समिति ने मंत्रालय से कहा है कि वह ठेका देने से पहले अधिक सख्त वित्तीय जांच के साथ ही यह सुनिश्चित करे कि केवल प्रमाणित वित्तीय क्षमता वाली कंपनियां बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं ले सकें और वे खामियों को ठीक करने के लिए मरम्मत के कार्यों में हीलाहवाली न करें। समिति ने इस पर भी चिंता जताई है कि प्रोजेक्टों में खामियां बाधा आने तक पता नहीं चलती।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सड़क निर्माण के ठेके देने में ठेकेदारों की सख्त वित्तीय जांच में सड़क परिवहन मंत्रालय की विफलता पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए सड़क परिवहन संबंधी संसदीय स्थाई समिति ने कहा है कि इस कमजोरी के कारण ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां ठेकेदार पैसों के संकट के कारण अपनी जिम्मेदारी पूरा नहीं कर सके।
इसके चलते प्रोजेक्टों में देरी भी हुई और उनकी गुणवत्ता भी प्रभावित हुई। बुनियादी ढांचा से जुड़ी परियोजनाओं में लंबे समय तक गतिरोध रहने पर चिंता जताते हुए समिति ने कहा कि जिन ठेकेदारों को परियोजनाएं दी गईं, उनमें से कई के पास अपना काम जारी रखने के लिए वित्तीय क्षमता ही नहीं थी। स्पष्ट है कि ठेकेदार चयन प्रक्रिया में अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता थी।
डिफेक्ट लायबिलिटी में लचर रवैया
ठेकेदारों की जवाबदेही के लिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने खामियों को ठीक करने की जिम्मेदारी तय की है, लेकिन ठेकेदार बिना आर्थिक दंड के अपने स्तर पर इस प्रविधान का पालन नहीं कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि डिफेक्ट लायबिलिटी यानी दोष दायित्व की व्यवस्था लागू करने के मामले में लचर रवैया अपनाया जा रहा है।
समिति ने जताई चिंता
- समिति ने इस पर भी चिंता जताई है कि प्रोजेक्टों में खामियां तब तक पता नहीं चलतीं जब तक कोई बड़ी बाधा न खड़ी हो जाए। इसका कारण यह है कि रियल टाइम निगरानी का कोई ढांचा मौजूद नहीं है। यह ढांचा महत्वपूर्ण राजमार्ग परियोजनाओं में भी नदारत है और इसका असर निर्माण की गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
- समिति ने नई बनी सड़कों के समय से पहले उनकी सतह के खराब होने पर चिंता जताते हुए यह जानना चाहा है कि क्या मौजूदा निगरानी तंत्र इंजीनियरिंग मानकों का पालन सुनिश्चत करने के लिए पर्याप्त है।
सीबीआई के नये कानून की सिफारिश
एक संसदीय समिति ने गुरुवार को सिफारिश की कि सीबीआई के लिए एक नया कानून बने ताकि एजेंसी बिना राज्यों की अनुमति के राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता से जुड़े मामलों की जांच कर सके। वहीं, एजेंसी में प्रतिनियुक्ति पर उम्मीदवारों की कमी का मामला उठाते हुए समिति ने विशेषज्ञों के लिए लैटरल एंट्री की सिफारिश की।
लैटरल एंट्री भी शुरू करने की सिफारिश
इस कानून के लिए राज्यों के विचार लिए जा सकते हैं। कानून में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपाय भी शामिल होने चाहिए, इससे राज्य सरकारें खुद को शक्तिहीन महसूस नहीं करेंगी। समिति ने बताया कि आठ राज्यों द्वारा सीबीआई जांच के लिए सहमति वापस ले ली गई, जिससे भ्रष्टाचार और संगठित अपराध की जांच करने की इसकी क्षमता गंभीर रूप से सीमित हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सीबीआई में प्रतिनियुक्ति के लिए उचित नामांकन की कमी से परिचालन क्षमता पर असर पड़ रहा है।
प्रमुख कारणों में उन विभागों में कर्मियों की कमी है, जहां से इसे कर्मचारी मिलें, राज्य पुलिस की अनिच्छा, दस्तावेज बनाने की प्रक्रिया में देरी और कुशल कर्मचारियों की पहचान ना होना शामिल है। इसमें सिफारिश की गई है कि प्रतिनियुक्ति पर निर्भरता कम की जाए और एजेंसी एसएससी, यूपीएससी या केवल अपनी विशेष परीक्षा के जरिये उप पुलिस अधीक्षक, निरीक्षक और उप-निरीक्षक जैसे मुख्य पदों पर सीधी भर्ती की अनुमति देकर स्वतंत्र भर्ती का ढांचा विकसित करे। इसे साइबर अपराध, फोरेंसिक, वित्तीय धोखाधड़ी और कानूनी क्षेत्रों में विशेषज्ञों के लिए लैटरल एंट्री भी शुरू करनी चाहिए।
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