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बीते 10 में से 8 सालों में रणजी ट्रॉफी बड़े महानगरों और क्रिकेट के पारंपरिक गढ़ों से बाहर के राज्यों में ही रही है. लेकिन भारत की राष्ट्रीय क्रिकेट चैंपियनशिप में जम्मू और कश्मीर की जीत एक खास घटना है.
यह इतिहास की किताबों में सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि राज्य के क्रिकेट खिलाड़ियों की इतिहास और हालात पर जीत है.
उनके बचपन के अनुभव देश के बाकी हिस्सों के क्रिकेट समुदाय के अनुभवों से बिलकुल अलग हैं. लेकिन इस बारे में हम बाद में बात करेंगे.
इस जीत को समझने के लिए ये बताना जरूरी है कि जम्मू-कश्मीर 1959-60 से रणजी ट्रॉफी में हिस्सा ले रहा है.
पहली बार जम्मू-कश्मीर 2013-2014 में नॉकआउट चरण (अंतिम आठ) में पहुंचा, जहां उन्हें पंजाब से हार का सामना करना पड़ा.
2019-20 सीज़न में जम्मू-कश्मीर क्वार्टर फाइनल तक पहुंचा, लेकिन वहां कर्नाटक से हार गए.
इस सीज़न में वे पूर्व चैंपियन मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद और राजस्थान के साथ एक ही ग्रुप में थे. उन्होंने तीन मैचों में एकतरफा जीत हासिल की, जबकि अपने पहले मैच में मुंबई से घरेलू मैदान पर 35 रन से हार का सामना करना पड़ा.
अपने अनुभवी कप्तान पारस डोगरा (41) के नेतृत्व में, जो अब घरेलू क्रिकेट में अपना 23वां सीजन खेल रहे हैं, जम्मू-कश्मीर ने कठिन प्रतिद्वंद्वियों और परिस्थितियों का सामना करते हुए और अपने तीनों नॉकआउट राउंड, जो सभी घर से दूर खेले गए, में दृढ़ आत्मविश्वास दिखाया है.
(बंगाल के खिलाफ सेमीफाइनल में डोगरा रणजी ट्रॉफी में 10 हजार रन बनाने वाले दूसरे बल्लेबाज बने.)
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आकिब नबी साबित हुए ‘तुरुप का पत्ता’
नॉकआउट मुकाबलों में, जम्मू-कश्मीर ने इंदौर में मध्य प्रदेश, कल्याणी में बंगाल और हुबली में आठ बार के रणजी चैंपियन कर्नाटक को हराया.
उनके टॉप छह बल्लेबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 16 पारियों में सात बार 300 का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया. फाइनल में चोटिल शुभम खजूरिया की जगह खेल रहे कामरान इकबाल ने दूसरी पारी में शतक बनाया.
इस सीज़न में जम्मू-कश्मीर का तुरुप का पत्ता उनके गेंदबाज आकिब नबी थे, जिन्होंने सीजन के अंत तक सबसे ज़्यादा विकेट लिए.
12.64 की औसत से 60 विकेट लेते हुए नबी ने बल्लेबाजी में मजबूत टीमों को ध्वस्त कर दिया. उन्होंने सपाट से सपाट पिचों पर भी शानदार गेंदबाजी करते हुए सात पारियों में पांच विकेट और दो बार चार विकेट लिए. यह सब उन्होंने 17 पारियों में किया.
इस साल अगस्त में होने वाले पहले लाल गेंद के क्रिकेट मैच में नबी का भारतीय टीम में चयन लगभग तय माना जा रहा है.
इस सीजन में नबी ने केएल राहुल, करुण नायर, मयंक अग्रवाल, अभिमन्यु ईश्वरन, अजिंक्य रहाणे और रजत पाटीदार के विकेट लिए हैं.
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पूरा कश्मीर इस फाइनल मैच के लिए टकटकी लगाए बैठा था. प्रोफेसर अमिताभ मट्टू ने मुझे बताया कि श्रीनगर में उनकी मां ने पूरे पांचों दिन टीवी ऑन रखा और घर में काम करने वाले उन्हें हर पल की जानकारी देते रहे.
जब मैंने आज सुबह जम्मू-कश्मीर के पूर्व तेज गेंदबाज और अब कोच अब्दुल कयूम को, जिन्हें कभी जवागल श्रीनाथ के बराबर तेज माना जाता था, बधाई देने के लिए मैसेज किया, तो वे हुबली में थे.
कयूम ने पहले तो मुझे याद दिलाया कि अभी पूरे दिन का खेल बाकी है, लेकिन उन्होंने खुशी-खुशी बधाई स्वीकार कर ली.
जम्मू-कश्मीर के एक अन्य पूर्व तेज गेंदबाज और स्ट्रक्चरल इंजीनियर समीउल्लाह बेग ने घर से हर गेंद पर नजर रखने के लिए शहरी पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग से आधिकारिक छुट्टी ली.
बेग ने 2003 से 2017 के बीच जम्मू-कश्मीर के लिए 61 मैच खेले और 158 विकेट लिए. लेकिन उन्हें विरोधियों की ओर से की गई अपमानजनक टिप्पणियां की याद हैं.
कश्मीरियों को अक्सर कहा जाता था: ‘आप नॉकआउट में नहीं पहुंच सकते, तो क्यों न आप यह मैच हार जाएं और कम से कम हमें टूर्नामेंट में आगे बढ़ने दें.’
बेग उस पहली जम्मू-कश्मीर टीम का हिस्सा थे जो 2012-2013 में नॉकआउट में पहुंची थी, लेकिन आज उन्हें संतुष्टि है, “ऐसी सभी बातों का जवाब मिल गया है.”
बीते दस सालों में जब विदर्भ (तीन बार), सौराष्ट्र (दो बार), गुजरात और मध्य प्रदेश की टीमों ने रणजी ट्रॉफी जीती, तो उन्हें भी ऐसे ही ताने सुनने पड़े होंगे.
लेकिन जम्मू-कश्मीर की यह जीत उन परिस्थितियों से बिल्कुल अलग है जिनमें घाटी और जम्मू के क्रिकेटरों ने अपना करियर बनाया है. प्रतिभा की तो उनमें कभी कमी नहीं रही, लेकिन संसाधनों, बुनियादी ढांचे और अवसरों की कमी रही है, यहां तक कि भारतीय क्रिकेट में आईपीएल के आने के बाद भी.
इसके अलावा, उन्हें अपने आसपास के हालात से जुड़ी अन्य बाधाओं का भी सामना करना पड़ा है. क्रिकेट प्रशिक्षण, मैच, ट्रायल के लिए उन्हें बंकरों, चौकियों, कर्फ्यू, बंद और पुलिस की कार्रवाइयों के बीच से गुजरना पड़ा.
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‘रवैया बदलना होगा’
1980 के दशक में श्रीनगर में खेले गए दो वनडे मैचों में, दर्शकों ने विपक्षी टीम वेस्टइंडीज (भारतीय टीम के खिलाफ) का समर्थन किया था. श्रीनगर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्थलों की सूची से हटाए जाने से पहले ‘आज़ादी, आज़ादी’ के नारे लगाए गए थे.
1980 के दशक में उग्रवाद के चरम पर, सीआरपीएफ की एक बटालियन ने शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम की इमारत पर कब्जा कर लिया था और ड्रेसिंग रूम को गोला-बारूद के स्टोर हाउस में बदल दिया गया था.
तनाव कम होने के बावजूद, घरेलू मैचों के दौरान खिलाड़ी साइट स्क्रीन के पीछे कपड़े बदलते थे और मैचों के दौरान उन्हें अपने लंच बॉक्स भी मेटल डिटेक्टर से गुज़ारने पड़ते थे.
तब से लेकर अब तक देश के सबसे खूबसूरत स्टेडियमों में से एक शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में काफी बदलाव आए हैं, लेकिन फिर भी सीज़न के पहले हिस्से में यहां पर्याप्त मैच नहीं खेले जाते.
पिछले दस सालों में यहां केवल पांच प्रथम श्रेणी के मैच खेले गए हैं, जिनमें से तीन पिछले 18 महीनों में हुए हैं. जब सीज़न जनवरी महीने में प्रवेश करता है, तो शेर-ए-कश्मीर के साथ-साथ गांधी मेमोरियल साइंस कॉलेज का छात्रावास ही उनका दूसरा घरेलू मैदान बन जाता है.
लगभग दस साल पहले जब एक रणजी मैच के दौरान आजादी से जुड़ा एक संदेश मैदान में गूंजा, तो क्रीज पर मौजूद दो बल्लेबाज, एक घाटी से, एक जम्मू से, एक हिंदू और एक मुस्लिम, हंस पड़े.
“यार, लेकिन जीतेंगे-हारेंगे, आज़ादी कहाँ से आएगी?”
आज यह क्षेत्र एक केंद्र शासित प्रदेश है और यहाँ की क्रिकेट एसोसिएशन के अंतिम चुनाव 2015 में हुए थे, जिसके बाद इसका कामकाज एडहॉक कमेटी को सौंप दिया गया.
ऑफ स्पिन ऑलराउंडर परवेज़ रसूल जम्मू और कश्मीर से भारत के लिए खेलने वाले पहले क्रिकेटर बने. उनके बाद तेज गेंदबाज उमरान मलिक ने भी यह उपलब्धि हासिल की.
रणजी ट्रॉफी की इस जीत से इस क्षेत्र के क्रिकेटरों की नई पीढ़ी को क्रिकेट के प्रति उत्साह से प्रेरित होने की प्रेरणा मिलेगी.
लेकिन आज की इस जीत को भारत के कलरफुल और निरंतर बढ़ते क्रिकेट इतिहास का एक और शानदार हिस्सा मानने के लिए, देश के बाकी हिस्सों को न केवल क्रिकेटरों के प्रति बल्कि इस क्षेत्र और यहां के लोगों के प्रति अपने रवैया बदलना होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.