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पहले विदेश की धरती पर अमेरिकी ताक़त का ऐसा आक्रामक प्रदर्शन हुआ होता तो रूस की ओर से तुरंत और तीखी प्रतिक्रिया होती.
लेकिन 2026 की शुरुआत से ही तस्वीर अलग दिख रही है.
अमेरिका ने वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ने का जश्न मनाया. रूसी झंडे वाले एक तेल टैंकर को ज़ब्त किया और ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की धमकियों को फिर से दोहराया.
इसके बावजूद क्रेमलिन और उससे जुड़े सरकारी टिप्पणीकार हैरान करने वाली चुप्पी साधे हुए हैं.
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यह संयम उस सरकार के लिए एक बड़ा बदलाव है, जो लंबे समय से ख़ुद को पश्चिमी देशों की ओर से कराए जाने वाले सत्ता परिवर्तन और संसाधनों को ज़ब्त किए जाने का विरोधी बताती रही है.
रूस ने अमेरिका के असर को बैलेंस करने के लिए वेनेज़ुएला और आर्कटिक जैसे इलाक़ों में भारी निवेश भी किया है.
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अब तक इन घटनाक्रमों पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
साल की शुरुआत के बाद से वो सार्वजनिक रूप से सिर्फ़ 6 जनवरी को ऑर्थोडॉक्स क्रिसमस की एक टीवी पर प्रसारित धार्मिक सभा में ही दिखाई दिए हैं.
उनके प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव और रूसी सरकारी टीवी चैनलों ने भी छुट्टियों के दौरान इस मुद्दे पर लगभग चुप्पी साधे रखी है.
यह ख़ामोशी शायद इस बात का संकेत है कि रूस नहीं चाहता कि डोनाल्ड ट्रंप के ताज़ा अंतरराष्ट्रीय दांव को लेकर यूक्रेन पर अमेरिका के साथ चल रही व्यावहारिक, लेकिन नाज़ुक बातचीत को नुक़सान पहुंचे.
विशेष सैन्य अभियान
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डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2026 की शुरुआत ताक़त के एक नाटकीय प्रदर्शन के साथ की.
उन्होंने वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ने और उन्हें नशीले पदार्थों की तस्करी के आरोपों में न्यूयॉर्क ले जाने का आदेश दिया और यह भी कहा कि ये लैटिन अमेरिकी देश फ़िलहाल अस्थायी रूप से अमेरिकी नियंत्रण में है.
हालांकि छुट्टियों के दौरान रूसी सरकारी टीवी पर करेंट अफ़ेयर्स प्रोग्राम की संख्या कम कर दी गई थी, लेकिन प्रमुख सरकारी मीडिया से जुड़े विश्लेषकों ने मादुरो को हटाए जाने को तेज़ी से रूस के हित में पेश किया. इसने कहा कि ये घटनाक्रम रूस के हित में है.
कुछ ऑनलाइन विश्लेषणों में दलील दी गई कि अपने प्रभाव क्षेत्र में वर्चस्व दिखाकर अमेरिका ने परोक्ष रूप से क्रेमलिन को भी ऐसा करने की छूट दे दी है.
क्रेमलिन समर्थक टिप्पणीकारों ने इस क़दम को ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का व्यावहारिक उदाहरण बताया, जिसे पिछले साल दिसंबर में जारी किया गया था.
ख़ास तौर पर इसके ‘प्रभाव क्षेत्रों’ और महाशक्तियों के विशेष अधिकारों पर ज़ोर देने के लिए.
मादुरो की गिरफ़्तारी पर टिप्पणी करते हुए, क्रेमलिन के क़रीबी विदेश नीति विशेषज्ञ फ़्योदोर लुक्यानोव ने नई अमेरिकी सुरक्षा रणनीति का ज़िक्र किया.
उन्होंने बिज़नेस अख़बार कोमर्सांत से कहा, ”ट्रंप थ्योरी यह साफ़ करती है कि प्रभाव क्षेत्र एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय संबंधों का अहम हिस्सा बन रहे हैं’.’

रूसी सांसद और सरकारी टीवी प्रस्तोता येवगेनी पोपोव ने माना कि अमेरिका की हालिया कार्रवाइयां रणनीतिक स्तर पर रूस के लिए ‘असहज’ हैं, लेकिन उन्होंने भरोसा जताया कि लंबी अवधि में ये रूस के लिए रणनीतिक रूप से ‘फ़ायदेमंद’ साबित होंगी.
पोपोव ने टेलीग्राम पर लिखा, “जो कुछ हो रहा है, वह हमारे हाथ खोल रहा है और बाहरी मोर्चे पर दबाव कम कर रहा है. वैश्विक मंच पर झटका एक ऐसा अवसर है, जिसे हमें इस्तेमाल करना ही होगा.”
कुछ क्रेमलिन समर्थक टिप्पणीकारों ने तो अमेरिका की तेज़ और निर्णायक कार्रवाई के लिए अनिच्छा से ही सही, सम्मान जताया.
ऐसी कार्रवाई की कभी रूस ने खुद यूक्रेन में कल्पना की थी, लेकिन वहां हालात एक पूर्ण युद्ध में बदल गए, जो अब अपने पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है.
रूसी सरकारी मीडिया आरटी की प्रधान संपादक मार्गरीटा सिमोनयान ने टेलीग्राम पर लिखा कि अमेरिकी कार्रवाई से ‘ईर्ष्या’ हो रही है.
इस मैसेजिंग के पीछे एक ज़्यादा साधारण हक़ीक़त भी है. मादुरो की गिरफ़्तारी क्रेमलिन के लिए एक झटका है.

रूस का दशकों तक वेनेज़ुएला में भारी निवेश
रूस ने दशकों तक वेनेज़ुएला में भारी निवेश किया था लेकिन यूक्रेन युद्ध में संसाधन और ध्यान फंसने के कारण क्षेत्र में उसका प्रभाव कमज़ोर पड़ गया.
जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज़ के यूरेशिया नॉनप्रोलिफरेशन प्रोग्राम की निदेशक हाना नोटे ने बीबीसी मॉनिटरिंग से कहा कि वेनेजुएला पर तीखी आलोचना से रूस का बचना इस बात को दिखाता है कि रूसी राष्ट्रपति इस समय ट्रंप को नाराज़ नहीं करना चाहते, क्योंकि उनके सामने ”इससे कहीं बड़े मुद्दे हैं.”
उन्होंने कहा कि रूस की प्राथमिकता या तो ट्रंप को यूक्रेन के मुद्दे पर अपने पक्ष में करना है या कम से कम उन्हें पूरी तरह रूस के ख़िलाफ़ जाने से रोकना है.
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“पिछले एक साल में क्रेमलिन इसमें काफ़ी हद तक सफल रहा है और वह इस सफलता को बनाए रखना चाहता है, क्योंकि यूक्रेन उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है.”
लुक्यानोव ने भी इसी बात को दोहराते हुए कहा कि मॉस्को, अमेरिका जैसे ”बेहद अहम खिलाड़ी” के साथ अपनी व्यापक रणनीति को वेनेज़ुएला जैसे सेकेंडरी मुद्दों पर दांव पर नहीं लगाएगा.
उन्होंने अख़बार कोमर्सांत से कहा, “पुतिन के पास ट्रंप के साथ चर्चा के लिए कहीं ज़्यादा गंभीर मुद्दा है- यूक्रेन.”
रूस के विदेश मंत्रालय ने 6 जनवरी को जारी एक आधिकारिक बयान में वेनेज़ुएला की नई अंतरिम नेता डेल्सी रोड्रिगेज की नियुक्ति का स्वागत किया.
बयान में इसे बाहरी दबाव के बीच स्थिरता की दिशा में उठाया गया क़दम बताया गया.
मंत्रालय ने कहा कि वेनेज़ुएला को यह अधिकार सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वह ”किसी भी विनाशकारी बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपना भविष्य खुद तय करे” और इस दौरान अमेरिका का सीधे तौर पर कोई उल्लेख नहीं किया गया.
गहरे समुद्र में बड़ा दांव
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रूसी झंडे वाले तेल टैंकर मारीनेरा को अमेरिका की ओर से ज़ब्त किए जाने पर रूस की प्रतिक्रिया भी अपेक्षाकृत संयमित रही.
रूस के विदेश मंत्रालय ने रूसी क्रू सदस्यों की सुरक्षित वापसी की मांग की.
मंत्रालय का कहना है कि इस पर ट्रंप सहमत हो गए हैं.
साथ ही उसने अपनी आलोचना को मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय समुद्री क़ानून के उल्लंघन के संदर्भ में रखा.
हालात को देखते हुए. यानी खुले समुद्र में अमेरिकी सशस्त्र बलों की ओर से रूस में रजिस्टर्ड और रूस के स्वामित्व वाले जहाज़ पर चढ़ाई तक.
लेकिन रूस की प्रतिक्रिया कहीं ज़्यादा कड़ी हो सकती थी.
इसके बावजूद रूस ने न तो टैंकर की वापसी की मांग की है और न ही यह संकेत दिया है कि वह बल प्रयोग कर जहाज़ वापस लेगा, जबकि इस क्षेत्र में रूसी नौसैनिक जहाज़ों की मौजूदगी की ख़बरें हैं.
रूस ने अमेरिकी या किसी अन्य विदेशी झंडे वाले जहाज़ों के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई के संकेत भी नहीं दिए हैं.
रूस के इस संयम को कट्टरपंथियों की आलोचना का सामना करना पड़ा है.
उन्होंने अमेरिका की आक्रामकता के सामने नरम रुख़ अपनाने का आरोप लगाया है.
सांसद अलेक्सी झुरावल्योव ने सैन्य जवाब की मांग करते हुए कहा कि बदले में रूस को ”अमेरिकी कोस्ट गार्ड की एक-दो नावें टॉरपीडो से डुबो देनी चाहिए.”
क्रेमलिन समर्थक टेलीग्राम ब्लॉग विज़नर ने अपने पाठकों को याद दिलाया कि तटस्थ जलक्षेत्र में टैंकर को ज़ब्त करना ”रूस पर पूरी तरह से हमला” माना जा सकता है.
ब्लॉग ने यह भी जोड़ा कि ”समुद्री मार्गों की सैन्य नाकाबंदी युद्ध की घोषणा का स्पष्ट कारण होती है.”
आर्कटिक को लेकर महत्वाकांक्षाएं
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जनवरी 2025 में क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था कि रूस ग्रीनलैंड से जुड़े घटनाक्रमों पर ‘क़रीबी नज़र’ रखे हुए है.
लेकिन उसने डेनमार्क के स्वामित्व वाले इस आर्कटिक क्षेत्र पर अमेरिका के दावों को अमेरिका और डेनमार्क के बीच का द्विपक्षीय मामला बताया था.
7 जनवरी को ट्रंप ने बयान दिया कि अमेरिका इस क्षेत्र पर नियंत्रण करने का इरादा रखता है. लेकिन अब तक क्रेमलिन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.
इस बीच, रूस समर्थक आवाज़ें ट्रंप के ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की नई ज़िद को लेकर मानो खुश दिखीं.
उन्होंने इसे यूरोप की कमज़ोरी का संकेत बताया और यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों को सही ठहराने के लिए एक और तर्क के रूप में पेश किया.
पुतिन के विशेष दूत किरिल दिमित्रीयेव ने एक्स पर तंज़ कसते हुए लिखा, “ग्रीनलैंड लगभग तय लग रहा है. यूरोपीय संघ वही करता रहेगा, जो जागीरदार सबसे बेहतर करते हैं: ‘स्थिति पर नज़र रखना’ और दोहरे मानदंडों का उदाहरण पेश करना.” उन्होंने आगे जोड़ा, “अब अगला कनाडा?”
हालांकि 6 जनवरी को सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप के शीर्ष सहयोगी स्टीफ़न मिलर की ओर से पेश की गई “ताक़त ही सही है” वाली राजनीति की ओर अंतरराष्ट्रीय झुकाव को रूस भले ही मंज़ूरी देता दिखे. लेकिन ग्रीनलैंड के मामले में रूस के लिए नुक़सान का जोख़िम भी है.
रूस ने आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य और आर्थिक ढांचे में भारी निवेश किया है.
राष्ट्रपति पुतिन ने यहां “रूस की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को मज़बूत करने” का वादा किया है.
2023 में जारी रूस की नई विदेश नीति अवधारणा में आर्कटिक को मॉस्को की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में दूसरा स्थान दिया गया था.
इससे ऊपर सिर्फ पूर्व सोवियत देशों, जिनमें यूक्रेन भी शामिल है, के साथ संबंध रखे गए हैं.
12 जनवरी को रूस में कामकाज फिर शुरू होने पर राष्ट्रपति पुतिन से उम्मीद की जाएगी कि वे छुट्टियों के दौरान पैदा हुई भू-राजनीतिक उथल-पुथल पर अपनी बात रखें.
लेकिन फ़िलहाल ट्रंप प्रशासन के विदेश नीति से जुड़े क़दमों में मॉस्को के साथ संवाद के दरवाजे़ बंद होते नहीं दिखते.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.