
सुप्रीम कोर्ट सोमवार 5 जनवरी की सुबह उमर ख़ालिद समेत छह और अभियुक्तों की ज़मानत पर फ़ैसला सुनाने वाली थी.
फ़ैसला अहम था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहली बार ये तय करने वाला था कि इन अभियुक्तों को जेल में रखा जाना चाहिए या नहीं. इन पर आरोप थे कि इन्होंने 2020 में दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने की साज़िश रची थी.
सुबह उमर ख़ालिद के पिता एसक्यूआर इलियास सुप्रीम कोर्ट पहुँचे, इस उम्मीद से कि उनका बेटा उमर ख़ालिद घर लौटेगा.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में उन्होंने कहा, “मैं जब कोर्ट में दाख़िल हुआ तो सबने कहा कि आप मिठाई लेके आए क्या?”
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महीनों चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुरक्षित रखा था.
लेकिन जब फ़ैसला आया तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की दंगों में केंद्रीय भूमिका थी, इसलिए भले ही वे बिना सुनवाई के पाँच साल से ज़्यादा जेल में रहे हैं, अभी उन्हें ज़मानत नहीं मिलनी चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि वे एक साल बाद एक नई याचिका दायर कर सकते हैं. दूसरी ओर कोर्ट ने कहा कि पाँच अन्य अभियुक्तों की भूमिका उतनी अहम नहीं थी, इसलिए उन्हें ज़मानत मिलनी चाहिए.
‘फ़ैसले से धक्का लगा’

फ़ैसले की शाम बीबीसी न्यूज़ हिंदी से बात करते हुए उमर ख़ालिद के पिता ने अदालत के निर्णय पर अफ़सोस जताते हुए कहा, “उमर ख़ालिद और परिवार दोनों का हौसला क़ायम है. फ़ैसला हुआ, उससे धक्का लगा लेकिन हम लड़ेंगे. हमारे पास जो भी विकल्प हैं, हम उनका इस्तेमाल करेंगे.”
उमर ख़ालिद पिछले पाँच साल से अधिक समय से यूएपीए यानी ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत जेल में हैं. उन पर आतंकवाद की धाराएँ लगाई गई हैं. पाँच साल में अभी मामला दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में लंबित है. मामले में ट्रायल अभी शुरू नहीं हुआ है.
इस मामले में उनकी ज़मानत याचिका दो बार निचली अदालत से, दो बार दिल्ली हाई कोर्ट से और अब सुप्रीम कोर्ट से ख़ारिज हो चुकी है.
एसक्यूआर इलियास का कहना है कि उनके बेटे ने कभी लोगों को हिंसा या आतंकवाद करने के लिए नहीं भड़काया.
वह कहते हैं, “उमर का ‘फ़ॉल्ट’ अगर कुछ है तो वो नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के चेहरे थे. तो अगर हुकूमत के किसी फ़ैसले को चैलेंज करना अगर जुर्म है तो उमर ने वो जुर्म किया है.”
उनका कहना है कि यूएपीए के क़ानून में बेल मिलना बहुत मुश्किल होता है. इलियास ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “आम अपराधों में आपको निर्दोष माना जाता है जब तक आपको दोषी न साबित किया जाए. हालांकि यूएपीए में ये उल्टा हो जाता है.”
उन्होंने पूछा, “जब आपको 10-15 साल बाद निर्दोष पाया जाए, तो किसकी जवाबदेही होगी? किसी की जवाबदेही नहीं होती.”
दिल्ली में भी नहीं थे उमर ख़ालिद
निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ आतंकवाद का प्रथम दृष्टया केस बनता है.
इस पर उनके पिता का कहना है, “जो बातें हम पिछले पाँच साल से सुनते आ रहे हैं, वही फिर सुप्रीम कोर्ट में दोहरा दी गईं.”
उन्होंने कहा कि जब दंगे हुए तब उमर ख़ालिद दिल्ली में नहीं थे.
साथ ही व्हाट्सऐप पर उन्होंने कोई भड़काऊ मैसेज नहीं भेजे, न ही अपने भाषणों में लोगों को हिंसा के लिए उकसाया.
उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने कुछ ‘प्रोटेक्टेड विटनेस’ का हवाला दिया है, जिनका कहना है कि उमर ख़ालिद ने दंगे भड़काने में अहम भूमिका निभाई.
ज़मानत की स्टेज पर अदालत पुलिस के पेश किए गए केस को ऊपर-ऊपर से देखकर तय करती है कि प्रथम दृष्टया केस बन रहा है या नहीं. इलियास ने कहा कि यूएपीए जैसे क़ानूनों का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए किया जा रहा है.
उनका कहना था, “जो लोग कहते हैं ‘गोली मारो’, जो लोग कहते थे पुलिस को हटा दो हम देख लेंगे, वो लोग आज मंत्री बने हुए हैं, उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती है.”
आगे क्या?
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सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा है कि एक साल बाद उमर ख़ालिद एक नई ज़मानत याचिका दायर कर सकते हैं. इस पर उमर ख़ालिद के पिता का कहना है, “ये तो अजीब बात है. हमें भी ये बात पता है कि एक साल बाद हम बेल के लिए नई याचिका डाल सकते हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे ऊँची अदालत है. हमारी ये अपेक्षा थी कि कोर्ट तथ्यों के आधार पर फै़सला देगा. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा हुआ.”
क़ानून के जानकारों का मानना है कि इस फ़ैसले के बाद कम से कम एक साल तक अब उमर ख़ालिद को ज़मानत मिलने की उम्मीद बहुत कम है.
इस पर उनके पिता का कहना है, “जैसे वो साढ़े पाँच साल जेल में रहे, वैसे एक और साल जेल में रहेंगे. उसके बाद भी ये निश्चित नहीं है कि उन्हें ज़मानत मिलेगी. ज़ाहिर बात है कि ये पाँच साल भी बड़ी मुश्किलों से गुज़रे हैं, बाक़ी जितना वक़्त गुज़रेगा, वो भी ऐसे ही गुज़रेगा.”
इलियास का कहना है कि उमर ख़ालिद महात्मा गांधी और भगत सिंह जैसी हस्तियों की मिसाल देते रहते हैं. उन्होंने कहा कि जो लोग इन हस्तियों का उदाहरण देते हैं, उन्हें उनके रास्ते पर चलना भी होगा.
ज़ोहरान ममदानी की चिट्ठी
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हाल ही में न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने भी उमर ख़ालिद के समर्थन में एक चिट्ठी लिखी थी.
इस पर आलोचना हो रही है कि ये इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाने के लिए किया गया था.
इलियास ने कहा, “हमने इस मुद्दे को इंटरनैशनलाइज़ नहीं किया. हुकूमत और अदालतों के फ़ैसलों ने इसको इंटरनैशनलाइज़ किया है.”
उन्होंने नोम चोम्स्की जैसे बुद्धिजीवियों का उदाहरण दिया जिन्होंने उमर ख़ालिद का समर्थन किया था.
उन्होंने कहा, “मैं हाल में अमेरिका गया था. जहाँ भी गया था लोग उमर के बारे में पूछ रहे थे.”
हाल में उमर ख़ालिद को अपनी बहन की शादी के लिए दो हफ्तों की अंतरिम ज़मानत मिली थी.
उस दौरान उमर ख़ालिद अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिले. इलियास बताते हैं, “हम दोनों ही एक-दूसरे को हिम्मत देते हैं. उमर भी हमें हिम्मत देते हैं, कहते हैं परेशान मत होइए.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित