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झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले में चाईबासा व कोलहान वन प्रभाग क्षेत्र में बीते नौ दिन के दौरान एक हाथी ने 20 लोगों की जान ले ली है. इससे इलाके के लोगों में हाथी को लेकर डर है. समाचार लिखे जाने तक हाथी को पकड़ा नहीं जा सका था.
ज़िलाधिकारी चन्दन कुमार ने इन मौतों की पुष्टि की है. प्रभागीय वन अधिकारी कुलदीप मीणा ने कहा, “एक नर हाथी के कारण ऐसे हालात पहली बार बने हैं. इलाके को हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि अब और जानमाल का कोई नुकसान न हो.”
उन्होंने कहा, “तत्काल हर मृतक परिवार को अंतिम संस्कार के लिए वन विभाग की तरफ से बीस हज़ार रुपये की सहायता दी गई है.”
अधिकारियों के अनुसार फ़िलहाल उनकी पहली प्राथमिकता हाथी को पकड़ कर सुरक्षित जंगल में वापस भेजने की है. जिसके लिए बंगाल व ओडिशा की टीमों की सहायता से व्यापक रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया गया है.
अभी जिलाधिकारी चंदन कुमार ने बताया कि जिस वनकर्मी को हाथी ने बुरी तरह घायल किया था शुक्रवार रात में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई है. अब मरने वालों की संख्या 20 हो गई है.
लेकिन स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता मानकी तुबिद वन विभाग के उठाए गए कदमों से असंतुष्ट और चिंतित हैं. वह कहते हैं, “पहली मौत के फ़ौरन बाद ही वन विभाग सक्रिय हो जाता तो इतनी बड़ी संख्या में मौतें न देखनी पड़तीं.”
रास्ते में, घर में घुसकर मार डाला
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1 से 9 जनवरी तक हाथी ने जिन 19 लोगों की जान ली है, उनमें पहले मृतक 34 साल के मंगल सिंह हेम्ब्रम हैं.
वह साल की पहली शाम लगभग छह बजे टोंटो प्रखंड स्थित ग्राम बॉडीजारी में अपने घर जा रहे थे. घर के नज़दीक पहुंचते ही अचानक हाथी ने हमला कर दिया, जिसमें उनकी जान चली गई.
उसी रात दस बजे टोंटो प्रखंड के ग्राम बिरसिंह हातु में उस हाथी ने 62 साल के उरदुब बहॉदा पर हमला किया. परिवार वालों के मुताबिक वे उस समय खेत में धान की रखवाली कर रहे थे.
टोंटो प्रखंड के 22 साल के जगमोहन सवैया की पहचान तीसरे मृतक के तौर पर हुई. उनकी मौत ग्राम कुइलसुते में पांच जनवरी की रात दस बजे हाथी के हमले से हुई.
सदर प्रखंड के ग्राम रोड़ो के निवासी 42 साल के विष्णु सुंडी की मृत्यु एक जनवरी को रात साढ़े ग्यारह बजे घर के बरामदे में सोते समय हुई.
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उनके 25 साल के विकलांग बेटे कुष्णु सुंडी के अनुसार धान की रखवाली के लिए सभी सदस्य बाहर बरामदे में सो रहे थे. अचानक हाथी के आने पर परिवार के सारे सदस्य घर के अंदर घुसे लेकिन उनके पिता विष्णु बाहर की तरफ भागे.
वह कहते हैं, “अचानक बाबा गिर गए और हाथी ने पैर पकड़ कर घसीट लिया. उसके बाद उनको पटक दिया. जिससे बाबा की मौत हो गई. हम सभी डरे सहमे बाबा को मरते हुए देखते रहे.”
बेटे के विकलांग होने के कारण परिवार में कमाने वाले अकेले विष्णु थे जो लकड़ियां बेचकर महीने में ढाई से तीन हज़ार रुपये कमाते थे. अब ये ज़िम्मेदारी विष्णु के कंधों पर है.
गोईलकेरा में मारे गए छह लोगों में से एक सायतबा गांव निवासी 13 साल के रेगा कायम थे. वह दो जनवरी को खलियान में सो रहे थे. लगभग 11 बजे हाथी के आने का शोर सुनकर वह अपने घर की तरफ भागे लेकिन हाथी से बच न सके.
किनतेपी गांव निवासी मृतक और 47 साल की चंपा कुई तीन जनवरी की सुबह चार बजे अपने खलियान में धान की देखरेख करने गई थीं, तभी हाथी ने हमला कर उनकी जान ले ली.
‘ज़रा भी पता होता तो मेरा परिवार ज़िंदा होता’
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चार जनवरी की रात 11 बजे गांव बिला के जोंगा कुई की जान भी हाथी ने ले ली. उनकी उम्र 56 साल थी. उनके परिवार वाले बताते हैं, “उनको पता चला कि उनके खलियान में हाथी धान खा रहा है. वह टॉर्च लेकर उसे भगाने के लिए पहुंचे लेकिन हाथी ने जोंगा कुई को पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया.”
गोईलकेरा प्रखंड के गम्हरिया पंचायत स्थित ग्राम सोवाँ के कुंदरा बहॉदा, छह साल की बेटी कोदमा बहॉदा और आठ साल के बेटे सामु बहॉदा की जान भी हाथी ने ले ली.
पांच जनवरी की रात आठ बजे कुंदरा घर के बाहर रखे धान की रखवाली के लिए परिवार सहित बाहर सो रहे थे. उनकी पत्नी पुंडी टोपनो कहती हैं, “हमें आसपास हो चुके हाथी के हमलों के बारे में कुछ भी पता नहीं था. ज़रा सी भी जानकारी होती तो मेरा परिवार आज ज़िंदा होता.”
उस रात जब अचानक हाथी ने हमला किया तो पुंडी अपनी दो साल की बेटी जिंगी को लेकर भागीं. जिंगी उसी दौरान गिर कर घायल हो गई. छह साल की बेटी कोदमा और आठ साल के बेटे सामु को बचाने की कोशिश में कुंदरा हाथी की चपेट में आ गए.
पुंडी कहती हैं, “मैं घायल जिंगी को लिए असहाय होकर देखती रही और मेरे पति, बेटे और बेटी एक-एक करके अपनी जान गंवाते चले गए.”
किसी तरह खुद को बचाने वालीं पुंडी फिलहाल अपनी घायल बेटी का इलाज राउरकेला के अस्पताल में करवा रही हैं.
वह कहती हैं, “बेटी के इलाज के कारण मुझ बदकिस्मत को पति, बेटे व बेटी का अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हो सका.”
गांव के मुखिया उदय चेरवा ने अन्य ग्रामीणों की सहायता से तीनों मृतकों का अंतिम संस्कार करवाया. लेकिन मिट्टी के घर में जीवन यापन करने वाली पुंडी के परिवार में अब कोई कमाने वाला नहीं है.
छह जनवरी की रात में छह मौत
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नोवामुंडी प्रखंड स्थित लगभग ढाई हज़ार की आबादी वाले बाबाड़िया गांव के बाहरी हिस्से में सनातन मेरेल का मिट्टी का घर है.
उन्होंने नज़दीक ही खलियान बना रखा था. छह जनवरी की रात वहां पुआल से बने एक कुम्बा के नीचे परिवार के सभी छह सदस्य सो रहे थे.
रात ग्यारह बजे अचानक पहुंचे हाथी ने पहले कुम्बा को तहस-नहस कर दिया. फिर वहां 50 साल के सनातन मेरेल, उनकी पत्नी जोलको कुई, नौ साल की बेटी दमयंती मेरेल और पांच साल के बेटे मुंगड़ू मेरेल की जान ले ली. ग्यारह साल के जयपाल मेरेल और उनकी पांच वर्षीय छोटी बहन सुशीला किसी तरह बच गए.
गांव के मुखिया संजीत कुमार कहते हैं, “सनातन के जाने के बाद अब उसके बेटे जयपाल व घायल बेटी सुशीला के परवरिश की ज़िम्मेदारी कौन उठाएगा?”
बाबाड़िया गांव के दूसरे छोर पर रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे खलियान में पुआल के कुम्बा में अपने सात साल के भतीजे हिंदू लागूरी और 10 साल के गोमिया लागूरी के साथ सो रहे 28 वर्षीय गुरुचरण लागूरी पर भी हाथी ने हमला कर दिया.
हाथी के जाने के बाद गुरचरण के बड़े भाई हेमंत लागूरी तीनों को लेकर अस्पताल पहुंचे. वह कहते हैं, “मेरे भाई का पेट फट चुका था. हिंदू और गोमिया घायल पड़े थे.”
गुरुचरण की मौत हो गई है और उनके दोनों भतीजों का इलाज चल रहा है.
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गुरुचरण की पत्नी का देहांत पहले ही हो गया था. उनके परिवार में उनकी 60 वर्षीय मां जेमा कुई के अलावा पांच साल का बेटा मोरन सिंह है. उनके भरण पोषण की ज़िम्मेदारी भाई हेमंत लागूरी के कंधों पर आ गई है.
इन पांच मौतों के बाद उस रात छठी मौत मंगल बोबोंगा (25) की हुई. जो बाबाड़िया गांव के नज़दीकी गांव बड़ा पासेया में अपने खलियान में सोए थे. रात साढ़े बारह बजे हाथी के हमले से उनकी मौत हो गई.
जगन्नाथपुर प्रखंड के सियालजोड़ा गांव की 47 वर्षीय टिपिरया हेम्ब्रम जब सात जनवरी की सुबह छह बजे घर से शौच के लिए निकली थीं. हाथी ने पीछे से आकर उन पर हमला कर दिया, जिससे उनकी मौत हो गई.
चाईबासा डिवीज़न के डीएफओ आदित्य नारायण ने बताया, “शुक्रवार की सुबह मझगांव प्रखंड के झारखंड-ओडिशा सीमा क्षेत्र में स्थित बेनीसागर गांव में जंगली हाथी के हमले में दो लोगों की दर्दनाक मौत हो गई.”
मृतकों की पहचान 40 वर्षीय प्रकाश मालवा और एक नाबालिग बच्चे के रूप में हुई है.
इन मौतों को लेकर मनकी तुबिद कहते हैं, “वन विभाग को यह अध्ययन करना होगा कि हाथी जैसा समझदार जानवर अचानक इतना आक्रामक क्यों हो गया कि उसने उन्नीस लोगों की जान ले ली.”
इतनी आक्रामकता क्यों
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उन्नीस लोगों की मौत के पीछे इस हाथी की आक्रमकता का कारण क्या हो सकता है?
इस सवाल पर कोल्हान डीएफओ कुलदीप मीणा कहते हैं, “ऐसा लग रहा है कि यह हाथी मेटिंग स्टेज में है. इस समय प्रजनन हार्मोन टेस्टोस्टेरोन में भारी वृद्धि के कारण सिंगल मेल हाथी अत्यधिक आक्रामक हो जाता है. यह समय के साथ पंद्रह-बीस दिनों में ठीक हो जाता है.”
अधिकारियों ने अंदेशा जताया है कि यह हाथी अपने झुंड से अलग होकर भटक गया है.
वह कहते हैं, “इसीलिए हाथी को ट्रेस कर सुरक्षित तरीके से जंगल में छोड़ना ज़रूरी है ताकि वह अपने झुंड में शामिल हो सके.”
लेकिन चाईबासा वन प्रमंडल पदाधिकारी आदित्य नारायण के अनुसार नर हाथी की अंतिम लोकेशन शुक्रवार की शाम तक ट्रेस नहीं हो सकी थी.
कुलदीप मीणा के अनुसार, “हाथी जवान और काफ़ी फुर्तीला है, जिस कारण वह तेज़ी से अपना स्थान बदलता है, ख़ास कर रात में.”
डीएफ़ओ आदित्य नारायण के मुताबिक, “इस समय जहां से भी हाथी की सूचना मिलती है, उनकी टीम फ़ौरन उसी दिशा में निकल जाती है.”
वह कहते हैं, “कोशिशें जारी हैं. स्थानीय टीम रात घरों से बाहर निकलने, बाहर सोने आदि के लिए मानकी-मुंडा (स्थानीय ढोल) की सहयता से लोगों को आगाह कर रही है.”
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जानकारी के अनुसार वन विभाग ने 10 विशेष टीमों में लगभग 100 से अधिक लोगों को इस रेस्क्यू ऑपरेशन में लगाया है, साथ ही ड्रोन की भी मदद ली जा रही है.
पीड़ितों के लिए मुआवज़े का क्या प्रावधान है? इस सवाल पर कुलदीप मीणा कहते हैं कि मृत्यु पर पीड़ित परिवार को चार लाख रुपए बतौर मुआवज़ा दिया जाता है, जबकि घायल के लिए परिस्थिति के अनुसार अधिकतम डेढ़ लाख रुपए दिए जाते हैं.
स्थानीय जिलाधिकारी चंदन कुमार ने बीबीसी से कहा, “सभी मृतकों के परिवार बेहद गरीब हैं जो मिट्टी के घरों में रहते हैं. इसलिए उनको आवास योजना का तत्काल लाभ दिया जाएगा.”
“वन विभाग की तरफ से दिए जाने वाले मुआवज़े के अलावा ज़िला प्रशासन विधिवत रूप से राज्य व केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं से पीड़ित परिवारों को सहायता देगा.”
बढ़ेगा हाथी-मानव संघर्ष
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वन विभाग के अनुसार कोलहान व चाईबासा वन क्षेत्र में लगभग 53 हाथी अलग-अलग झुंड में मौजूद हैं.
सरकारी डेटा के अनुसार हाथियों के द्वारा किए गए हमलों से झारखंड में साल 2019 से 2024 के बीच चार सौ चौहत्तर लोगों की मौत हुई है.
लेकिन मौजूदा मौतों पर 1976 से हाथियों पर शोध करने वाले रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डीएस श्रीवास्तव कहते हैं, “हाथी मानव द्वंद्व के ये आंकड़े आने वाले वर्षों में बढ़ेंगे.”
वजह पूछने पर वह कहते हैं, “जंगल कटने से हाथियों के भोजन की समस्या बढ़ रही है. हाथियों के रास्तों में आप हाईवे बना रहे हैं, ओपन कास्ट माइनिंग कर रहे हैं, रेलवे लाइन निकाल रहे हैं, कैनाल निकाल रहे हैं, तो उनके मूवमेंट वाले गलियारे में जब रोड़ा आएंगे तो स्वाभाविक है सबसे अक्लमंद जानवर हमारे प्रति हमलावर हो जाएंगे.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.