें. यहां अदालत ने साक्ष्यों में असंगतियों को अपराध के पूरा होने पर संदेह उत्पन्न करने वाला माना, न कि यौन हमले की घटना पर.”
छत्तीसगढ़ स्थित वकील सुदीप श्रीवास्तव ने भी कहा कि जजमेंट में भाषाई और तार्किक विरोधाभास है लेकिन अदालत ने यौन हिंसा पर संदेह नहीं बल्कि रेप के होने की पुष्टि पर संदेह माना है.
उन्होंने कहा, “अदालत ने इस मामले में पीड़िता के दूसरे बयान जिसमें उन्होंने पेनिट्रेशन न होने की बात कही और डॉक्टर के उस मेडिकल ओपिनियन पर जिसमें हाइमन इंटैक्ट होने की बात कही इन दोनों बातों को रेप होने के मूल तत्व पेनिट्रेशन पर संदेह पैदा करने वाला माना है.”
फ़ैसले पर उठ रहे हैं सवाल

अदालत ने अंततः बयानों में बदलाव और पेनिट्रेशन साबित न होने के आधार पर अभियुक्त को धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत रेप के प्रयास के लिए तीन वर्ष छह माह के कठोर कारावास और 200 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई.
अदालत के इस फ़ैसले पर बात करते हुए योगिता भयाना ने कहा कि यह दुखद और परेशान करने वाला फैसला है.
उन्होंने कहा, “लगातार अलग-अलग राज्यों से ऐसे फ़ैसले सामने आ रहे हैं. जजों की ट्रेनिंग होनी चाहिए. जब क़ानून के शब्दों और उसकी आत्मा की समझ न हो, तो ऐसे निर्णय आते रहेंगे. महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता की भी अलग से ट्रेनिंग होनी चाहिए.”
योगिता भयाना ने कहा कि जजों की जिम्मेदारी सिर्फ़ फ़ैसला सुनाना नहीं, बल्कि उसके सामाजिक असर को समझना भी है.
उन्होंने कहा, “ऐसे फ़ैसले हमें एक कदम आगे बढ़ने के बाद दस कदम पीछे धकेल देते हैं. अगर यही स्थिति रही तो महिलाएं अपनी सुरक्षा और इंसाफ़ के लिए किससे उम्मीद करेंगी.”
बिलकिस बानो मामले की वकील शोभा गुप्ता ने भी इस फ़ैसले पर सवाल उठाए.
उन्होंने बीबीसी से कहा, ”मैंने पूरा फ़ैसला पढ़ा है. सर्वाइवर के बयान में भले कुछ विरोधाभास हों, लेकिन मेडिकल साक्ष्यों को साथ पढ़ने पर यह मामला केवल प्रयास का नहीं बल्कि बलात्कार का बनता है.”
उन्होंने कहा, “धारा 375 के तहत हल्का सा प्रवेश या प्रवेश का प्रयास भी पर्याप्त है. अदालत ने पेनिट्रेशन की परिभाषा को बहुत संकीर्ण तरीके से पढ़ा.”
उन्होंने यह भी कहा कि सर्वाइवर नाबालिग थी, ऐसे में पॉक्सो कानून लागू होना चाहिए था.
उन्होंने कहा, “बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम के तहत केवल कपड़े उतारना या उतारने की कोशिश भी गंभीर यौन हिंसा की श्रेणी में आता है. ऐसे में इस पहलू की अनदेखी गंभीर चिंता का विषय है.”
शोभा गुप्ता ने अदालत की उस टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई जिसमें सर्वाइवर के माता-पिता को स्वतंत्र गवाह नहीं माना गया.
उन्होंने कहा, “यौन अपराधों में परिवार के सदस्य ही अक्सर पहले श्रोता और साक्षी होते हैं. उन्हें केवल इस आधार पर ख़ारिज कर देना कि वे स्वतंत्र गवाह नहीं हैं, न्याय की दृष्टि से उचित नहीं है.”
उन्होंने कहा, “मुझे यह फैसला महिलाओं और बच्चियों के ख़िलाफ़ यौन अपराधों को हल्का करके देखने वाला प्रतीत होता है. इससे समाज में एक ख़तरनाक संदेश जाता है कि जब तक अत्यंत स्पष्ट और पूर्ण प्रवेश साबित न हो, तब तक अपराध की गंभीरता कम मानी जा सकती है.”
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर क्यों लगी थी रोक
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सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादित फ़ैसले पर रोक लगाई थी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने मार्च 2025 के एक फ़ैसले में कहा था कि ‘सर्वाइवर के स्तन को छूना और पायजामे की डोरी तोड़ने को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश के मामले में नहीं गिना जा सकता है.’
‘वी द वूमेन ऑफ़ इंडिया’ नामक संगठन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया था.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा था कि क्योंकि फ़ैसला ‘पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय नज़रिए को दिखाता है’, इसलिए फ़ैसले पर रोक लगाना ज़रूरी है.
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को इसी महीने की 17 तारीख को ख़ारिज कर दिया है.
फिलहाल, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ आगे की क़ानूनी चुनौती पर निगाहें टिकी हैं. जानकारों का मानना है कि यह मामला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि यौन अपराधों की सुनवाई में कानून की व्याख्या और संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.