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पाकिस्तान सरकार ने फ़ैसला किया है कि उनकी क्रिकेट टीम आईसीसी टी-20 वर्ल्ड कप में भाग लेने के लिए श्रीलंका जाएगी, लेकिन भारत के ख़िलाफ़ मैच में ‘मैदान पर नहीं उतरेगी.’
इस फ़ैसले ने क्रिकेट जगत को हालिया सालों के सबसे बड़े संकट में डाल दिया है.
आईसीसी प्रतियोगिताओं में टीमों के मैच छोड़ने का यह पहला मामला नहीं है.
कब-कब टीमों ने क़दम पीछे खींचे?
साल 1996 वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज़ ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए श्रीलंका जाने से इनकार कर दिया था.
वर्ल्ड कप शुरू होने से कुछ सप्ताह पहले कोलंबो में गृहयुद्ध के दौरान अब तक का सबसे भीषण चरमपंथी हमला हुआ था.
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इस दौरान श्रीलंका सेंट्रल बैंक पर बमबारी हुई थी. इस हमले में 91 लोग मारे गए थे और 1400 से अधिक लोग घायल हुए थे.
साल 2003 में इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे की यात्रा करने से इनकार कर दिया था और न्यूज़ीलैंड ने कीनिया की यात्रा न करने का फ़ैसला अलग-अलग कारणों से लिया था.
ब्रिटिश सरकार हरारे में रॉबर्ट मुगाबे के शासन के ख़िलाफ़ रुख अपना रही थी और उसने टीम को यात्रा न करने का आदेश दिया था. न्यूज़ीलैंड सरकार ने अपने प्रतिनिधिमंडल को नैरोबी की यात्रा न करने का निर्देश दिया था, क्योंकि कुछ महीने पहले मोम्बासा में बम विस्फोट हुआ था.
इसके बाद भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं. ज़िम्बाब्वे को इंग्लैंड में आयोजित 2009 टी-20 वर्ल्ड कप से हटने के लिए राज़ी किया गया था, क्योंकि उनके खिलाड़ियों को वीज़ा मिलने में दिक्कतें आ रही थीं.
ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा चिंताओं के कारण बांग्लादेश में आयोजित 2016 अंडर-19 वर्ल्ड कप से नाम वापस ले लिया था.
लेकिन इनमें से कोई भी मामला मौजूदा स्थिति जैसा नहीं है.
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इस बार क्यों है अलग मामला?
पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ न खेलने का यह फ़ैसला आईसीसी के बांग्लादेश को लेकर लिए गए निर्णय के विरोध में लिया है. यह फ़ैसला कई मायनों में अलग है.
बांग्लादेश पहले ही टूर्नामेंट से हट चुका है. बांग्लादेश ने आईसीसी को भारत में उनकी टीम की सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र उसके मैचों को श्रीलंका ट्रांसफ़र करने का प्रस्ताव दिया था जिसमें इसके ख़िलाफ़ मतदान हुआ था.
आईसीसी की कार्यकारी समिति में पाकिस्तान एकमात्र देश था, जिसने भारत से बाहर अपने मैच आयोजित करने की बांग्लादेश की इच्छा का समर्थन किया था.
भारत के ख़िलाफ़ न खेलने की घोषणा करके पाकिस्तान ने बांग्लादेश के समर्थन में एक और क़दम बढ़ाया है.
यह स्पष्ट रूप से एक राजनीतिक संदेश है. यह न केवल बांग्लादेश से जुड़ा है, बल्कि इससे भी ज़्यादा यह पिछले साल भारतीय टीम के पाकिस्तानी टीम से हाथ मिलाने से इनकार करने और फिर एसीसी प्रमुख मोहसिन नक़वी से एशिया कप ट्रॉफ़ी स्वीकार न करने की प्रतिक्रिया है. नक़वी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख होने के साथ-साथ देश के गृह मंत्री भी हैं.
यह निर्णय पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट के समर्थकों की सोच को ध्यान में रखता है.
क्रिकेट के नज़रिए से देखा जाए तो बांग्लादेश को लेकर आईसीसी बोर्ड के फ़ैसले के ख़िलाफ़ यह पहला विरोध है और इसके साथ ही बीसीसीआई के ख़िलाफ़ भी. क्रिकेट जगत में कम से कम पिछले 15 सालों में ऐसा नहीं हुआ है.
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पाकिस्तान पर क्या असर होगा?
हालांकि इससे वर्ल्ड कप में पाकिस्तानी टीम पर दबाव बढ़ेगा, लेकिन फ़िलहाल इस पहलू पर ज़्यादा चर्चा नहीं हो रही है.
ऑनलाइन और सोशल मीडिया पर इस विषय पर काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है. इनमें अज्ञात आईसीसी अधिकारियों के हवाले से कहा जा रहा है कि बहिष्कार के पाकिस्तान के लिए वित्तीय परिणाम हो सकते हैं. साथ ही खेल में उनकी प्रतिष्ठा और पहचान पर असर की बातें भी सामने आ रही हैं.
25 करोड़ डॉलर के जुर्माने की चर्चा भी है, लेकिन वहीं इसका दूसरा पहलू आईसीसी की कमाई और भारत-पाकिस्तान मैचों के मीडिया सौदों में अहम योगदान का भी है. आईसीसी ने भारत-पाकिस्तान मैच को विश्व क्रिकेट की ‘कामधेनु’ के रूप में पेश किया है.
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक तनाव के चलते हम इस स्थिति तक पहुंचे हैं, क्योंकि दोनों देश द्विपक्षीय क्रिकेट नहीं खेलते. इस प्रतिद्वंद्विता को दोनों देशों के लाखों प्रशंसक तभी देख पाते हैं, जब आईसीसी के किसी टूर्नामेंट में भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे के सामने होते हैं.
आईसीसी के अनुसार साल 2023 के भारत-पाकिस्तान वर्ल्ड कप मैच को ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर एक साथ देखने वालों की संख्या 3.5 करोड़ थी. इसमें भारत के बाहर या केबल चैनलों के दर्शक शामिल नहीं हैं.
हाल के वर्षों में आईसीसी ने जानबूझकर यह सुनिश्चित किया है कि दोनों टीमें उसके आयोजनों में जितना हो सके ज़्यादा मैच खेल सकें. हर आईसीसी टूर्नामेंट में भारत और पाकिस्तान को एक ही समूह में रखा जाता है.
हर टूर्नामेंट के कार्यक्रम में दोनों टीमों के संभावित नॉकआउट मुकाबलों के लिए वैकल्पिक वेन्यू पहले से तय होते हैं.
हाल के वर्षों में भारत आईसीसी प्रतियोगिताओं के लिए भी पाकिस्तान जाने से इनकार करता रहा है. दूसरी ओर पाकिस्तान भारत में मैच खेलता रहा है.
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आईसीसी पर उठते सवाल
साल 2024 के अंत में एक फ़ॉर्मूला सामने आया, जिसके तहत पाकिस्तान ने कहा कि वह भारत के साथ केवल तटस्थ मैदान पर ही खेलेगा. यह बीसीसीआई के लिए फ़ायदे का सौदा था.
आईसीसी ने भारत और बांग्लादेश के लिए सुरक्षा चिंताओं को लेकर अलग-अलग मापदंड अपनाए हैं. पिछले साल चैंपियंस ट्रॉफ़ी से पहले भारत की सुरक्षा चिंताओं और अब मुस्तफ़िज़ुर के आईपीएल कॉन्ट्रेक्ट के बाद बांग्लादेश द्वारा उठाई गई चिंताओं पर आईसीसी का रुख़ अलग-अलग रहा है.
बांग्लादेश के सहयोगी के रूप में पाकिस्तान के सामने आने से विश्व क्रिकेट के समीकरणों में पुराने और परिचित पैटर्न में नाटकीय बदलाव आया है.
फ़िलहाल गतिरोध की स्थिति बनी हुई है. ऐसा नहीं लगता कि बांग्लादेशी, भारतीय या पाकिस्तानी बोर्ड अपने-अपने रुख़ से पीछे हटेंगे.
आईसीसी पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं और इस बार भी स्थिति उनके लिए असहज है. प्रतिबंधों और जुर्मानों की बातों को अनाम सूत्रों के हवाले से सामने रखकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना असरदार नहीं होगा.
टी-20 वर्ल्ड कप 2026 की साख को नुकसान पहुंचा है और क्रिकेट का खेल असल मुद्दों से भटक गया है. आईसीसी के शीर्ष स्तर पर परिपक्व और दूरदर्शी नेतृत्व की कमी ने ही इस हालात को जन्म दिया है.
लॉस एंजिल्स में 126 साल बाद ओलंपिक में वापसी करने वाला यह खेल आज कुछ झगड़ालू स्कूली बच्चों के समूह जैसा दिख रहा है, जिन पर एक दबंग हुकूमत चला रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.